दिल्ली में न्यायपालिका से जुड़ा एक मामला अब आपराधिक अवमानना की संभावित कार्यवाही तक पहुंच गया है। CJP की रत्ना सिंह के खिलाफ साकेत कोर्ट के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) अभिनव पांडे पर सोशल मीडिया के जरिए की गई टिप्पणियों को लेकर कार्रवाई का रास्ता साफ हो गया है। दिल्ली सरकार के एडिशनल स्टैंडिंग काउंसिल अमोल सिन्हा ने इस मामले में आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए सहमति दे दी है। हालांकि, यह सहमति अंतिम न्यायिक फैसला नहीं है। मामले में आगे की प्रक्रिया दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष होगी।
यह विवाद उन सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़ा है, जिनमें रत्ना सिंह ने कथित तौर पर न्यायिक अधिकारी पर किसी बाहरी व्यक्ति के निर्देशों के अनुसार काम करने का आरोप लगाया था। शिकायतकर्ता का कहना है कि इस तरह की टिप्पणियां न्यायाधीश की निष्पक्षता और स्वतंत्रता पर सवाल खड़े करती हैं।
2 नवंबर को जारी हुआ सहमति संबंधी आदेश
इस मामले में 2 नवंबर 2026 को सहमति संबंधी आदेश जारी किया गया। दिल्ली सरकार के एडिशनल स्टैंडिंग काउंसिल अमोल सिन्हा ने उपलब्ध सामग्री का शुरुआती आकलन करने के बाद माना कि टिप्पणियां प्रथम दृष्टया आपराधिक अवमानना के दायरे में आ सकती हैं।
यह शिकायत वकील कौशिक चटर्जी की ओर से 14 और 28 अक्टूबर को दी गई अर्जियों से संबंधित है। इन अर्जियों में रत्ना सिंह के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग की गई थी।
आदेश में दी गई सहमति का अर्थ यह नहीं है कि रत्ना सिंह को अवमानना का दोषी ठहरा दिया गया है। इसका मतलब केवल इतना है कि मामले को आगे कानूनी प्रक्रिया के लिए दिल्ली हाईकोर्ट के सामने ले जाने का रास्ता खुला है। अंतिम निर्णय अदालत ही करेगी।
क्या है पूरा विवाद?
मामले की शुरुआत दिल्ली पुलिस की ओर से कथित हिरासत से जुड़े एक विवाद के दौरान हुई। रत्ना सिंह ने इस मामले में अदालत से राहत मांगी थी। 10 अक्टूबर को साकेत कोर्ट के दक्षिण-पूर्वी जिले के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अभिनव पांडे ने उनकी मांग खारिज कर दी थी।
इसके बाद रत्ना सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर न्यायिक अधिकारी के खिलाफ कुछ टिप्पणियां कीं। शिकायत में जिन पोस्ट का उल्लेख किया गया है, उनमें कथित तौर पर जज को ‘सर्विंग द मास्टर’ यानी मालिक की सेवा करने वाला बताया गया। एक अन्य पोस्ट में कहा गया कि जज अपने ‘मास्टर’ के आदेश का पालन कर रहे हैं।
I am still detained. Since 9AM. There are 30 police official for one woman. Itne khaali hai yeh log. 👀So many women are still detained. Men too. @DelhiPolice is following order from master. Judge is following order from master.There is no democracy in this country. Losers.
— Ratna Singh (@whattalawyer) October 10, 2026
शिकायतकर्ता का तर्क है कि ये टिप्पणियां केवल अदालत के आदेश से असहमति जताने तक सीमित नहीं थीं। उनके मुताबिक, इनसे न्यायिक अधिकारी की स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता और निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए।
न्यायिक आदेश की आलोचना और जज पर दबाव का आरोप अलग-अलग
अमोल सिन्हा ने अपने आदेश में न्यायिक फैसलों की आलोचना और किसी न्यायाधीश पर बाहरी दबाव में काम करने का आरोप लगाने के बीच अंतर स्पष्ट किया।
उनके अनुसार, किसी व्यक्ति को अदालत के फैसले से असहमति हो सकती है और वह कानूनी तरीके से उसकी आलोचना भी कर सकता है। लेकिन किसी न्यायिक अधिकारी के बारे में यह कहना कि वह किसी अज्ञात व्यक्ति या बाहरी प्राधिकारी के निर्देश पर फैसला कर रहा है, एक अलग तरह का आरोप है।
आदेश के मुताबिक, यदि इस तरह के आरोप बिना किसी तथ्यात्मक आधार के लगाए जाते हैं, तो इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर जनता के मन में संदेह पैदा हो सकता है। ऐसी टिप्पणियां न्यायिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा को प्रभावित करने के साथ न्याय प्रशासन में लोगों के भरोसे को भी कमजोर कर सकती हैं।
Judge serving the master. Went for break/meeting 4 times during entire hearing. Order without any application of law. Welcome to new India, where Sarkar can put 30 police personnel confining you & then say we won coz armless people couldn’t come to the protest site. Irony is that people with criminal history are roaming around in Delhi & police personnel are busy detaining peaceful protesters.
— Ratna Singh (@whattalawyer) October 10, 2026
अदालत की अवमानना अधिनियम की किस धारा का हुआ उल्लेख?
इस मामले में अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c)(i) का उल्लेख किया गया है। इस प्रावधान के तहत ऐसे कृत्य आपराधिक अवमानना के दायरे में आ सकते हैं, जिनका उद्देश्य या प्रभाव किसी अदालत की प्रतिष्ठा को कम करना अथवा न्यायिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करना हो।
इसके अलावा, धारा 15(2) के तहत दिल्ली हाईकोर्ट में आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए सहमति दी गई है। अब आगे की कानूनी प्रक्रिया और मामले पर विचार करने की जिम्मेदारी हाईकोर्ट की होगी।
दिल्ली पुलिस और मजिस्ट्रेट व्यवस्था पर टिप्पणियों को अलग नजर से देखा गया
आदेश में रत्ना सिंह की कुछ अन्य सोशल मीडिया टिप्पणियों का भी जिक्र किया गया। ये टिप्पणियां दिल्ली पुलिस, स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की कार्यवाही और निवारक कार्रवाई से जुड़ी थीं। इनमें CJP के सौरव दास और आशुतोष रांका से संबंधित कार्यवाही तथा स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ऋतुराज के सामने हुई सुनवाई का संदर्भ भी शामिल था।
अमोल सिन्हा ने इन टिप्पणियों को शुरुआती पोस्ट से अलग माना। उनके अनुसार, इनका मुख्य विषय पुलिस के आचरण और स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट व्यवस्था की कार्यप्रणाली की आलोचना करना था। केवल अधिकारियों या प्रशासनिक व्यवस्था की कड़ी आलोचना को अपने आप आपराधिक अवमानना नहीं माना जा सकता।
इसलिए रत्ना सिंह के खिलाफ कार्यवाही शुरू करने की सहमति मुख्य रूप से उन शुरुआती पोस्ट के आधार पर दी गई, जिनमें साकेत कोर्ट के CJM पर किसी अज्ञात ‘मास्टर’ के निर्देश पर काम करने का आरोप लगाया गया था।
अंतिम फैसला दिल्ली हाईकोर्ट करेगा
आदेश में 21 अक्टूबर को हुई कार्यवाही का भी उल्लेख है। अमोल सिन्हा के मुताबिक, उस आदेश में रत्ना सिंह की ओर से किसी व्यक्तिगत माफी या आश्वासन का उल्लेख नहीं था। साथ ही, उस समय उनके खिलाफ अवमानना का कोई निष्कर्ष भी नहीं दिया गया था।
फिलहाल इस मामले में सबसे अहम बात यह है कि आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए सहमति मिल चुकी है, लेकिन रत्ना सिंह के खिलाफ आरोप अभी साबित नहीं हुए हैं। दिल्ली हाईकोर्ट आगे मामले पर विचार करेगा और कानून के अनुसार निर्णय लेगा। ऐसे में अब सबकी नजर हाईकोर्ट की आगामी कार्यवाही पर रहेगी।
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