नई दिल्ली: देश में एक बार फिर यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी UCC सबसे बड़ी सियासी और सामाजिक बहस बन गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के एक बयान ने पूरे देश की राजनीति गरमा दी है। सवाल ये है कि आखिर UCC है क्या, इससे आम नागरिक की जिंदगी में क्या बदलेगा, कौन इसके समर्थन में है, कौन विरोध में, और अभी देश में इसकी असली तस्वीर क्या है।
रविवार को मुंबई में भाजपा के "सेवा संकल्प अभियान" की लॉन्चिंग के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा और NDA शासित सभी 21 राज्यों में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू कर दिया जाएगा। फिलहाल देश में 22 राज्यों में NDA की सरकार है, इनमें से उत्तराखंड में ये कानून पहले से लागू है, इसलिए बाकी बचे 21 राज्यों में इसे लागू करने का लक्ष्य रखा गया है।
UCC आखिर है क्या?
भारत में कानून को समझने के लिए सबसे पहले इसे दो हिस्सों में बांटना जरूरी है। एक है क्रिमिनल कानून, और दूसरा है सिविल कानून।
क्रिमिनल कानून उन मामलों पर लागू होता है जिनका सीधा संबंध अपराध से होता है, जैसे चोरी, हत्या, लूट या मारपीट। इन मामलों में पूरे देश के लिए एक जैसी अदालत, एक जैसी प्रक्रिया और एक जैसी सजा का प्रावधान है। यहां धर्म या समुदाय के आधार पर कोई फर्क नहीं किया जाता।
सिविल कानून का मामला अलग है। ये जुड़ा है परिवार और निजी जिंदगी से, शादी कैसे होगी, तलाक किन शर्तों पर मिलेगा, संपत्ति में हिस्सेदारी किसकी होगी, बच्चा गोद लेने का अधिकार किसके पास है, और भरण-पोषण के नियम क्या होंगे। इन सवालों के जवाब भारत में अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग हैं, और इसी को कहा जाता है पर्सनल लॉ।
हिंदुओं के लिए शादी और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में हिंदू मैरिज एक्ट और हिंदू उत्तराधिकार कानून लागू होता है। मुस्लिम समुदाय में शादी, तलाक और विरासत के मामले मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तय होते हैं। ईसाई और पारसी समुदायों के भी अपने अलग कानून हैं।
यूनिफॉर्म सिविल कोड का मकसद है धर्म के आधार पर बंटे इन अलग-अलग पर्सनल लॉ की जगह, सभी नागरिकों के लिए एक जैसा सिविल कानून लागू करना।

संविधान में UCC का जिक्र कहां है?
इस सोच की जड़ें संविधान में पहले से मौजूद हैं। संविधान के अनुच्छेद 44 में, जो राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों का हिस्सा है, कहा गया है कि राज्य नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करेगा। लेकिन ये सिर्फ एक लक्ष्य है, मौलिक अधिकार की तरह इसे किसी अदालत में सीधे लागू नहीं करवाया जा सकता। इसलिए बीते सत्तर से ज्यादा सालों में ये प्रावधान संविधान में दर्ज तो रहा, मगर जमीन पर उतर नहीं पाया।
इस बहस को कई बार अदालतों ने भी हवा दी है। साल 1985 में शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट ने एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला को भरण-पोषण दिलाने का आदेश दिया था, और उसी फैसले में अदालत ने UCC की जरूरत पर भी टिप्पणी की थी। इसके बाद 1995 के सरला मुद्गल मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से UCC लागू करने पर विचार करने को कहा था।
आज की तारीख में UCC कोई कल्पना भर नहीं है। गोवा में आजादी के समय से ही एक तरह का समान नागरिक कानून लागू है, जिसे गोवा सिविल कोड कहा जाता है, ये पुर्तगाली शासन के दौर से चला आ रहा है और 1961 में गोवा के भारत में विलय के बाद भी इसे जारी रखा गया।
अगर UCC लागू हुआ तो क्या बदलेगा?
UCC का असर मुख्य रूप से चार क्षेत्रों में देखने को मिलेगा:
- विवाह और तलाक - अलग-अलग समुदायों के नियमों की जगह एक समान कानूनी प्रक्रिया लागू होगी
- विरासत - संपत्ति के बंटवारे और उत्तराधिकार के नियम सभी के लिए एक जैसे होंगे
- गोद लेना - सभी नागरिकों के लिए समान कानूनी प्रावधान बनेंगे
- महिलाओं के अधिकार - अलग-अलग पर्सनल लॉ में मौजूद असमानताएं खत्म करके बराबरी का अधिकार देने का दावा

किन राज्यों में UCC किस स्टेज पर है?
उत्तराखंड - पहला राज्य
फरवरी 2024 में विधानसभा ने विधेयक पारित किया, मार्च 2024 में राष्ट्रपति की मंजूरी मिली, और जनवरी 2025 से ये कानून पूरी तरह लागू है। यहां लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों को रिश्ता शुरू होने के एक महीने के भीतर पंजीकरण कराना अनिवार्य है, न कराने पर सजा का प्रावधान है।
गुजरात - दूसरा राज्य
मार्च 2026 में विधानसभा ने विधेयक पारित किया। इसमें एक से ज्यादा शादी पर रोक है, और पहले से शादीशुदा व्यक्ति अगर लिव-इन रिलेशनशिप में जाता है तो उसे सख्त सजा का सामना करना पड़ सकता है। अनुसूचित जनजाति यानी ST समुदाय को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है।
असम - तीसरा राज्य
मई 2026 में विधेयक पारित हुआ, ये पूर्वोत्तर भारत का पहला राज्य है। यहां बहुविवाह और द्विविवाह पर सात साल तक की सजा का प्रावधान है, महिला-पुरुष को समान उत्तराधिकार मिलेगा, और तीन तलाक पर पूरी तरह रोक है। आदिवासी समुदायों को यहां भी छूट दी गई है।
मध्य प्रदेश - चौथा राज्य
जुलाई 2026 में विधानसभा ने विपक्ष के हंगामे के बीच बहुमत से विधेयक पास किया। ये अभी राज्यपाल की मंजूरी के इंतजार में है। यहां भी एक से ज्यादा शादी मान्य नहीं, तलाक अदालत के जरिए ही होगा, और राज्य की करीब 21 फीसदी आदिवासी आबादी को छूट दी गई है।
छत्तीसगढ़ ने जून 2026 में सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में कमेटी बनाई है, जो आगामी शीतकालीन सत्र में विधेयक पेश करने की तैयारी कर रही है।
सियासत में कहां तक पहुंची बहस
शाह के बयान के बाद देश की सियासत में लगातार नई हलचल हो रही है:
- महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने सोमवार को ऐलान किया कि राज्य में इसी साल शीतकालीन सत्र में UCC विधेयक नागपुर विधानसभा सत्र में पेश किया जाएगा।
- बिहार में जदयू के भीतर से भी मुश्किलें बढ़ी हैं, डिप्टी सीएम और जदयू नेता विजय चौधरी ने इस मुद्दे पर समीक्षा की बात कही है, जबकि पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा की सक्रियता को लेकर भी NDA के भीतर नए समीकरणों की चर्चा है।
- जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सवाल उठाया कि अगर सहयोगी दल ही तैयार नहीं हैं, तो सभी NDA राज्यों में UCC कैसे लागू होगाय़
- कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने भाजपा पर मुसलमानों के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया।
- AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के भोपाल दौरे का स्थानीय संगठनों ने विरोध किया, इसकी वजह UCC के खिलाफ AIMIM के अभियान को दी गई अनुमति बताया गया है।
समर्थन और विरोध की दो तस्वीरें
सरकार का तर्क है कि अलग-अलग पर्सनल लॉ की वजह से पैदा होने वाली असमानताओं को खत्म करके, महिलाओं समेत सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार सुनिश्चित किए जाएं।
वहीं ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का कहना है कि संविधान हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, और UCC लागू करने से पहले सभी समुदायों से व्यापक बातचीत जरूरी है। बोर्ड आंदोलन के साथ-साथ कानूनी लड़ाई की भी तैयारी में है।
दिलचस्प बात ये है कि मतभेद सिर्फ विपक्ष तक सीमित नहीं, बल्कि खुद NDA गठबंधन के भीतर भी नजर आ रहा है। बिहार में जदयू ने राज्य में UCC लागू न होने की बात कही है, जबकि केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान का कहना है कि पहले ड्राफ्ट सार्वजनिक हो, फिर सभी पक्षों की राय ली जाए।

दुनिया के दूसरे देशों में ये कानून कैसे काम करता है?
- पाकिस्तान, इराक, ईरान, यमन और सऊदी अरब जैसे ज्यादातर मुस्लिम देशों में सभी नागरिकों के लिए शरिया आधारित एक जैसा कानून लागू है।
- मिस्र, सिंगापुर, मलेशिया और श्रीलंका में शरिया कानून सिर्फ मुस्लिम समुदाय के पर्सनल मामलों तक सीमित है।
- इजराइल में हर धर्म के लिए अलग-अलग फैमिली लॉ मौजूद हैं।
- अमेरिका जैसे ज्यादातर ईसाई बहुल देशों में शादी, तलाक और संपत्ति से जुड़े मामलों के लिए सभी नागरिकों के लिए एक कॉमन लॉ लागू है, हालांकि ट्राइबल समुदायों को कुछ खास छूट दी गई है।

निष्कर्ष
भारत में असली सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि UCC आएगा या नहीं, बल्कि ये है कि क्या भारत जैसी विविधता वाले देश में एक ऐसा समान कानून बनाया जा सकता है, जिसे ज्यादातर समुदाय भी स्वीकार कर लें। यही वजह है कि ये मुद्दा अब सिर्फ अदालत या संसद की चारदीवारी में नहीं, बल्कि हर गठबंधन, हर पार्टी और हर समाज के भीतर बहस का विषय बन चुका है।
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