अमेरिका के 2026 मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा और सीनेट, दोनों में बहुमत हासिल कर लिया है। इस नतीजे के पीछे महंगाई, बढ़ती जीवन-यापन लागत, ईरान युद्ध और ट्रंप प्रशासन की नीतियों को अहम वजह माना जा रहा है। इसी बीच भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं का बदला हुआ रुख भी चर्चा में है। चुनाव से पहले हुए एक सर्वे में इस समुदाय के ज्यादातर लोगों ने डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों के समर्थन की बात कही थी।

भारतीय-अमेरिकी आबादी भले ही अमेरिका की कुल जनसंख्या का लगभग 1.5 प्रतिशत है, लेकिन आर्थिक, पेशेवर और राजनीतिक क्षेत्रों में इसकी मजबूत मौजूदगी है। कैलिफोर्निया, टेक्सास, न्यूयॉर्क और न्यू जर्सी जैसे राज्यों के अलावा जॉर्जिया, मिशिगन और पेंसिल्वेनिया जैसे चुनावी रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी भारतीय मूल के मतदाताओं की भूमिका पर नजर रहती है।

कार्नेगी सर्वे में डेमोक्रेट्स को मिला बड़ा समर्थन

कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस और रिसर्च फर्म YouGov की ओर से अक्टूबर 2026 में किए गए भारतीय-अमेरिकी मतदाता सर्वे में डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को स्पष्ट बढ़त दिखाई दी। सर्वे के अनुसार, 62 प्रतिशत भारतीय-अमेरिकी नागरिकों ने अपने कांग्रेसनल जिले में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार को वोट देने की इच्छा जताई, जबकि 19 प्रतिशत ने रिपब्लिकन उम्मीदवार का समर्थन किया।

सीनेट चुनाव वाले राज्यों में भी डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को 63 प्रतिशत और रिपब्लिकन उम्मीदवारों को 21 प्रतिशत समर्थन मिला। यह सर्वे 7 से 27 अक्टूबर के बीच 1,000 भारतीय-अमेरिकी वयस्कों के बीच किया गया था। मतदान संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण अमेरिकी नागरिकों के जवाबों पर आधारित था।

सर्वे में एक और अहम बात सामने आई। 40 वर्ष से अधिक उम्र के भारतीय-अमेरिकी पुरुषों में रिपब्लिकन उम्मीदवारों का समर्थन जनवरी 2026 के 32 प्रतिशत से घटकर अक्टूबर में 16 प्रतिशत रह गया। इस समूह में डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों का समर्थन 53 प्रतिशत से बढ़कर 68 प्रतिशत हो गया। हालांकि, सर्वे में पूछे गए मतदान के इरादे को वास्तविक मतदान परिणाम नहीं समझना चाहिए।

H-1B वीजा पर सख्ती बनी नाराजगी की बड़ी वजह

भारतीय-अमेरिकी समुदाय के बीच ट्रंप प्रशासन की आव्रजन नीति को लेकर असंतोष की एक बड़ी वजह H-1B वीजा से जुड़े फैसले हैं। अमेरिका के तकनीकी, मेडिकल, इंजीनियरिंग और वित्तीय क्षेत्रों में बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर काम करते हैं। ऐसे में वीजा नियमों में बदलाव का असर सीधे भारतीय कर्मचारियों और उनके परिवारों पर पड़ सकता है।

सितंबर 2025 में ट्रंप प्रशासन ने कुछ नए H-1B आवेदनों के लिए 1 लाख डॉलर के भुगतान की शर्त लागू की थी। अमेरिकी विदेश विभाग के मुताबिक, यह प्रतिबंध 21 सितंबर 2025 के बाद दाखिल कुछ H-1B याचिकाओं के आधार पर अमेरिका में प्रवेश करने वाले कर्मचारियों पर लागू किया गया था। इसमें कुछ अपवादों का प्रावधान भी रखा गया।

इस फैसले को लेकर भारतीय पेशेवरों और कंपनियों के बीच चिंता बढ़ी। खासकर उन लोगों के लिए यह मुद्दा महत्वपूर्ण है जो नौकरी के अवसरों के लिए अमेरिका जाना चाहते हैं या वहां अपने करियर को आगे बढ़ा रहे हैं। कार्नेगी के अक्टूबर सर्वे में भी भारतीय-अमेरिकियों के बीच इस फीस का विरोध सामने आया।

डिपोर्टेशन की कार्रवाई ने बढ़ाई चिंता

ट्रंप प्रशासन की इमिग्रेशन नीति का असर केवल कुशल पेशेवरों तक सीमित नहीं रहा। अमेरिका में अवैध रूप से रह रहे लोगों के खिलाफ कार्रवाई और निर्वासन की प्रक्रिया भी भारतीय समुदाय के बीच चर्चा का विषय बनी।

भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2025 में अमेरिका से 3,567 भारतीय नागरिकों को वापस भेजा गया। इसके अलावा 1 जनवरी से 22 जुलाई 2026 के बीच 1,273 भारतीय नागरिकों को निर्वासित किया गया। इस तरह इन दोनों अवधियों में कुल 4,840 भारतीयों को अमेरिका से वापस भेजा गया।

निर्वासन के दौरान हथकड़ी और पैरों में बेड़ियां लगाए गए भारतीय नागरिकों की तस्वीरें भी सामने आई थीं। इन तस्वीरों को लेकर भारत में आलोचना हुई और अमेरिका में रह रहे भारतीय परिवारों के बीच भी चिंता बढ़ी। हालांकि, निर्वासन के आंकड़ों में अलग-अलग आव्रजन मामलों वाले लोग शामिल हो सकते हैं, इसलिए सभी को एक ही श्रेणी में रखना सही नहीं होगा।

भारतीय मूल के लोगों को लेकर नस्लवाद का विवाद

भारतीय-अमेरिकियों की नाराजगी का एक दूसरा पहलू नस्लीय भेदभाव और पहचान से जुड़ा है। सितंबर 2026 में अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से एक AI-निर्मित पोस्टर साझा किया गया था। इसमें ट्रांसफॉर्मर्स फिल्म के किरदार जैसी आकृति के सामने एक दक्षिण एशियाई दिखने वाले व्यक्ति को दिखाया गया और उसके साथ 'Mr Singh' नाम का इस्तेमाल करते हुए आपत्तिजनक टिप्पणी की गई।

पोस्ट में 'America for Americans' और 'Get off our roads' जैसे संदेश भी थे। इसे सिख और भारतीय-अमेरिकी संगठनों ने नस्लीय रूढ़ियों को बढ़ावा देने वाला बताया। विवाद बढ़ने के बाद विभाग ने पोस्ट हटा दी। इस घटना ने सवाल खड़ा किया कि अवैध प्रवासियों के खिलाफ सरकारी अभियान में किसी खास नाम, समुदाय या पहचान को निशाना बनाना कितना उचित है।

भारत-अमेरिका रिश्ते और पाकिस्तान से संपर्क भी मुद्दा

भारतीय-अमेरिकियों के बीच ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति को लेकर भी असंतोष के संकेत मिले हैं। कार्नेगी के पहले सर्वे में 55 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने भारत-अमेरिका संबंधों को संभालने के ट्रंप के तरीके पर नाखुशी जताई थी। 20 प्रतिशत ने उनके रुख को पसंद किया, जबकि 25 प्रतिशत ने कोई राय नहीं दी।

इसके अलावा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख असीम मुनीर के साथ ट्रंप की मुलाकातों को लेकर भी भारतीय समुदाय के कुछ वर्गों में चर्चा रही। भारत के साथ संबंधों और पाकिस्तान के प्रति अमेरिकी रुख को लेकर उठे सवालों ने विदेश नीति को भी इस समुदाय की राजनीतिक सोच का हिस्सा बनाया।

चुनावी नतीजों से ट्रंप को मिला राजनीतिक संदेश

अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में डेमोक्रेट्स की जीत को ट्रंप प्रशासन के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती माना जा रहा है। भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं के सर्वे से यह संकेत जरूर मिला कि समुदाय के एक बड़े हिस्से का समर्थन रिपब्लिकन उम्मीदवारों से हटकर डेमोक्रेट्स की ओर गया। लेकिन चुनावी नतीजों को केवल भारतीय-अमेरिकी वोटों से जोड़ना सही नहीं होगा। महंगाई, ईरान युद्ध, रोजगार और सरकार के कामकाज जैसे मुद्दों ने भी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित किया।

भारतीय-अमेरिकी समुदाय के लिए H-1B वीजा, डिपोर्टेशन, नस्लीय भेदभाव और भारत-अमेरिका संबंध महत्वपूर्ण मुद्दे बने हुए हैं। आने वाले समय में रिपब्लिकन पार्टी के सामने इस समुदाय का भरोसा दोबारा हासिल करने की चुनौती होगी। वहीं डेमोक्रेट्स के लिए भी सर्वे में मिले समर्थन को स्थायी राजनीतिक समर्थन में बदलना आसान नहीं होगा।