वॉशिंगटन से एक ऐसी खबर आई है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। 1973 के वॉर पॉवर्स एक्ट के बाद, यानी पिछले 53 सालों के इतिहास में पहली बार, अमेरिकी संसद के दोनों सदनों ने एक बैठे हुए राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों को सीधे चुनौती दे दी है। और वो भी तब, जब ईरान के साथ हुआ हालिया संघर्ष अभी-अभी थमा है और दोनों देश समझौते की मेज पर हैं।

अमेरिकी सीनेट ने एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पास किया है, जिसमें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को यह सख्त निर्देश दिया गया है कि वे ईरान में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को तत्काल रोकें। वोटिंग के दौरान ट्रम्प की अपनी ही पार्टी के भीतर एक गहरी दरार देखने को मिली, जब चार रिपब्लिकन सांसदों ने पाला बदलकर विपक्ष यानी डेमोक्रेट्स का साथ दिया।

ट्रम्प ने इस प्रस्ताव को ‘बेमानी’ और ‘गलत समय पर लिया गया फैसला’ बताया है। अपने खिलाफ वोट देने वाले रिपब्लिकन सांसदों को उन्होंने ‘हारे हुए लोग’ तक कह दिया। लेकिन जब अमेरिका की संसद ही अपने राष्ट्रपति की नीतियों के खिलाफ खड़ी हो जाए, तो यह सवाल सिर्फ अमेरिका का नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक कूटनीति का सवाल बन जाता है।


युद्ध की शुरुआत: ऑपरेशन एपिक फ्यूरी

28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई शुरू की। इसे ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ नाम दिया गया। अमेरिकी प्रशासन का दावा था कि ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को रोकना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है। लेकिन कुछ ही घंटों में यह अभियान मध्य-पूर्व के सबसे बड़े सैन्य टकरावों में बदल गया।

पहले 12 घंटों में ही 900 से अधिक हवाई हमले किए गए। ईरान के सैन्य अड्डों, रणनीतिक ठिकानों और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया गया। जवाब में ईरान ने इजरायल और अमेरिकी ठिकानों पर ड्रोन और सैकड़ों बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। धीरे-धीरे यह संघर्ष पूरे क्षेत्र में फैलने लगा।

सबसे बड़ा झटका तब लगा जब ईरान ने होर्मुज़ स्ट्रेट को बंद कर दिया। यही वह समुद्री मार्ग है जिससे दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल का व्यापार गुजरता है। कुछ ही दिनों में तेल बाजार में भारी उथल-पुथल मच गई, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई और दुनिया भर में महंगाई तथा ऊर्जा संकट की चिंताएं बढ़ने लगीं।

28 फरवरी से लेकर जून के मध्य तक चले इस संघर्ष में हजारों सैन्य हमले हुए और अरबों डॉलर का नुकसान हुआ। पूरे युद्ध की लागत 100 अरब डॉलर से भी अधिक पहुंचने का अनुमान है। इतना ही नहीं, रक्षा उपकरणों और हथियारों के भंडार को फिर से भरने के लिए पेंटागन ने अतिरिक्त 80 अरब डॉलर के बजट की मांग भी की है।


सीनेट की बगावत: 50-48 का कांटे का मुकाबला

युद्ध के साथ-साथ अमेरिका के भीतर एक और बहस तेज होती गई। सवाल यह उठने लगा कि क्या राष्ट्रपति ट्रम्प ने कांग्रेस की औपचारिक मंजूरी के बिना अमेरिका को इस युद्ध में झोंक दिया? यही सवाल धीरे-धीरे वॉशिंगटन के सत्ता गलियारों से निकलकर अमेरिकी संसद तक पहुंच गया।

सीनेट में हुए 50-48 के कांटे के मुकाबले में ट्रम्प की हार की पटकथा उनकी अपनी ही पार्टी के चार रिपब्लिकन सांसदों ने लिखी - लिसा मुर्कोवस्की, सुजन कॉलिन्स, रैंड पॉल और बिल कैसिडी। इन नेताओं ने पार्टी लाइन से अलग जाकर ट्रम्प के खिलाफ वोट दिया।

यह पहली बार था जब सीनेट ने ऐसा प्रस्ताव पारित किया। इससे पहले नौ बार कोशिश हुई थी और हर बार नाकामी मिली। इस बार दो रिपब्लिकन सांसद; मिच मैककोनेल और डेव मैककॉर्मिक वोट के लिए मौजूद नहीं थे। अगर वे होते, तो 50-50 की टाई पर यह प्रस्ताव गिर जाता।

सीनेट के डेमोक्रेटिक नेता चक शूमर ने इसे ट्रम्प की ‘ऐतिहासिक भूल’ बताया। डेमोक्रेट सांसद टिम केन ने कहा कि संविधान बहुत साफ है, युद्ध की घोषणा करने का अधिकार राष्ट्रपति का नहीं, संसद का है।

हालांकि व्हाइट हाउस इस प्रस्ताव को केवल प्रतीकात्मक और बेमानी करार दे रहा है। व्हाइट हाउस का तर्क है कि युद्ध तो 7 अप्रैल के सीजफायर के बाद ही खत्म हो चुका था, इसलिए हटाने के लिए कोई सेना है ही नहीं। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बगावत ने अमेरिकी सत्ता के शीर्ष पर मौजूद गहरे मतभेदों को दुनिया के सामने उजागर कर दिया है। बढ़ते आर्थिक बोझ, महंगाई और युद्ध की राजनीतिक कीमत ने रिपब्लिकन और डेमोक्रेट… दोनों दलों के कई नेताओं को असहज कर दिया है।


कूटनीति की जंग: स्विट्जरलैंड से पाकिस्तान तक

मिसाइलें भले खामोश हो गई हों, लेकिन कूटनीति की जंग अभी भी पूरी ताकत से जारी है। स्विट्जरलैंड में जब अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधि बातचीत की मेज पर बैठे, तो बंद कमरों के भीतर हालात इतने आसान नहीं थे।

सूत्रों के मुताबिक करीब 80 मिनट तक बेहद गोपनीय बातचीत चल रही थी। इसी दौरान राष्ट्रपति ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर ईरान को खुली चेतावनी दे दी। ट्रम्प के इस बयान ने बातचीत का माहौल अचानक तनावपूर्ण बना दिया। ईरानी मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाघेर गालिबाफ इतने नाराज हुए कि बातचीत कुछ समय के लिए बाधित हो गई। ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के साथ औपचारिक फोटो और सार्वजनिक हाथ मिलाने से भी इनकार कर दिया।

कतर, ओमान, पाकिस्तान और कुछ यूरोपीय मध्यस्थ देशों की लगातार कोशिशों के बाद संवाद का सिलसिला जारी रखा गया।

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो अचानक संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और कुवैत के दौरे पर पहुंचे। माना जा रहा है कि उनका मकसद खाड़ी देशों की उन आशंकाओं को दूर करना है जिनमें उन्हें डर है कि युद्ध के बाद बनने वाले नए समीकरणों में ईरान का प्रभाव और मजबूत हो सकता है।

दूसरी तरफ ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियां सीधे पाकिस्तान पहुंचे, जहां प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर के साथ उनकी महत्वपूर्ण बैठक हुई। यह दौरा सिर्फ औपचारिक नहीं माना जा रहा, बल्कि क्षेत्रीय समर्थन और रणनीतिक संतुलन बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।


परमाणु विवाद: एक समझौता, दो अलग-अलग दावे

इस पूरी शांति प्रक्रिया की सबसे बड़ी परीक्षा अब भी ईरान का परमाणु कार्यक्रम ही बना हुआ है। 17 जून को अमेरिका और ईरान के बीच एक 14-सूत्रीय समझौता-ज्ञापन पर हस्ताक्षर हुए। इसके तहत अगले 60 दिनों तक परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंधों में राहत, होर्मुज़ स्ट्रेट और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर बातचीत आगे बढ़ाने पर सहमति बनी।

लेकिन समझौते के कुछ ही दिनों बाद दोनों देशों के दावों में बड़ा विरोधाभास सामने आ गया।

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने दावा किया कि ईरान अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी IAEA के निरीक्षकों को दोबारा अपने परमाणु ठिकानों तक पहुंच देने पर सहमत हो गया है। राष्ट्रपति ट्रम्प ने भी चेतावनी दी कि यदि ईरान ने अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण स्वीकार नहीं किया, तो कूटनीतिक बातचीत के रास्ते बंद हो सकते हैं।

अगले ही दिन तेहरान ने अमेरिकी दावों को सिरे से खारिज कर दिया। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघाई ने कहा कि IAEA प्रमुख राफेल ग्रोसी के साथ ऐसी कोई बैठक नहीं हुई जिसमें निरीक्षकों की वापसी पर कोई नई प्रतिबद्धता दी गई हो। ईरान ने यह भी साफ कर दिया कि उसकी जमी हुई संपत्तियों के इस्तेमाल को लेकर अंतिम फैसला केवल तेहरान करेगा।

होर्मुज़ स्ट्रेट को लेकर भी दोनों देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं। मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने कहा है कि होर्मुज़ अब पहले जैसा नहीं रहेगा और ईरान वहां से गुजरने वाले जहाजों पर अधिक नियंत्रण और आर्थिक अधिकार चाहता है। वहीं अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का कहना है कि किसी भी देश को अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग पर टोल वसूलने का अधिकार नहीं दिया जा सकता।

पाकिस्तान दौरे के दौरान ईरानी राष्ट्रपति ने एक और स्पष्ट संदेश दिया, ईरान अपने मिसाइल कार्यक्रम पर किसी भी तरह का समझौता नहीं करेगा, क्योंकि यह उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता का विषय है।

विशेषज्ञों का मानना है कि समझौते के बाद ये अगले 60 दिन बेहद महत्वपूर्ण होंगे। असली संघर्ष अब युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि भरोसे, परमाणु निरीक्षण और राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के बीच होने वाला है।


होर्मुज़ में फंसे 11 हजार नाविक: UN का मेगा रेस्क्यू ऑपरेशन

इस युद्ध की सबसे दर्दनाक मानवीय तस्वीर आज होर्मुज़ स्ट्रेट में दिखाई दे रही है। शिपिंग विश्लेषण कंपनी Kpler के अनुसार फिलहाल कम से कम 327 बड़े वाणिज्यिक जहाज फारस की खाड़ी में फंसे हुए हैं। इन जहाजों पर सवार 11 हजार से ज्यादा नाविक महीनों से घर लौटने का इंतजार कर रहे हैं। ये कोई सैनिक नहीं हैं, ये आम नाविक हैं जो दो देशों की जंग के कारण समुद्र के बीचों-बीच कैद हो गए।

संयुक्त राष्ट्र की समुद्री एजेंसी IMO ने अब इन नाविकों को सुरक्षित निकालने के लिए एक बड़े इवैक्युएशन ऑपरेशन की शुरुआत की है। IMO के महासचिव आर्सेनियो डोमिंग्वेज़ के अनुसार इस संघर्ष के दौरान कम से कम 14 नाविक अपनी जान गंवा चुके हैं और हजारों लोग अब भी जोखिम में हैं।

युद्ध के दौरान ईरान ने होर्मुज़ के कई हिस्सों में समुद्री बारूदी सुरंगें बिछा दी थीं। डेनमार्क, फ्रांस और ब्रिटेन ने मिलकर एक संयुक्त नौसैनिक सुरक्षा मिशन शुरू करने का फैसला किया है ताकि इस अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग को पूरी तरह सुरक्षित बनाया जा सके।

कुछ राहत की खबरें भी सामने आई हैं। मरीन ट्रैफिक के आंकड़ों के मुताबिक जहाजों की आवाजाही धीरे-धीरे बढ़ने लगी है, जो संख्या कुछ समय पहले 30 से 40 जहाज प्रतिदिन तक सिमट गई थी, वह अब बढ़कर लगभग 90 के आसपास पहुंच रही है।

भारत के लिए भी यह राहत की खबर है। विदेश मंत्रालय के अनुसार भारत से जुड़े 11 जहाज, जिनमें 4 बड़े कच्चे तेल के टैंकर शामिल हैं, सुरक्षित रूप से होर्मुज़ पार कर चुके हैं। इसका असर वैश्विक तेल बाजार पर भी दिखाई दिया है और ब्रेंट क्रूड की कीमतें गिरकर मार्च के बाद के सबसे निचले स्तरों तक पहुंच गई हैं।

हालांकि खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं है। ओमान और ईरान के बीच इस बात पर बातचीत चल रही है कि क्या होर्मुज़ से गुजरने वाले जहाजों पर नया टैक्स या टोल लगाया जाए। युद्ध भले रुक गया हो, लेकिन उसके आर्थिक और मानवीय परिणाम अभी भी पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहे हैं।


आगे क्या: लोकतंत्र का सबसे पुराना सवाल

यह कहानी सिर्फ अमेरिकी सीनेट के एक वोट की नहीं है। यह उस मूल सवाल की कहानी है जो हर लोकतंत्र में बार-बार पूछा जाता है, क्या एक राष्ट्रपति, चाहे वह कितना भी ताकतवर क्यों न हो, अकेले अपने देश को युद्ध में झोंक सकता है? क्या युद्ध और शांति जैसे बड़े फैसलों में संसद की भूमिका अनिवार्य होनी चाहिए?

53 साल बाद अमेरिकी सीनेट ने इसी सवाल को दोबारा जिंदा किया है।

ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत जारी है। होर्मुज़ में फंसे हजारों नाविक घर लौटने का इंतजार कर रहे हैं। दुनिया उम्मीद कर रही है कि मिसाइलों की जगह अब कूटनीति लेगी। लेकिन इतिहास हमें यही सिखाता है… युद्ध शुरू करना आसान है, शांति बनाए रखना बेहद मुश्किल।