नई दिल्ली,भारत: जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन (JNUSU) ने शुक्रवार को शिक्षा मंत्रालय (MoE) तक निकाले गए “लॉन्ग मार्च” के दौरान पुलिस कार्रवाई और 50 से अधिक छात्रों की सामूहिक हिरासत पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया।
प्रदर्शन के दौरान पुलिस और छात्रों के बीच झड़प हुई, जिसमें जेएनयू के 14 छात्र और JNUSU के तीन पदाधिकारी भी शामिल हैं, उन्हें गिरफ्तार किया गया था। पटियाला हाउस कोर्ट ने सभी छात्रों को 25,000 रुपये के जमानती बॉन्ड पर जमानत दे दी है।
कुलपति को तत्काल हटाने की मांग पर अड़े प्रदर्शकारी
JNUSU ने बयान में कहा कि “लॉन्ग मार्च” रोहित एक्ट लागू करने, विश्वविद्यालय के फंड की बहाली और कुलपति शांतिश्री धुलीपुडी पंडित (Santishree D Pandit) को उनके कथित जातिवादी बयान और “कैंपस में भ्रष्टाचार में मिलीभगत” के आरोपों के कारण तत्काल हटाने की मांग को लेकर आयोजित किया गया था।

बता दें कि 16 फरवरी को एक पॉडकास्ट में दलितों और अश्वेतों को लेकर की गई कथित आपत्तिजनक टिप्पणियां की गई थीं। उन्हीं टिप्पणियों के चलते प्रदर्शनकारी कुलपति के इस्तीफे की मांग कर रहे थे। JNUSU का आरोप है कि दिल्ली पुलिस ने जानबूझकर मुख्य द्वार को जंजीरों से बंद कर दिया और प्रदर्शनकारियों को कैंपस के भीतर रोकने के लिए कई परतों में बैरिकेडिंग की।
पुलिस पर 50 छात्रों को जबरन बसों में ले जाने का आरोप लगाया
JNUSU ने आरोप लगाया कि जब छात्रों ने सामूहिक रूप से आगे बढ़ने के अपने लोकतांत्रिक अधिकार का दावा किया, तो पुलिस ने अत्यधिक बल प्रयोग किया। करीब 50 छात्रों को जबरन बसों में भरकर विभिन्न थानों में ले जाया गया। कई छात्राओं सहित अनेक छात्र गंभीर रूप से घायल हुए। चोटों के बावजूद पुलिस ने चिकित्सीय सहायता देने से इनकार किया। इतना ही नहीं, गहरी असम्मानजनक कार्रवाई करते हुए पुलिसकर्मी डॉ. बी.आर. आंबेडकर का चित्र फाड़ते हुए देखे गए, जो इस कार्रवाई के जातिवादी स्वरूप को दर्शाता है।
पुलिस-प्रदर्शनकारियों में हुई झड़प में कई घायल
वहीं, पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारी छात्रों ने विश्वविद्यालय का बंद मुख्य द्वार तोड़ दिया और लगाए गए बैरिकेड्स पार कर मार्च निकालने की कोशिश की, जिससे झड़प हुई और कई पुलिसकर्मी घायल हुए।
दक्षिण-पश्चिम जिले के डीसीपी अमित गोयल ने कहा, “हमने उनसे अनुरोध किया कि वे परिसर के अंदर ही विरोध करें, बाहर नहीं, क्योंकि उन्हें अनुमति नहीं दी गई थी। उन्हें यह भी बताया गया कि यदि वे प्रतिनिधिमंडल भेजना चाहें तो सुविधा दी जा सकती है। लेकिन उन्होंने इन सभी अनुरोधों की अनदेखी की, 400-500 लोग इकट्ठा किए, गेट तोड़ा और करीब 3 बजे बाहर निकल आए, यह कहते हुए कि वे बाहर मार्च करेंगे।”
पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लगाए गंभीर आरोप
पुलिस ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा कर्मियों के साथ हाथापाई की। दिल्ली पुलिस के अनुसार प्रदर्शन हिंसक हो गया और प्रदर्शनकारियों ने “बैनर और डंडे फेंके, जूते उछाले और यहां तक कि पुलिसकर्मियों को काटा,” जिसके बाद कानून का उल्लंघन करने वालों को हिरासत में लिया गया।
प्रदर्शनकारियों ने नहीं किया वैध आदेशों का पालन
पुलिस के बयान में कहा गया, “प्रदर्शन के दौरान बैरिकेड्स क्षतिग्रस्त हुए और स्थिति हिंसक हो गई। कई पुलिसकर्मी घायल हुए। प्रदर्शनकारियों को जेएनयू के नॉर्थ गेट पर रोका गया और धीरे-धीरे परिसर के अंदर वापस भेजा गया। जो लोग हिंसक हुए और वैध आदेशों का पालन नहीं किया, उन्हें हिरासत में लिया गया। आगे की जानकारी समय आने पर साझा की जाएगी।”
UGC के नए नियमों पर हुआ था विवाद
विवाद की जड़ 2026 के प्रस्तावित यूजीसी इक्विटी (एंटी-डिस्क्रिमिनेशन) विनियमों पर चर्चा के दौरान कुलपति संतिश्री डी पंडित की पॉडकास्ट में की गई टिप्पणियां हैं। सोशल मीडिया पर वायरल एक कथित क्लिप में उन्हें यह कहते हुए सुना गया कि दलित और अश्वेत “हमेशा पीड़ित बने रहकर या पीड़ित कार्ड खेलकर प्रगति नहीं कर सकते,” जिस पर छात्र संगठनों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। हालांकि, कुलपति ने स्पष्टीकरण दिया है कि उनके बयान को संदर्भ से हटाकर “राजनीतिक उद्देश्यों” के लिए गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया।