नई दिल्ली, भारत: दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार की 1 फरवरी की उस अधिसूचना पर रोक लगा दी है, जिसमें राष्ट्रीय राजधानी के निजी स्कूलों को स्कूल-स्तरीय शुल्क विनियमन समितियां (SLFRC) गठित करने और अगले तीन शैक्षणिक वर्षों के लिए प्रस्तावित फीस संरचना जमा करने का निर्देश दिया गया था।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ ने आदेश दिया कि याचिकाओं के अंतिम निर्णय तक यह अधिसूचना स्थगित रहेगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि शैक्षणिक वर्ष 2026-27 के लिए स्कूल पिछले वर्ष के समान फीस ही वसूल सकते हैं, जो मामले के अंतिम फैसले के अधीन होगी।
Delhi High Court Delhi stays government notification directing private schools to constitute school-level fee regulation committees and submit details of the proposed fee for the next three academic years. HC says schools can charge the same fee for the year 2026-27 as they… pic.twitter.com/5jB3AAViog
— Bar and Bench (@barandbench) February 28, 2026
याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई 12 मार्च को होगी
खंडपीठ ने कहा कि मामले के लंबित रहने के दौरान SLFRC का गठन टालना उचित होगा। इसलिए अधिसूचना की धारा 3(1) और 3(2) को फिलहाल स्थगित रखा गया है। अदालत ने याचिकाओं की अंतिम सुनवाई 12 मार्च, 2026 को तय की है।
यह मामला 1 फरवरी को दिल्ली सरकार द्वारा जारी राजपत्र अधिसूचना से जुड़ा है, जिसमें निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों को 10 दिनों (10 फरवरी तक) के भीतर SLFRC गठित करने और उसके बाद 14 दिनों के भीतर अगले तीन शैक्षणिक सत्रों के लिए प्रस्तावित फीस संरचना का विवरण प्रस्तुत करने को कहा गया था।
कई स्कूल संगठनों ने इस आदेश को चुनौती दी
दिल्ली पब्लिक स्कूल सोसायटी और एक्शन कमेटी ऑफ अनएडेड रिकग्नाइज्ड प्राइवेट स्कूल्स सहित कई स्कूल संगठनों ने इस आदेश को चुनौती दी। उनका कहना था कि यह अधिसूचना दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम में निर्धारित समय-सीमाओं को बदलती है, जो कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है।
शुक्रवार को हाईकोर्ट ने अंतरिम राहत पर विस्तृत सुनवाई के बाद आदेश सुरक्षित रख लिया था। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि सरकार कार्यकारी अधिसूचना के जरिए वैधानिक समय-सीमाओं में बदलाव नहीं कर सकती।
'शिक्षा में व्यावसायीकरण और मुनाफाखोरी को रोकना है' - सॉलिसिटर जनरल
सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने कहा कि अधिनियम के तहत समय-सीमाएं कठोर नहीं हैं और उन्हें उचित रूप से समायोजित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि कानून का उद्देश्य शिक्षा में व्यावसायीकरण और मुनाफाखोरी को रोकना है, और इसके लागू होने में देरी से छात्रों और अभिभावकों पर अनियंत्रित फीस वृद्धि का असर पड़ सकता है।
इससे पहले, 9 फरवरी को हाईकोर्ट ने समितियों के गठन की 10 फरवरी की समय-सीमा बढ़ा दी थी। शिक्षा निदेशालय ने अपने जवाब में कहा कि 1 अप्रैल से अधिनियम लागू करना फीस नियमन सुनिश्चित करने और शोषणकारी प्रथाओं पर रोक लगाने के लिए आवश्यक है।