पूर्व सेना प्रमुख मनोज मुकुंद नरवणे ने पाकिस्तान से बातचीत पर RSS नेता की टिप्पणी का समर्थन किया

By  GTC Bharat May 14th 2026 11:19 AM -- Updated: May 14th 2026 11:21 AM

जनरल नरवणे ने 'ट्रैक-2' डिप्लोमेसी और आम लोगों के बीच संपर्क को बताया जरूरी, लेकिन आतंक पर जीरो टॉलरेंस की बात भी दोहराई।

भारत और पाकिस्तान के जटिल रिश्तों को लेकर एक बार फिर देश के गलियारों में नई बहस छिड़ गई है। इस बार चर्चा का केंद्र कोई राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि एक पूर्व सैन्य दिग्गज और एक वरिष्ठ वैचारिक नेता के सुरों का मिलना है। पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल (सेवानिवृत्त) एम.एम. नरवणे ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले के उस बयान का पुरजोर समर्थन किया है, जिसमें पाकिस्तान के साथ बातचीत के रास्ते खुले रखने की वकालत की गई थी।

आमतौर पर भारतीय सुरक्षा और सैन्य जगत में पाकिस्तान के साथ 'बिना आतंकवाद के कोई बातचीत नहीं' की नीति का कड़ाई से पालन किया जाता है। ऐसे में एक पूर्व सेना प्रमुख का आरएसएस नेता के सुर में सुर मिलाना न केवल कूटनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर रहा है, बल्कि यह भविष्य की विदेश नीति में एक संभावित 'सॉफ्ट अप्रोच' की ओर भी इशारा करता है।

दत्तात्रेय होसबोले का वह बयान जिसने सुर्खियां बटोरीं

हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान आरएसएस के वरिष्ठ नेता दत्तात्रेय होसबोले ने पाकिस्तान के साथ संबंधों पर एक संतुलित नजरिया पेश किया था। उन्होंने पाकिस्तान की हरकतों को "सुई की चुभन" (pinprick) जैसा बताया था, जो पुलवामा जैसी घटनाओं के जरिए भारत को अस्थिर करने की लगातार कोशिश करता रहता है।

होसबोले ने कहा था कि आतंकवाद पर भारत का रुख सख़्त होना चाहिए और हर हमले का करारा जवाब दिया जाना चाहिए। लेकिन, उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात और जोड़ी—"बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं होने चाहिए।" उन्होंने कूटनीतिक रिश्तों, व्यापार, वीजा और खेल संबंधों को जारी रखने की बात कही ताकि संवाद का कोई न कोई माध्यम हमेशा जीवित रहे। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की लाहौर बस यात्रा का उदाहरण देते हुए याद दिलाया कि भारत ने हमेशा शांति की पहली पहल की है।

जनरल एम.एम. नरवणे ने क्या कहा?

पूर्व सेना प्रमुख मनोज मुकुंद नरवणे ने होसबोले की इन टिप्पणियों को "यथार्थवादी और दूरदर्शी" बताया है। जनरल नरवणे का मानना है कि भारत मूलतः एक शांतिप्रिय राष्ट्र है जो विवादों को बातचीत के जरिए सुलझाने में विश्वास रखता है।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सीमा के दोनों तरफ रहने वाले आम लोगों की समस्याएं एक जैसी हैं—रोटी, कपड़ा, मकान और रोजगार। नरवणे के अनुसार, राजनीतिक तनाव अक्सर आम जनता के बीच की खाई को बढ़ा देता है, जबकि सांस्कृतिक आदान-प्रदान और खेल जैसे माध्यम इस खाई को पाटने का काम कर सकते हैं।

नरवणे के समर्थन के मुख्य बिंदु:

  • शांति की भाषा कमजोरी नहीं: उन्होंने स्पष्ट किया कि शांति की बात करने का मतलब यह कतई नहीं है कि भारत अपनी सैन्य तैयारी या राष्ट्रीय सुरक्षा से किसी भी प्रकार का समझौता करेगा।
  • ट्रैक-2 डिप्लोमेसी: उन्होंने गैर-राजनीतिक मंचों, वैज्ञानिकों, खिलाड़ियों और नागरिक समाज (Civil Society) के बीच निरंतर संवाद को जरूरी बताया।
  • सैन्य और नागरिक संवाद में संतुलन: जनरल का मानना है कि सेना अपना काम सीमा पर मुस्तैदी से करती रहेगी, लेकिन डिप्लोमेसी के स्तर पर दरवाजे बंद करना समाधान नहीं है।

'ट्रैक-2 डिप्लोमेसी': क्या यह समाधान की चाबी है?

कूटनीति की दुनिया में 'ट्रैक-2 डिप्लोमेसी' का मतलब होता है गैर-सरकारी स्तर पर होने वाली बातचीत। इसमें रिटायर्ड अधिकारी, अकादमिक विद्वान और प्रबुद्ध नागरिक हिस्सा लेते हैं। जनरल नरवणे और होसबोले, दोनों ने इसी अनौपचारिक संवाद की खिड़की को खुला रखने की बात कही है।

उनका तर्क है कि जब सरकारी स्तर पर बातचीत ठप हो जाती है, तब ये अनौपचारिक माध्यम ही गलतफहमियों को दूर करने और भविष्य के लिए जमीन तैयार करने में मदद करते हैं।  कई विशेषज्ञ इसे भारत की 'प्रो-एक्टिव डिप्लोमेसी' का हिस्सा मान रहे हैं, जहां भारत अपनी शर्तों पर शांति की मेज बिछाना चाहता है।

आतंकवाद पर जीरो टॉलरेंस और सुरक्षा की चुनौती

हालांकि बातचीत का समर्थन किया गया है, लेकिन जनरल नरवणे ने यह भी साफ कर दिया कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद पर कोई ढील नहीं दी जा सकती। उन्होंने भारतीय सेना की उस 'जीरो टॉलरेंस' नीति का समर्थन किया, जिसके तहत घुसपैठ और आतंकी हमलों का जवाब सीधे सीमा पर दिया जाता है।

सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक पाकिस्तान अपनी जमीन से चलने वाले आतंकी ठिकानों पर लगाम नहीं लगाता, तब तक आधिकारिक या उच्च स्तरीय राजनीतिक वार्ता संभव नहीं है। लेकिन सांस्कृतिक और नागरिक स्तर पर संपर्क बनाए रखना एक 'बफर' की तरह काम कर सकता है।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और जनता पर प्रभाव

इस बयान के आने के बाद विपक्षी दलों की ओर से भी प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। कुछ विपक्ष के नेताओं ने इसे सरकार की नीति में विरोधाभास बताया है, तो कुछ ने इसे आरएसएस के नजरिए में बदलाव के रूप में देखा है।

आम जनता के बीच भी इस मुद्दे पर मिली-जुली राय है। सोशल मीडिया पर कई लोग जहां इस 'शांति की पहल' का स्वागत कर रहे हैं, वहीं एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो मानता है कि जब तक सीमा पार से गोलियां आनी बंद नहीं होतीं, तब तक बातचीत का कोई मतलब नहीं है।

पूर्व सेना प्रमुख एम.एम. नरवणे का आरएसएस नेता के बयान का समर्थन करना यह दर्शाता है कि भारत के सामरिक नेतृत्व में अब 'हार्ड पावर' और 'सॉफ्ट पावर' के संतुलन को लेकर गंभीर मंथन चल रहा है। यह स्पष्ट है कि भारत अपनी सुरक्षा से समझौता किए बिना शांति के हर उस मौके को परखना चाहता है जो दक्षिण एशिया में स्थिरता ला सके।

चाहे वह खेल हो, व्यापार हो या सांस्कृतिक आदान-प्रदान, संवाद की यह "खिड़की" कितनी खुल पाएगी, यह पूरी तरह पाकिस्तान के आगामी कदमों और उसकी आतंकवाद विरोधी कार्रवाई पर निर्भर करेगा। फिलहाल, नरवणे और होसबोले के बयानों ने भारत-पाक रिश्तों की जमी हुई बर्फ पर एक नई गर्माहट पैदा करने की कोशिश जरूर की है।

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