Punjab Congress Crisis Explained: पोस्टर वॉर से ‘Go Back Baghel’ तक, आखिर क्यों बंटी कांग्रेस?
“गो बैक बघेल” के पोस्टर लगने के साथ ही यह विवाद एक नया मोड़ ले चुका है। भूपेश बघेल कोई प्रदेश स्तर के नेता नहीं हैं - वे हाईकमान की तरफ से भेजे गए पार्टी प्रभारी हैं। ऐसे में जब उनके खिलाफ ही नारे लगें और उनकी तस्वीर पर सवाल उठें, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पंजाब के कार्यकर्ता अब सिर्फ आपस में नहीं लड़ रहे, बल्कि सीधे दिल्ली की कमान को भी चुनौती दे रहे हैं।
नई दिल्ली: पंजाब में विधानसभा चुनाव अभी कुछ महीने दूर हैं, लेकिन कांग्रेस के भीतर चुनाव अभी से शुरू हो चुका है, और यह चुनाव सीटों का नहीं, चेहरे का है। पार्टी अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के बीच शुरू हुई खींचतान अब पोस्टर वॉर, मंच से नारेबाज़ी और सार्वजनिक बयानबाज़ी तक पहुंच चुकी है। हैरानी की बात यह है कि इस विवाद का दायरा अब सिर्फ दो प्रदेश नेताओं तक सीमित नहीं रहा, पार्टी प्रभारी भूपेश बघेल के खिलाफ भी “गो बैक बघेल” के पोस्टर लग चुके हैं, जो सीधे हाईकमान को चुनौती देने जैसा माना जा रहा है।
मौजूदा विवाद की जड़ें 2022 विधानसभा चुनाव की हार से जुड़ी मानी जाती हैं। उस चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह हारी थी और सीटें 80 से घटकर 18 पर आ गई थीं। हार के बाद पार्टी ने संगठन में बड़े बदलाव किए और राजा वड़िंग को पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने पंजाब की 13 में से 7 सीटें जीतकर कुछ हद तक वापसी के संकेत भी दिए। लेकिन जैसे-जैसे 2027 विधानसभा चुनाव करीब आने लगा, पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर मतभेद खुलकर सामने आने लगे।
इसी दौर में पार्टी ने पूरे पंजाब में “हर बूथ कांग्रेस मजबूत” अभियान शुरू किया, जिसका मकसद बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करना और कार्यकर्ताओं को चुनाव के लिए तैयार करना था। लेकिन कई जिलों में यही अभियान संगठन की ताकत दिखाने की बजाय अंदरूनी टकराव की तस्वीर बनकर सामने आया।
बठिंडा की बैठक जहां सब कुछ खुलकर सामने आया
सबसे ज्यादा चर्चा बठिंडा की बैठक की हुई। हर बूथ कांग्रेस मजबूत मुहिम के तहत हुई इस मीटिंग में जैसे ही राजा वड़िंग बोलना शुरू करते हैं, चरणजीत सिंह चन्नी के समर्थक “चन्नी जिंदाबाद” और “राजा वड़िंग हटाओ, कांग्रेस बचाओ” के नारे लगाते हुए बाहर निकल जाते हैं। राजा वड़िंग उन्हें बार-बार बैठने की अपील करते रहे, लेकिन विरोध जारी रहा।
इससे पहले मानसा, संगरूर, बरनाला और पटियाला में भी कांग्रेस के कार्यक्रमों में इसी तरह की नारेबाज़ी की तस्वीरें सामने आ चुकी हैं। संगरूर की घटना में शामिल कुछ लोगों को कांग्रेस के मौजूदा नगर पार्षद और ज़िला परिषद सदस्य बताया गया।
एक फोन कॉल जो नहीं उठाई गई
बठिंडा कार्यक्रम के दौरान जब कुछ कार्यकर्ताओं ने ‘चन्नी जिंदाबाद’ के नारे लगाए, तो राजा वड़िंग ने नारे लगाने वाले एक युवक को खुद मंच पर बुला लिया और वहीं से चरणजीत सिंह चन्नी को फोन लगाने के लिए कहा। युवक ने फोन मिलाया, लेकिन चन्नी ने कॉल रिसीव नहीं की। इसके बाद राजा वड़िंग ने मंच से तंज कसते हुए कहा - “अपना नंबर रख लो... जब चन्नी साहब फोन करेंगे, तब मैं उठा लूंगा।” इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हुआ।
इस घटना के बाद उस युवक को लेकर भी कई दावे सामने आए। पुलिस के हवाले से कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि मई 2025 में उस पर 506 ग्राम हेरोइन के साथ गिरफ़्तार होने का आरोप है और वह फिलहाल ज़मानत पर बाहर है। यह मामला जांच का विषय है और अदालत में सिद्ध नहीं हुआ है, इसलिए इसे अंतिम तथ्य के तौर पर नहीं देखा जा सकता। चरणजीत सिंह चन्नी के करीबियों ने कहा है कि वे इस युवक को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते।
इसके बाद राजा वड़िंग अपने गृह ज़िले मुक्तसर साहिब पहुंचे, जहां वे सार्वजनिक तौर पर भावुक हो गए। उन्होंने कहा - “आज मुझे यहां आकर शांति मिली है, क्योंकि मैं अपने घर आ गया हूं... कुछ अपने भी बेगाने हो गए... मेरा कसूर सिर्फ इतना है कि जब कोई प्रधान नहीं बन रहा था, तब मुझे बना दिया गया।”:उन्होंने यह भी साफ किया कि वे प्रधान पद से इस्तीफा नहीं देंगे, क्योंकि हाईकमान ने उन्हें ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है। वहीं चन्नी के साथ रिश्तों पर पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा - “चन्नी साहब मेरे बड़े भाई हैं... अगर कोई नाराज़गी है, तो वही बता सकते हैं।”
पोस्टर वॉर: जब दीवारों पर लड़ाई लड़ी जाने लगी
बठिंडा की घटना अकेली नहीं थी। पंजाब के अलग-अलग जिलों में पोस्टर वॉर भी खुलकर सामने आने लगी। जहां चरणजीत सिंह चन्नी के समर्थन में पोस्टर लगते, वहां राजा वड़िंग की तस्वीर गायब मिलती। और जहां वड़िंग के हक़ में पोस्टर लगते, वहां चन्नी का चेहरा नदारद रहता।
मुक्तसर साहिब में - जो राजा वड़िंग का अपना गृह ज़िला है - पार्टी प्रभारी भूपेश बघेल के खिलाफ पोस्टर लगे। भूपेश बघेल को अंग्रेज़ी हुकूमत के अफसर साइमन के रूप में दिखाया गया और नीचे लिखा गया “गो बैक बघेल”। कुछ जगहों पर “राजा-बघेल हटाओ, पंजाब बचाओ” जैसे पोस्टर भी सामने आए। माना जा रहा है कि यह पोस्टर चन्नी समर्थकों ने लगाए, हालांकि किसी पोस्टर पर यह स्पष्ट नहीं लिखा कि इसे किसने छपवाया या लगवाया।
उधर फिरोज़पुर में चन्नी के समर्थन और विरोध, दोनों तरह के पोस्टर सामने आए। एक तरफ फिरोज़पुर के एक कार्यक्रम के पोस्टर में राजा वड़िंग की तस्वीर गायब मिली, तो दूसरी तरफ फिरोज़पुर कैंट में विवादित पोस्टर लगे जिनमें चन्नी को आरएसएस की वर्दी में दिखाया गया - नीचे लिखा गया "चन्नी भगाओ, कांग्रेस बचाओ" और "राहुल गांधी जी सुनो कांग्रेसियों की पुकार, चन्नी को करो कांग्रेस से बाहर।" इन पोस्टरों पर भी यह साफ नहीं है कि इन्हें किसने लगवाया।
हाईकमान का नुमाइंदा भी निशाने पर
“गो बैक बघेल” के पोस्टर लगने के साथ ही यह विवाद एक नया मोड़ ले चुका है। भूपेश बघेल कोई प्रदेश स्तर के नेता नहीं हैं - वे हाईकमान की तरफ से भेजे गए पार्टी प्रभारी हैं। ऐसे में जब उनके खिलाफ ही नारे लगें और उनकी तस्वीर पर सवाल उठें, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पंजाब के कार्यकर्ता अब सिर्फ आपस में नहीं लड़ रहे, बल्कि सीधे दिल्ली की कमान को भी चुनौती दे रहे हैं।
भूपेश बघेल लगातार यह कहते रहे कि पार्टी पूरी तरह एकजुट है और कार्यकर्ताओं के बीच जो मतभेद दिखाई दे रहे हैं, उन्हें बातचीत से सुलझा लिया जाएगा। लेकिन ज़मीनी तस्वीर कुछ और ही कहानी कह रही है। पोस्टर, नारे, मंचों से खुले बयान - और अब हाईकमान के प्रतिनिधि तक पहुंचा विरोध - यह साफ संकेत देते हैं कि यह विवाद सिर्फ संगठनात्मक मतभेद नहीं, बल्कि पार्टी अनुशासन की भी बड़ी परीक्षा बन चुका है।
विवाद बढ़ने के बीच कांग्रेस हाईकमान ने सार्वजनिक तौर पर संगठनात्मक अनुशासन पर ज़ोर देना शुरू कर दिया है। पंजाब प्रभारी भूपेश बघेल ने हालिया बैठकों में कार्यकर्ताओं को चेतावनी दी कि पार्टी के भीतर अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं की जाएगी और ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई भी हो सकती है। उन्होंने यह भी दोहराया कि पंजाब कांग्रेस में मुख्यमंत्री का चेहरा चुनाव से पहले नहीं, बल्कि चुनाव के बाद विधायक दल और हाईकमान के निर्णय से तय होगा।
संगठन बनाम चेहरा: असली विवाद किस बात का है
पंजाब कांग्रेस के भीतर अब दो अलग-अलग राजनीतिक सोच आमने-सामने हैं। राजा वड़िंग और उनके समर्थकों का कहना है कि पार्टी की पहली प्राथमिकता संगठन को मजबूत करना है - पहले बूथ स्तर पर तैयारी, फिर चुनाव, और उसके बाद विधायक दल व हाईकमान मिलकर तय करेंगे कि मुख्यमंत्री का चेहरा कौन होगा। उनका तर्क है कि चेहरा तय करने की जल्दबाज़ी चुनाव से पहले संगठन को कमज़ोर कर सकती है।
दूसरी तरफ, चरणजीत सिंह चन्नी के समर्थकों का मानना है कि पंजाब में कांग्रेस का सबसे लोकप्रिय चेहरा चन्नी ही हैं, और 2027 में सत्ता में वापसी करनी है तो मुख्यमंत्री का चेहरा अभी से घोषित कर देना चाहिए। बठिंडा समेत कई बैठकों में कार्यकर्ताओं ने खुलकर यह मांग दोहराई है।
इस पूरे विवाद के बीच एक बात लगभग साफ दिखाई दे रही है। हाईकमान फिलहाल राजा वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखने के फैसले पर कायम है। भूपेश बघेल पहले भी सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं कि प्रदेश अध्यक्ष बदलना "गुड़्डा-गुड़्डी का खेल नहीं" है। वहीं चन्नी समर्थक लगातार अपनी आपत्तियां हाईकमान के सामने रखते रहे हैं, लेकिन अब तक संगठन में किसी बड़े बदलाव का संकेत नहीं मिला है। ऐसे में माना जा रहा है कि कांग्रेस फिलहाल नेतृत्व परिवर्तन की बजाय संगठन को चुनाव तक स्थिर रखने की रणनीति पर काम कर रही है।
यानी बहस अब सिर्फ राजा वड़िंग और चरणजीत सिंह चन्नी के बीच की नहीं रही - यह संगठन बनाम चेहरा, और रणनीति बनाम लोकप्रियता की बहस बन चुकी है।
पहले भी दोहरा चुकी है कांग्रेस यह गलती
पंजाब कांग्रेस की यह खींचतान अकेली नहीं है - यह कांग्रेस के लिए एक दोहराया जाने वाला पैटर्न बन चुका है। राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच लंबे समय तक टकराव चला। हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कुमारी सैलजा के मतभेद खुलकर सामने आए। मध्य प्रदेश में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया की खींचतान आखिरकार पार्टी के टूटने तक पहुंच गई। और खुद पंजाब में 2021 में कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के विवाद ने कांग्रेस को बड़ा राजनीतिक नुकसान पहुंचाया था।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव से पहले किसी भी पार्टी की सबसे बड़ी ताकत उसका एकजुट संगठन होता है। लेकिन अगर कार्यकर्ता ही अलग-अलग गुटों में बंट जाएं, तो चुनावी तैयारी कमज़ोर पड़ जाती है, क्योंकि जनता सिर्फ नेताओं के बयान नहीं देखती, बल्कि यह भी देखती है कि पार्टी खुद कितनी एकजुट है।
विपक्ष की प्रतिक्रिया
इस पूरे विवाद पर आम आदमी पार्टी लगातार कह रही है कि यह कांग्रेस की अपनी आंतरिक लड़ाई है और उसका इससे कोई लेना-देना नहीं। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कटाक्ष करते हुए कहा - "हमें कांग्रेस की तरफ ध्यान देने की ज़रूरत नहीं, वे तो अपनी बेड़ी आप ही डुबा रहे हैं।"
वहीं भाजपा की तरफ से यह कहा गया कि कांग्रेस के नेता कुर्सी की लड़ाई में उलझे हैं और पार्टी के पास पंजाब के लिए कोई ठोस विज़न नहीं बचा। दोनों ही पक्षों ने एक-दूसरे पर इस गुटबाज़ी को हवा देने के आरोप भी लगाए हैं, हालांकि इन आरोपों के समर्थन में अब तक कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है।
आगे क्या
अब निगाहें सिर्फ पंजाब कांग्रेस पर नहीं... बल्कि कांग्रेस हाईकमान के अगले कदम पर भी टिकी हैं। हाल के घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि मतभेद अब बंद कमरों तक सीमित नहीं रहे। नारेबाज़ी, पोस्टर वॉर और सार्वजनिक बयानबाज़ी ने पार्टी के भीतर की खाई को खुलकर सामने ला दिया है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हाईकमान अनुशासन के जरिए इस विवाद को थामेगी... या फिर चुनाव से पहले किसी बड़े राजनीतिक फैसले का रास्ता चुनेगी? आने वाले दिनों में यही तय करेगा कि पंजाब कांग्रेस 2027 की तैयारी एकजुट होकर करेगी... या फिर अंदरूनी कलह उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी रहेगी।