चंडीगढ़: पंजाब में विधानसभा चुनाव भले ही अगले साल होने हों, लेकिन राजनीतिक दलों ने अभी से चुनावी जमीन तैयार करनी शुरू कर दी है। राज्य की राजनीति में इस समय सबसे ज्यादा चर्चा दलित वोट बैंक को लेकर हो रही है। पंजाब देश का ऐसा राज्य है, जहां अनुसूचित जाति (दलित) समुदाय की आबादी सबसे अधिक है। ऐसे में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले प्रमुख राजनीतिक दल इस वर्ग का भरोसा जीतने के लिए अलग-अलग रणनीतियों पर काम कर रहे हैं।

खास तौर पर रविदासिया समुदाय को लेकर आम आदमी पार्टी (AAP) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपने अभियान तेज कर दिए हैं। दोनों दल धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक आयोजनों के जरिए इस प्रभावशाली समुदाय के बीच अपनी मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।

AAP का फोकस सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रमों पर

पंजाब की भगवंत मान सरकार ने संत गुरु रविदास की 650वीं जयंती को व्यापक स्तर पर मनाने की योजना बनाई है। इसके लिए पूरे वर्ष का कार्यक्रम कैलेंडर तैयार किया गया है, जिसमें धार्मिक आयोजनों के साथ सामाजिक और शैक्षणिक गतिविधियों को भी शामिल किया गया है।

सरकार की योजना के तहत जिला स्तर पर कीर्तन दरबार, शोभा यात्राएं, सेमिनार, व्याख्यान और विभिन्न शिक्षण संस्थानों में कार्यशालाएं आयोजित की जाएंगी। स्कूलों और कॉलेजों में निबंध लेखन, चित्रकला, भाषण और प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिताओं के जरिए भी युवाओं को गुरु रविदास के विचारों से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

गांव-गांव पहुंच रही डॉक्यूमेंट्री

राज्य सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच बनाने के लिए विशेष अभियान भी शुरू किया है। मोबाइल एलईडी वैन के माध्यम से संत गुरु रविदास के जीवन और उनके संदेश पर आधारित एक डॉक्यूमेंट्री गांवों में दिखाई जा रही है।

सरकारी अधिकारियों के अनुसार, इस अभियान का उद्देश्य हजारों गांवों तक पहुंचकर समाज के विभिन्न वर्गों को गुरु रविदास के जीवन, समानता और सामाजिक न्याय के संदेश से जोड़ना है।

इसके अलावा ड्रोन शो, मैराथन, साइकिल रैली, रक्तदान शिविर और अन्य जनभागीदारी कार्यक्रम भी प्रस्तावित किए गए हैं। साथ ही डेरा सचखंड बल्लां के निकट गुरु रविदास बानी अनुसंधान केंद्र के निर्माण पर भी काम चल रहा है।

बीजेपी भी चला रही विशेष अभियान

दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी भी रविदासिया समुदाय के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए लगातार सक्रिय है।

हाल के महीनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरु रविदास से जुड़े कार्यक्रमों में भाग लिया और श्रद्धालुओं से संवाद किया। इसके अलावा गुरु रविदास से जुड़े धार्मिक स्थलों और यात्रा सुविधाओं को लेकर भी कई पहल की गई हैं।

बीजेपी अब संत गुरु रविदास की जन्मस्थली से पवित्र मिट्टी लेकर पंजाब के विभिन्न धार्मिक स्थलों तक पहुंचाने के लिए विशेष 'कलश यात्रा' निकालने की तैयारी कर रही है। पार्टी का मानना है कि इस अभियान से समाज के साथ उसका संवाद और मजबूत होगा।

क्यों अहम है रविदासिया समुदाय?

पंजाब की राजनीति में रविदासिया समुदाय का विशेष महत्व माना जाता है। राज्य के दोआबा क्षेत्र—जालंधर, होशियारपुर, कपूरथला और शहीद भगत सिंह नगर—में इस समुदाय का प्रभाव काफी मजबूत है।

डेरा सचखंड बल्लां को रविदासिया समाज की प्रमुख धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं में गिना जाता है। देश और विदेश में इसके बड़ी संख्या में अनुयायी हैं, जिससे इस क्षेत्र का राजनीतिक महत्व और बढ़ जाता है।

इसी कारण चुनावी रणनीति बनाते समय लगभग सभी दल इस समुदाय तक अपनी पहुंच मजबूत करने की कोशिश करते हैं।

दलित वोट बैंक बना चुनावी समीकरण का केंद्र

2011 की जनगणना के अनुसार पंजाब में अनुसूचित जाति समुदाय की आबादी करीब 32 प्रतिशत है, जो देश में सबसे अधिक मानी जाती है। यही वजह है कि राज्य के चुनावी समीकरणों में दलित मतदाताओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रहती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी बड़े दल के लिए इस वोट बैंक का समर्थन चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकता है, खासकर दोआबा जैसे क्षेत्रों में।

कांग्रेस और अकाली दल की रणनीति पर नजर

फिलहाल कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल की ओर से गुरु रविदास की 650वीं जयंती को लेकर किसी बड़े अभियान की घोषणा नहीं की गई है। हालांकि दोनों दलों के नेता समय-समय पर रविदासिया समाज के धार्मिक आयोजनों में शामिल होते रहे हैं।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आएंगे, अन्य दल भी इस समुदाय के बीच अपनी सक्रियता बढ़ा सकते हैं।

चुनाव से पहले तेज होगी सियासी गतिविधियां

हाल के महीनों में सामाजिक और राजनीतिक घटनाओं ने दलित समाज से जुड़े मुद्दों को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। ऐसे में यह साफ संकेत मिल रहे हैं कि 2027 के चुनाव से पहले पंजाब में दलित वोट बैंक और रविदासिया समुदाय को लेकर राजनीतिक गतिविधियां और तेज होंगी।

अब देखना दिलचस्प होगा कि धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रमों के जरिए शुरू हुई यह राजनीतिक कवायद चुनावी समर्थन में कितनी बदलती है और इसका असर पंजाब के आगामी विधानसभा चुनाव पर कितना पड़ता है।