‘सतलुज’ पर सस्पेंस खत्म? सरकारी कमेटी ने सुनाया फैसला, जानिए पूरा घटनाक्रम

फिल्म का भविष्य अब तीन जगहों पर तय होगा, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में लंबित याचिका, केंद्र सरकार का इस IDC सिफारिश पर आधिकारिक फैसला, और पंजाब की सड़कों पर जारी जनदबाव। सरकार ने अब तक फिल्म पर कोई विस्तृत आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है, लेकिन सूत्रों के हवाले से आ रही आज की रिपोर्ट यह संकेत देती है कि फिलहाल फिल्म को ओटीटी पर वापस लाने की संभावना धूमिल होती दिख रही है।

By  Gurpreet Kaur July 11th 2026 02:56 PM

नई दिल्ली: दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ को OTT प्लेटफॉर्म ZEE5 से हटे अब एक हफ्ता होने को है, लेकिन विवाद थमने के बजाय हर दिन एक नया मोड़ ले रहा है। जिस फिल्म को दिल्ली-मुंबई के दफ्तरों से रोका जाना था, वो पेन ड्राइव, व्हाट्सऐप, प्रोजेक्टर और डीजे स्क्रीन के ज़रिए पंजाब के गांव-गांव और गुरुद्वारे-गुरुद्वारे पहुंच चुकी है। और अब, आज सामने आए एक बड़े अपडेट ने इस पूरे विवाद को एक नए और निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है। सरकार की अपनी समीक्षा समिति ने सिफारिश की है कि फिल्म पर लगा बैन जारी रहना चाहिए।


दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी स्क्रीनिंग की घोषणा कर चुकी है, SGPC सड़कों पर उतर चुकी है, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल हो चुकी है, और अब सवाल सिर्फ एक फिल्म का नहीं रहा, सवाल अभिव्यक्ति की आज़ादी का भी है, इतिहास की व्याख्या का भी, और राष्ट्रीय सुरक्षा का भी। यह रिपोर्ट इस पूरी कहानी को शुरुआत से आज तक, हर अपडेट के साथ समझने की कोशिश है।




सरकारी समिति ने बैन बरकरार रखने की सिफारिश की


सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा आईटी नियम 2021 के तहत गठित इंटर-डिपार्टमेंटल कमेटी (IDC) ने अपनी समीक्षा पूरी कर ली है, और सरकारी सूत्रों के मुताबिक समिति ने सिफारिश की है कि फिल्म का ऑनलाइन स्ट्रीमिंग के ज़रिए सार्वजनिक प्रदर्शन प्रतिबंधित ही रहना चाहिए। समिति का कहना है कि फिल्म कथित तौर पर देश की संप्रभुता और अखंडता के खिलाफ जाती है। यह सिफारिश अभी अंतिम आधिकारिक आदेश नहीं है, लेकिन इसे इस विवाद में सरकार के रुख का अब तक का सबसे स्पष्ट संकेत माना जा रहा है।


गौरतलब है कि यह वही समिति है, जिसे 7 जुलाई को केंद्र सरकार ने आईटी एक्ट की धारा 69ए और आईटी नियम 2021 के तहत गठित किया था। धारा 69ए सरकार को देश की संप्रभुता-अखंडता, रक्षा, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंध और सार्वजनिक व्यवस्था जैसे आधारों पर ऑनलाइन कंटेंट को ब्लॉक करने का अधिकार देती है। 


सरकारी सूत्रों का कहना था कि निर्माताओं ने सेंसर बोर्ड की तरफ से सुझाए गए कट्स पर लंबे समय तक कोई फैसला नहीं लिया, और आखिरकार बिना कट के फिल्म को एक नए नाम से चुपचाप ओटीटी पर रिलीज़ कर दिया, जबकि ओटीटी सीबीएफसी के दायरे में नहीं आता। यही वजह बताई गई कि जैसे ही मामला सरकार के संज्ञान में आया, ZEE5 को इसे हटाने का निर्देश दिया गया।




फिल्म का सफर: चार साल, तीन नाम, और अचानक वापसी


फिल्म ‘सतलुज’ की कहानी की शुरुआत आज से करीब चार साल पहले हुई थी, जब इसका पहला टाइटल ‘घल्लूघारा’ रखा गया था, यह वही ऐतिहासिक शब्द है जो सिखों के खिलाफ हुए 1746, 1762 और 1984 के नरसंहारों के लिए इस्तेमाल होता है। बाद में इसका नाम बदलकर ‘पंजाब 95’ किया गया। 2022 के आखिर में यह फिल्म प्रमाणन के लिए सेंसर बोर्ड यानी CBFC के पास पहुंची, जहां बोर्ड ने फिल्म में कई कट्स और बदलाव सुझाए। मीडिया रिपोर्टों में यह आंकड़ा 127 तक बताया गया। निर्माता हनी त्रेहान, प्रोड्यूसर रॉनी स्क्रूवाला (RSVP) और अभिनेता दिलजीत दोसांझ ने इन कट्स को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद फिल्म की रिलीज़ करीब तीन साल तक सेंसर विवाद में फंसी रही।


आखिरकार 3 जुलाई 2026 को यह फिल्म बिना किसी कट के ‘सतलुज’ नाम से ZEE5 ग्लोबल पर रिलीज़ हुई। लेकिन रिलीज़ के ठीक 48 घंटे बाद, 5 जुलाई की शाम को भारत में इसे प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया। ZEE5 ने अपने इंस्टाग्राम बयान में सिर्फ इतना कहा कि ‘मौजूदा हालात’ को देखते हुए फिल्म को भारत में अगली सूचना तक अनुपलब्ध रखा जा रहा है, हालांकि प्लेटफॉर्म ने दर्शकों का शुक्रिया अदा करते हुए यह भी कहा कि वह फिल्म के समर्थन में बना रहेगा। फिल्म अब भी ZEE5 ग्लोबल के ज़रिए भारत के बाहर के दर्शकों के लिए उपलब्ध है। फिल्म में दिलजीत दोसांझ के अलावा अर्जुन रामपाल, कंवलजीत सिंह, सुविंदर विक्की और गीतिका विद्या ओहल्यान भी अहम भूमिकाओं में हैं।




जसवंत सिंह खालड़ा: वो नाम, जिसकी कहानी पर पूरा विवाद टिका है


फिल्म ‘सतलुज’ मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की सच्ची कहानी है, एक ऐसा व्यक्ति जिसने उन हज़ारों लोगों की तलाश शुरू की, जिन्हें उनके अपने परिवार वर्षों से ढूंढ रहे थे, और आखिर में खुद ही लापता हो गया।


दो नवंबर 1952 को अमृतसर ज़िले के खालड़ा गांव में जन्मे जसवंत सिंह खालड़ा पेशे से एक बैंक अधिकारी थे। 1980-90 के दशक के उथल-पुथल भरे दौर में उन्होंने मानवाधिकार से जुड़े मामलों पर काम करना शुरू किया, और जनवरी 1995 में शिरोमणि अकाली दल की मानवाधिकार इकाई के महासचिव बने। उन्होंने अमृतसर, तरनतारन और पट्टी के श्मशान घाटों के रिकॉर्ड का अध्ययन कर यह दावा किया कि 1984 से 1994 के बीच हज़ारों लोगों को, जिनकी पहचान से जुड़े दस्तावेज़ मौजूद थे, ‘लावारिस’ या ‘अज्ञात’ बताकर जला दिया गया। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया कि यह सिर्फ मुठभेड़ें नहीं, बल्कि सरकार-प्रायोजित हत्याएं थीं, और कुल संख्या पच्चीस हज़ार से ज़्यादा हो सकती है।


इकतीस अगस्त 1995 को तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की बम धमाके में हत्या हुई, और ठीक एक हफ्ते बाद, छह सितंबर 1995 को खालड़ा को उनके अमृतसर स्थित घर के बाहर से अगवा कर लिया गया। उनकी पत्नी परमजीत कौर खालड़ा की शिकायत पर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जिसके निर्देश पर सीबीआई जांच शुरू हुई। जांच में सामने आया कि खालड़ा को अवैध हिरासत में प्रताड़ित कर उनकी हत्या की गई और शव हरीके नहर में फेंक दिया गया। 


2005 में विशेष सीबीआई अदालत ने कई पुलिस अधिकारियों को दोषी करार दिया, 2007 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सज़ा बढ़ाकर उम्रकैद कर दी, और 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। यानी यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि देश की सर्वोच्च अदालतों से प्रमाणित एक मामला है।


हालांकि कुछ पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों और विश्लेषकों का यह भी कहना है कि उस दौर को केवल एक नज़रिए से नहीं देखा जा सकता, क्योंकि उस समय हज़ारों आम नागरिक और सुरक्षाकर्मी भी हिंसा का शिकार हुए थे, इसलिए किसी भी कहानी को उसके पूरे ऐतिहासिक संदर्भ में देखा जाना ज़रूरी है।



दिलजीत का जवाब: “मुझे पहले से अंदाज़ा था”


फिल्म हटाए जाने के बाद दिलजीत दोसांझ ने इंस्टाग्राम पर एक भावुक वीडियो पोस्ट किया। पंजाबी में दिए बयान में उन्होंने कहा कि उन्हें शुक्रवार को ही आशंका हो गई थी कि फिल्म पर बैन लग सकता है, इसलिए इसे बिना किसी पूर्व प्रचार के अचानक रिलीज़ किया गया, उनका मानना था कि अगर दो दिन पहले से प्रचार होता, तो शायद फिल्म रिलीज़ ही नहीं हो पाती। 


उन्होंने बताया कि उसी सुबह उन्होंने एक गुरुद्वारे में प्रोजेक्टर पर फिल्म की स्क्रीनिंग का वीडियो देखा, और कहा कि अब हर घर में जसवंत सिंह खालड़ा की चर्चा हो रही है, जितना रोकने की कोशिश होगी, उतनी ही ज़्यादा लोग बात करेंगे। फिल्म की सह-कलाकार गीतिका विद्या ओहल्यान ने भी एक भावुक पोस्ट में फिल्म के इस सफर पर लिखा कि उन्हें यह अनुभव 'पूरा होकर भी अधूरा' महसूस हो रहा है।



पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में जनहित याचिका


9 जुलाई को अधिवक्ता शरवन सिंह ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत एक जनहित याचिका दाखिल की, जिसमें केंद्र सरकार, सेंसर बोर्ड, पंजाब सरकार, ज़ी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइज़ेज़ और ZEE5 को पक्षकार बनाया गया है। याचिका में कहा गया है कि फिल्म को बिना किसी सार्वजनिक कानूनी या न्यायिक आदेश के हटाना संविधान के अनुच्छेद उन्नीस के तहत मिली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिकों के सूचना पाने के अधिकार का उल्लंघन है।


याचिका में यह तर्क भी दिया गया है कि यह फिल्म एक सच्ची घटना और एक ऐसे मानवाधिकार कार्यकर्ता के जीवन पर आधारित है, जिसका मामला पहले ही संवैधानिक अदालतों में साबित हो चुका है, इसलिए यह किसी भी तरह देश की संप्रभुता-अखंडता को प्रभावित नहीं करती और न ही सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाड़ने का इरादा रखती है। 


याचिका में भुगतान कर चुके दर्शकों के अधिकारों की अनदेखी का सवाल भी उठाया गया है। मामले पर आने वाले दिनों में सुनवाई होने की उम्मीद है, और कानूनी जानकारों का कहना है कि अदालत का फैसला यह तय करेगा कि क्या कार्यपालिका के ज़रिए हुई ऐसी 'पोस्ट-पब्लिकेशन सेंसरशिप' संवैधानिक जांच में टिक पाती है या नहीं।



पंजाब सड़कों पर: SGPC से अकाली दल तक, हर तरफ से विरोध


फिल्म हटाए जाने के फैसले के खिलाफ पंजाब में सबसे बड़ा प्रदर्शन शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) की तरफ से हुआ। अध्यक्ष एडवोकेट हरजिंदर सिंह धामी के नेतृत्व में अमृतसर में स्वर्ण मंदिर परिसर से डिप्टी कमिश्नर कार्यालय तक एक विशाल रोष मार्च निकाला गया, जिसके बाद राष्ट्रपति के नाम मांगपत्र सौंपा गया और 14 जुलाई को सतलुज नदी किनारे अरदास का ऐलान हुआ।


शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने फिल्म हटाए जाने को ‘सामूहिक स्मृति, सत्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला’ बताते हुए ऐलान किया कि पार्टी पंजाब के हर गांव-कस्बे में खुद इसकी स्क्रीनिंग कराएगी। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष हरमीत सिंह कालका ने गुरुद्वारों के अलावा स्कूल-कॉलेजों में भी स्क्रीनिंग और सेमिनार कराने का ऐलान किया। 


पंजाब विधानसभा अध्यक्ष कुलतार सिंह संधवां ने सवाल उठाया कि जब यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, तो फिर इसे दिखाने पर आपत्ति क्यों। आम आदमी पार्टी ने भी फिल्म हटाए जाने की आलोचना की और साफ किया कि गांवों-गुरुद्वारों में निजी स्क्रीनिंग का वह विरोध नहीं करेगी।


दूसरी तरफ केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने दिलजीत पर तीखा हमला बोलते हुए उन्हें ‘बहुरूपिया’ करार दिया और आरोप लगाया कि पंजाब का दर्द बेचकर पैसा कमाया जा रहा है, हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि फिल्म को ओटीटी से हटाने का फैसला सरकार का नहीं था, जिससे यह सवाल और गहरा हो गया कि आखिर फैसला किस स्तर पर और किन परिस्थितियों में लिया गया।


ज़मीन पर हकीकत यह है कि सरकारी पाबंदी के बावजूद फिल्म गांव-गांव पहुंच चुकी है। भारतीय किसान यूनियन के पंजाब यूथ अध्यक्ष इंद्रपाल सिंह बैंस के मुताबिक गांवों में उपलब्ध सभी प्रोजेक्टर 15 अगस्त तक बुक हो चुके हैं, और लोग पांच हज़ार रुपये तक खर्च कर डीजे एलईडी स्क्रीन किराए पर ले रहे हैं। फिल्म की सॉफ्ट कॉपी पेन ड्राइव और व्हाट्सऐप के ज़रिए बांटी जा रही है। 


फिल्म इंडस्ट्री से भी समर्थन लगातार बढ़ रहा है, फिल्ममेकर अनुराग बासु ने हनी त्रेहान की तुलना ईरानी फिल्मकार जाफर पनाही से की, अनुराग कश्यप ने कहा कि पाबंदी लोगों की उत्सुकता और बढ़ा देती है, और नीरू बाजवा, रणवीर शौरी व जसबीर जस्सी जैसी हस्तियों ने भी पारदर्शिता की मांग उठाई।




अब आगे क्या?


फिल्म का भविष्य अब तीन जगहों पर तय होगा, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में लंबित याचिका, केंद्र सरकार का इस IDC सिफारिश पर आधिकारिक फैसला, और पंजाब की सड़कों पर जारी जनदबाव। सरकार ने अब तक फिल्म पर कोई विस्तृत आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है, लेकिन सूत्रों के हवाले से आ रही आज की रिपोर्ट यह संकेत देती है कि फिलहाल फिल्म को ओटीटी पर वापस लाने की संभावना धूमिल होती दिख रही है।


लेकिन विडंबना यही है कि जिस फिल्म को स्क्रीन से मिटाने की कोशिश हुई, वो अब गांव-गांव, गुरुद्वारे-गुरुद्वारे, हर मोबाइल फोन तक पहुंच चुकी है। सवाल अब भी वही हैं, जिनसे यह बहस शुरू हुई थी, अगर किसी सेंसर-प्रमाणित फिल्म से असहमति है, तो जवाब प्रतिबंध है या बहस? अगर राष्ट्रीय सुरक्षा की कोई ठोस चिंता है, तो उसका कारण पारदर्शी तरीके से सामने क्यों नहीं आता? और क्या किसी ऐतिहासिक अध्याय को, जिसे अदालतें पहले ही प्रमाणित कर चुकी हैं, नई पीढ़ी से पूरी तरह छुपाया जा सकता है?


नोट: यह रिपोर्ट 11 जुलाई 2026 तक उपलब्ध जानकारी पर आधारित है। यह एक लगातार बदलता मामला है, इसलिए हाईकोर्ट की सुनवाई और सरकार के अंतिम फैसले के साथ स्थिति आगे बदल सकती है।

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