पंजाब की राजनीति में इन दिनों शिरोमणि अकाली दल (SAD) और आम आदमी पार्टी (AAP) के बीच सियासी टकराव तेज हो गया है। एक ओर अकाली दल कथित बेअदबी वीडियो विवाद और धार्मिक मुद्दों को लेकर मुख्यमंत्री भगवंत मान पर लगातार हमला बोल रहा है, वहीं दूसरी ओर पार्टी के भीतर नेताओं के लगातार इस्तीफे और दूसरी पार्टियों में शामिल होने की घटनाएं उसकी संगठनात्मक स्थिति पर सवाल खड़े कर रही हैं।
पिछले कुछ दिनों में अकाली दल के कई वरिष्ठ और स्थानीय नेताओं ने पार्टी छोड़कर आम आदमी पार्टी (AAP) या अन्य राजनीतिक संगठनों का दामन थाम लिया है। राजनीतिक जानकार इसे आगामी चुनावों से पहले पंजाब की राजनीति में बदलते समीकरणों का संकेत मान रहे हैं।
लगातार हो रहे हैं सियासी झटके
21 जून को संगरूर जिले के लहरागागा विधानसभा क्षेत्र के कई स्थानीय अकाली दल और कांग्रेस नेताओं ने कैबिनेट मंत्री बरिंदर कुमार गोयल की मौजूदगी में आम आदमी पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। इसके बाद 23 जून को अकाली दल के उपाध्यक्ष सुमेर सिरा ने पार्टी से इस्तीफा देकर संगठन के भीतर असंतोष को खुलकर सामने ला दिया।
सुमेर सिरा ने आरोप लगाया कि पार्टी में कुछ प्रभावशाली लोगों का वर्चस्व बढ़ गया है और पुराने कार्यकर्ताओं को उचित महत्व नहीं मिल रहा। उनके अनुसार संगठन में फैसले सीमित लोगों तक सिमट गए हैं, जिससे जमीनी कार्यकर्ताओं में नाराजगी बढ़ रही है।
AAP और अन्य दलों में बढ़ रहा नेताओं का रुझान
26 जून को अकाली दल को एक और झटका तब लगा, जब कादियां विधानसभा क्षेत्र से जुड़े नेता गुरइकबाल सिंह महल आम आदमी पार्टी में शामिल हो गए। कुछ ही दिनों बाद उन्हें AAP ने कादियां विधानसभा का प्रभारी भी नियुक्त कर दिया।
इसी दौरान पूर्व विधायक दर्शन सिंह शिवालिक ने भी अकाली दल छोड़कर 'अकाली दल वारिस पंजाब दे' का दामन थाम लिया। इस मौके पर पार्टी के वरिष्ठ नेता मनप्रीत सिंह अयाली भी मौजूद रहे, जो पहले ही अकाली दल से अलग हो चुके हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लगातार हो रहे इन इस्तीफों से अकाली दल की संगठनात्मक मजबूती पर असर पड़ सकता है, खासकर ऐसे समय में जब पार्टी राज्यभर में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
बेअदबी विवाद बना सियासी मुद्दा
पिछले कुछ सप्ताह से पंजाब की राजनीति में कथित वायरल वीडियो और बेअदबी से जुड़े मुद्दे चर्चा के केंद्र में हैं। अकाल तख्त की ओर से मुख्यमंत्री भगवंत मान के खिलाफ की गई टिप्पणियों के बाद अकाली दल ने सरकार के खिलाफ आंदोलन तेज करने की घोषणा की है।
पार्टी ने 19 जुलाई से 'धर्म युद्ध मोर्चा' शुरू करने का ऐलान किया है। इस अभियान का उद्देश्य धार्मिक मुद्दों को लेकर सरकार पर दबाव बनाना बताया जा रहा है। इसके लिए वरिष्ठ नेता बलविंदर सिंह भुंदर की अध्यक्षता में एक समिति भी बनाई गई है, जो विभिन्न धार्मिक और सामाजिक संगठनों से संपर्क कर रही है।
पोस्टर विवाद ने बढ़ाया राजनीतिक तापमान
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) की बैठक के बाद पंजाब के कई इलाकों में मुख्यमंत्री भगवंत मान के बहिष्कार से जुड़े पोस्टर लगाए गए। इसके जवाब में कुछ स्थानों पर अकाली दल के नेताओं के खिलाफ भी पोस्टर सामने आए। बाद में प्रशासन और संबंधित पक्षों की पहल पर इन पोस्टरों को हटाया गया।
इस घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति को और अधिक गर्मा दिया। राजनीतिक दल एक-दूसरे पर धार्मिक भावनाओं को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने के आरोप लगा रहे हैं।
पंथिक दलों में भी मतभेद
अकाली दल के भीतर ही नहीं, बल्कि विभिन्न पंथिक संगठनों के बीच भी इस मुद्दे को लेकर अलग-अलग राय देखने को मिल रही है। शिरोमणि अकाली दल (पुनर सुरजीत) के प्रमुख और पूर्व जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने धार्मिक संस्थाओं के संसाधनों का राजनीतिक अभियानों में इस्तेमाल किए जाने पर सवाल उठाए।
उन्होंने कहा कि धार्मिक संस्थाओं की गरिमा और सामाजिक सौहार्द को राजनीतिक टकराव से ऊपर रखा जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने सभी पक्षों से संयम बरतने और विवाद को और अधिक बढ़ाने से बचने की अपील की।
अकाली दल का दावा, संगठन मजबूत
इन घटनाओं के बावजूद अकाली दल के वरिष्ठ नेता दलजीत सिंह चीमा ने पार्टी की स्थिति को मजबूत बताते हुए कहा कि संगठन पंथिक मुद्दों और जनता के हितों के लिए पूरी मजबूती से काम कर रहा है। उन्होंने दावा किया कि राज्यभर में पार्टी को धार्मिक और सामाजिक संगठनों का समर्थन मिल रहा है और धर्म युद्ध मोर्चा को व्यापक जनसमर्थन मिलेगा।
हालांकि दूसरी ओर लगातार नेताओं के पार्टी छोड़ने से यह साफ है कि अकाली दल को संगठनात्मक स्तर पर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। पंजाब की राजनीति में आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी इन चुनौतियों से कैसे निपटती है और आगामी चुनावों से पहले अपने जनाधार को किस तरह मजबूत करने की कोशिश करती है।
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