नई दिल्ली: क्या कोई फिल्म इतनी संवेदनशील हो सकती है कि उसका नाम एक बार नहीं, दो बार नहीं, बल्कि तीन बार बदलना पड़े? क्या किसी फिल्म को रिलीज़ होने में तीन साल लग सकते हैं, सेंसर बोर्ड 120 से ज़्यादा बदलाव मांग सकता है, थिएटर रिलीज़ न मिले, और OTT पर आने के महज़ दो दिन बाद उसे भारत से हटा दिया जाए? दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' के साथ ठीक यही हुआ है।

यह फिल्म पंजाब के उस दौर की कहानी है, जिसे लोग आज भी भूल नहीं पाए हैं। यह एक ऐसे नायक की कहानी है जिसने लावारिस लाशों को उनका नाम दिया, उनके परिवारों को उनका हक दिलाने की कोशिश की, लेकिन खुद एक दिन लापता कर दिया गया। यही वो फिल्म है जो कभी ‘घल्लूघारा’ कहलाती थी, फिर ‘पंजाब 95’ बनी, और आखिरकार ‘सतलुज’ के नाम से रिलीज़ हुई।

जसवंत सिंह खालड़ा कौन थे?

पंजाब का इतिहास जितना गौरवशाली रहा है, इसके कुछ दौर उतने ही दर्दनाक भी रहे हैं। जसवंत सिंह खालड़ा का नाम सुनते ही आज भी पंजाब का हर व्यक्ति भावुक हो उठता है।

जसवंत सिंह खालड़ा का जन्म 1952 में अमृतसर जिले के खालड़ा गांव में हुआ था। शुरुआत में उन्होंने एक बैंक में नौकरी की, लेकिन 1980 और 90 के दशक में पंजाब के उथल-पुथल भरे दौर के बीच उन्होंने मानवाधिकार से जुड़े मामलों पर काम शुरू किया। उस दौर में कई परिवारों का आरोप था कि उनके परिजन पुलिस हिरासत में लेने के बाद लापता हो गए और कभी वापस नहीं लौटे।

इन्हीं शिकायतों ने खालड़ा को सच्चाई की तलाश की राह पर आगे बढ़ाया। उन्होंने अमृतसर, तरनतारन और पट्टी के श्मशानघाटों के रिकॉर्ड का अध्ययन किया। रजिस्टरों में दर्ज नाम, उम्र, पता और अंतिम संस्कार से जुड़ी प्रविष्टियों का मिलान उन्होंने गुमशुदा लोगों के परिवारों से जुटाए गए दस्तावेज़ों से किया। उनका दावा था कि सिर्फ़ तीन श्मशानघाटों के रिकॉर्ड में ही 6 हज़ार से ज़्यादा ऐसे मामले दर्ज मिले, जिन्हें ‘अज्ञात’ या ‘लावारिस’ बताकर जलाया गया था। खालड़ा के मुताबिक़ पूरे पंजाब में ऐसे मामलों की संख्या 25 हज़ार से अधिक हो सकती है।

खालड़ा ने अपने निष्कर्ष भारत के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी रखे, जिससे वे राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में पहचाने जाने लगे। लेकिन 6 सितंबर 1995 को अमृतसर स्थित अपने घर के बाहर से वे लापता हो गए। बाद में आरोप लगे कि उनका अपहरण किया गया था। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और जांच CBI को सौंपी गई। 2005 में विशेष अदालत ने कुछ पुलिस अधिकारियों को दोषी ठहराया, जबकि 2007 में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने चार दोषी अधिकारियों की सज़ा बढ़ाकर उम्रकैद कर दी। उनकी पत्नी परमजीत कौर खालड़ा ने वर्षों तक इस मामले को अदालतों और मानवाधिकार मंचों पर उठाया।

फिल्म का सफर: तीन नाम, तीन साल, 120 से ज़्यादा कट्स

खालड़ा के इसी जीवन-संघर्ष से प्रेरित होकर निर्देशक हनी त्रेहान ने एक फिल्म बनाई, जिसमें दिलजीत दोसांझ ने उनका किरदार निभाया। फिल्म को RSVP और मैकगफिन पिक्चर्स ने प्रोड्यूस किया, जिसमें रॉनी स्क्रूवाला, हनी त्रेहान और अभिषेक चौबे शामिल थे। कलाकारों में दिलजीत दोसांझ के अलावा अर्जुन रामपाल, कंवलजीत सिंह, सुरिंदर विक्की और गीतिका विद्या ओहल्यान भी शामिल थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक़ फिल्म 2022 के अंत में CBFC को सर्टिफिकेशन के लिए भेजी गई थी।

फिल्म का नाम शुरुआत में ‘घल्लूघारा’ रखा गया था, यह वह ऐतिहासिक शब्द है जो 1746, 1762 और 1984 में सिखों के नरसंहार की घटनाओं के लिए इस्तेमाल होता है। बाद में इसे बदलकर ‘पंजाब 95’ किया गया। लेकिन विवाद यहीं नहीं थमा, रिलीज़ से पहले फिल्म का नाम तीसरी बार बदलकर ‘सतलुज’ रखा गया, जो पंजाब से गुज़रने वाली नदी का नाम है।

निर्देशक हनी त्रेहान का दावा है कि CBFC ने फिल्म में 120 से ज़्यादा (कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार 127) बदलाव और कट्स सुझाए थे, जिनमें कई संवाद, दृश्य, किरदारों के संदर्भ और संवेदनशील हिस्से शामिल थे। फिल्म के निर्देशक और निर्माता इतने बड़े पैमाने पर बदलाव के लिए तैयार नहीं थे, उनका कहना था कि इससे फिल्म अपनी मूल भावना और ऐतिहासिक संदर्भ खो देगी। यही वजह रही कि फिल्म वर्षों तक रिलीज़ नहीं हो सकी और मामला कानूनी प्रक्रिया तक पहुंचा। इसी बीच फिल्म को टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल से भी हटाया गया था, हालांकि इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे पहचान मिली, फिल्म को दो नेशनल फिल्म अवॉर्ड भी मिले।

अभिनेता दिलजीत दोसांझ ने साफ कहा था कि अगर फिल्म अपनी मूल कहानी के साथ रिलीज़ नहीं होती, तो वे उसका प्रचार नहीं करेंगे। दूसरी ओर हनी त्रेहान लगातार कहते रहे कि यह सिर्फ़ एक फिल्म नहीं, बल्कि इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय को सामने लाने की कोशिश है।

रिलीज़ और भारत में बैन

क़रीब तीन साल की कानूनी लड़ाई के बाद, थिएटर रिलीज़ की बजाय फिल्म ने OTT का रास्ता चुना। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के मुताबिक़ 'सतलुज' 3 जुलाई 2026 को ZEE5 ग्लोबल पर बिना किसी कट के, पूरी तरह अनकट वर्ज़न में रिलीज़ हुई (भारतीय मीडिया की कुछ रिपोर्ट्स में यह तारीख़ 4 जुलाई बताई गई)। पंजाब समेत देशभर में बड़ी संख्या में दर्शकों ने इसे देखना शुरू किया।

लेकिन रिलीज़ के दो दिन के भीतर ही, यानी 5 जुलाई 2026 के आसपास, ZEE5 ने इसे भारत की कैटलॉग से हटा दिया। प्लेटफ़ॉर्म ने हटाने की कोई ठोस वजह सार्वजनिक रूप से नहीं बताई। हालांकि फिल्म ZEE5 ग्लोबल पर भारत के बाहर के दर्शकों के लिए उपलब्ध बनी रही।

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में सरकारी सूत्रों के हवाले से कहा गया कि फिल्म के कुछ हिस्सों को लेकर यह आशंका जताई गई कि इसका इस्तेमाल भारत-विरोधी ताकतों द्वारा प्रोपेगैंडा फैलाने और पंजाब का माहौल बिगाड़ने के लिए किया जा सकता है, इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के मद्देनज़र इसे हटाया गया। हालांकि इस संबंध में सरकार की ओर से कोई विस्तृत, आधिकारिक और सार्वजनिक आदेश जारी नहीं किया गया है, यह अपने आप में विवाद का एक बड़ा हिस्सा बन गया है।

ZEE5, दिलजीत और हनी त्रेहान की प्रतिक्रिया

फिल्म हटाए जाने के बाद ZEE5 ने इंस्टाग्राम पर एक बयान जारी किया, जिसमें कहा गया कि ‘सतलुज’ को दर्शकों से जबरदस्त समर्थन मिला और वे हर उस दर्शक के आभारी हैं जिसने फिल्म को सब्सक्राइब कर देखा। प्लेटफ़ॉर्म ने कहा कि वे फिल्म और उसके पीछे की रचनात्मक सोच के साथ मज़बूती से खड़े हैं, और वे प्रामाणिक व सार्थक कहानियों को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। साथ ही यह भी बताया गया कि भारत में फिल्म को दोबारा उपलब्ध कराने के लिए कानूनी विकल्पों पर काम किया जा रहा है।

दिलजीत दोसांझ ने भी सोशल मीडिया और इंस्टाग्राम लाइव के ज़रिए प्रतिक्रिया दी। उन्होंने पंजाबी में लिखा कि वे अंधेरे को चुनौती देते हैं, और शहीद जसवंत सिंह खालड़ा को श्रद्धांजलि दी, यह कहते हुए कि ‘सतलुज’ के साथ भी वही हुआ जो खालड़ा साहब के साथ हुआ था।

इंस्टाग्राम लाइव में उन्होंने बताया कि फिल्म अब बिना किसी कट के आई है, जो वर्ज़न उन्होंने दो साल पहले थिएटर में देखा था, वही वर्ज़न उन्होंने हाल ही में घर पर देखा। उन्होंने यह भी कहा था कि अगर एक भी कट लगाया गया होता, तो वे फिल्म का प्रचार नहीं करते। 

उन्होंने ये भी संतोष जताया कि अब यह फिल्म हर घर तक पहुंचेगी, क्योंकि लोग इसे पहले ही डाउनलोड कर चुके हैं। एक अन्य इंटरव्यू में दिलजीत ने बताया कि खालड़ा का किरदार निभाने के बाद उन्हें इस अनुभव को समझने के लिए एक हफ़्ते का ब्रेक लेना पड़ा। उन्होंने पहले से ही यह अंदेशा जताया था कि पंजाब के इस सच को स्वीकार करना व्यवस्था के लिए आसान नहीं होगा, इसलिए फिल्म को भारत में मुश्किलें आ सकती हैं।

निर्देशक हनी त्रेहान ने भी भावुक संदेश साझा करते हुए कहा कि फिल्म को दर्शकों तक पहुंचाने का सफर बेहद लंबा और संघर्षपूर्ण रहा। उन्होंने दर्शकों का आभार जताया और उम्मीद जताई कि भारतीय दर्शक भी जल्द इसे दोबारा देख सकेंगे। उनका कहना था कि सेंसर बोर्ड के हर नियम को मानने और सारे कट्स लगाने के बाद भी फिल्म को इस तरह हटा देना अभिव्यक्ति की आज़ादी और कला के साथ नाइंसाफ़ी है।

फिल्म पर सियासत 

फिल्म हटाए जाने के बाद इस मुद्दे पर राजनीति भी गरमा गई है। आम आदमी पार्टी के नेता बलतेज पन्नू ने केंद्र सरकार पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि यह फिल्म पंजाब के उस दौर की कहानी दिखाती है जब राज्य में कांग्रेस की सरकार थी। उन्होंने केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू से भी जवाब मांगा कि आखिर फिल्म को भारत में क्यों हटाया गया, और सवाल उठाया कि क्या अब देश में लोग केवल वही फिल्में देख पाएंगे जिन्हें सरकार अनुमति देगी।

आम आदमी पार्टी ने सोशल मीडिया पोस्ट में यह भी दावा किया कि जसवंत सिंह खालड़ा के मामले और पंजाब के उस दौर के लिए परंपरागत राजनीतिक दल ज़िम्मेदार रहे हैं, पार्टी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस शासन के दौरान पंजाब के युवाओं का बड़े पैमाने पर कथित उत्पीड़न हुआ, जबकि बादल परिवार ने सत्ता में आने के बाद 'ट्रुथ कमीशन' बनाने का वादा कर उसे पूरा नहीं किया, और जिन अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगे उन्हें सज़ा के बजाय तरक्कियां दी गईं। 

केंद्र की भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुए ‘आप’ ने यह भी कहा कि फिल्म को भारत में उपलब्ध न रहने देना, पंजाब के उस दौर की सच्चाई को दबाने की कोशिश है। कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल और केंद्र सरकार की ओर से फिलहाल इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

सेंसरशिप का एक बड़ा पैटर्न

‘सतलुज’ की यह घटना अकेली नहीं है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि बीते साल केरल के 30वें अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 19 फिल्मों को स्क्रीनिंग की अनुमति नहीं दी थी, जिनमें फिलिस्तीन पर बनी चार फिल्में, सर्गेई आइज़ेंस्टाइन की 1925 की क्लासिक ‘बैटलशिप पोटेमकिन’, और यूके की ऑस्कर एंट्री ‘संतोष’ भी शामिल थीं। इसे लेकर तब केरल के पूर्व वित्त मंत्री थॉमस आइज़क ने भी सवाल उठाए थे। यह पैटर्न दिखाता है कि ‘सतलुज’ का मामला भारत में फिल्मों की सेंसरशिप और उपलब्धता को लेकर चल रही एक बड़ी बहस का हिस्सा है।

अब आगे क्या?

फिलहाल ‘सतलुज’ भारत में उपलब्ध नहीं है, जबकि यह ZEE5 ग्लोबल पर भारत के बाहर के दर्शकों के लिए स्ट्रीम हो रही है। ZEE5 का कहना है कि वह भारत में फिल्म को दोबारा उपलब्ध कराने के कानूनी विकल्प तलाश रहा है। फिल्म के निर्माता और कलाकार अपने पक्ष पर कायम हैं।

इस पूरे विवाद ने कुछ बड़े सवाल छोड़ दिए हैं, क्या इतिहास के हर अध्याय को सिनेमा के पर्दे पर उसी रूप में दिखाया जा सकता है? अभिव्यक्ति की आज़ादी और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच रेखा कौन खींचेगा, सेंसर बोर्ड, सरकार, अदालत या दर्शक? फिलहाल इन सवालों का जवाब किसी के पास नहीं है, और यह बहस अभी जारी है।