नई दिल्ली: जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों की कथित निगरानी को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) पर शुक्रवार को दिल्ली हाई कोर्ट में विस्तृत सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि प्रदर्शनकारियों की वीडियोग्राफी और कथित तौर पर चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक (Facial Recognition Technology) का इस्तेमाल नागरिकों के मौलिक निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है।

हालांकि, केंद्र सरकार ने वीडियोग्राफी का बचाव करते हुए कहा कि प्रदर्शन स्थलों पर रिकॉर्डिंग कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा बनाए रखने के लिए की जाती है। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले की अगली सुनवाई सोमवार के लिए तय कर दी।

याचिकाकर्ता ने कहा- प्रदर्शन के दौरान भी निजता का अधिकार

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नंदिता राव ने नोटिस जारी करने की मांग की। उन्होंने कहा कि यह याचिका 20 जुलाई के प्रदर्शनों से जुड़े अन्य लंबित मामलों से अलग मुद्दा उठाती है।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के Justice K.S. Puttaswamy बनाम Union of India फैसले का हवाला देते हुए कहा कि नागरिकों को सार्वजनिक स्थान पर प्रदर्शन करते समय भी निजता का अधिकार प्राप्त है। व ने दलील दी कि निजता के अधिकार पर कोई भी प्रतिबंध तभी लगाया जा सकता है, जब वह कानून पर आधारित हो, उसका कोई वैध सरकारी उद्देश्य हो और वह प्रतिबंध आनुपातिक हो। उन्होंने कहा कि यह याचिका पुलिस निगरानी से संबंधित है और 20 जुलाई को हुई पुलिस कार्रवाई से पहले ही दायर की गई थी।

16 से 20 साल के युवाओं की कथित निगरानी का मुद्दा

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि मामला 16 से 20 वर्ष की उम्र के छात्रों और युवा प्रदर्शनकारियों की कथित निगरानी से जुड़ा है। एक मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया कि पुलिस वैन के जरिए लाइव फेशियल रिकग्निशन किया जा रहा था।

याचिकाकर्ता ने चिंता जताई कि पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बिना चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक का इस्तेमाल शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक भागीदारी को अपराध की तरह पेश करने का खतरा पैदा कर सकता है। रिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि सरकार को प्रदर्शन की रिकॉर्डिंग करने की जरूरत हो सकती है, लेकिन इस डेटा को एकत्र करने, सुरक्षित रखने और इस्तेमाल करने के लिए स्पष्ट कानूनी ढांचा होना चाहिए।

केंद्र बोला- हर प्रदर्शन की होती है वीडियोग्राफी

केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका पर नोटिस जारी करने का विरोध किया। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन स्थलों पर वीडियोग्राफी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए एक सामान्य प्रक्रिया है। उन्होंने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत जारी स्थायी आदेशों के अनुसार प्रदर्शनों की वीडियोग्राफी की जाती है।

केंद्र ने कहा कि जंतर-मंतर पर होने वाले हर प्रदर्शन की वीडियोग्राफी की जाती है और यह किसी विशेष प्रदर्शन या किसी खास समूह को निशाना बनाने की कार्रवाई नहीं है। हता ने कहा कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है, लेकिन कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा जैसे वैध सरकारी उद्देश्यों के लिए उस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अगर प्रदर्शन के दौरान कोई अप्रिय घटना होती है, तो वीडियोग्राफी से जिम्मेदार लोगों की पहचान करने में मदद मिलती है।

याचिकाकर्ता ने कहा- निजी रिकॉर्डिंग और सरकारी निगरानी अलग

याचिकाकर्ता की ओर से जवाब देते हुए नंदिता राव ने कहा कि पत्रकारों या निजी लोगों द्वारा बनाई गई रिकॉर्डिंग और सरकार द्वारा की जाने वाली निगरानी में अंतर है। उन्होंने दलील दी कि निजी रिकॉर्डिंग के दुरुपयोग पर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन सरकारी रिकॉर्डिंग के संग्रह, भंडारण और इस्तेमाल को लेकर समान सुरक्षा व्यवस्था स्पष्ट नहीं है। उन्होंने अदालत से अधिकारियों को एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश देने की मांग की, जिसमें प्रदर्शन के दौरान रिकॉर्ड किए गए वीडियो फुटेज को लेकर लागू प्रोटोकॉल की जानकारी दी जाए।

सोमवार को होगी अगली सुनवाई

सुनवाई के अंत में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मामले को सोमवार को सुनने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को अनावश्यक रूप से विवाद बढ़ाए बिना सुलझाया जाना चाहिए। अदालत ने अनुरोध स्वीकार करते हुए मामले की अगली सुनवाई सोमवार के लिए तय कर दी।

यह जनहित याचिका CPI(M) नेता आइशी घोष ने दायर की है। याचिका में जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों की कथित अवैध निगरानी का आरोप लगाया गया है। इसमें जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के नेतृत्व में हुए प्रदर्शनों में शामिल लोगों की कथित निगरानी का मुद्दा भी उठाया गया है।

प्रदर्शन स्थलों पर वीडियोग्राफी केवल कानून-व्यवस्था का हिस्सा है

इससे पहले हाई कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से पूछा था कि क्या उसने सुप्रीम कोर्ट के मज़दूर किसान शक्ति संस्थान (MKSS) मामले के फैसले के अनुरूप प्रदर्शनों से निपटने के लिए कोई SOP या स्थायी आदेश तैयार किया है। केंद्र ने पहले भी कहा था कि प्रदर्शन स्थलों पर वीडियोग्राफी केवल कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए की जाती है और उसने जासूसी या अवैध निगरानी के आरोपों से इनकार किया है।