जुलाई की तपती धूप में जंतर-मंतर का माहौल लगातार गर्म बना हुआ है। उमस भरी गर्मी के बावजूद हजारों छात्र पिछले 26 दिनों से सड़क पर डटे हुए हैं। जो आंदोलन शुरुआत में केवल परीक्षा संबंधी अनियमितताओं के खिलाफ एक सीमित विरोध था, वह अब पूरे देश में चर्चा का विषय बन चुका है। आज इसे लोग "कॉकरोच रिवोल्यूशन" के नाम से जानते हैं।

संसद के मानसून सत्र से कुछ ही दूरी पर जारी यह धरना अब केवल छात्रों का विरोध प्रदर्शन नहीं रह गया है, बल्कि एक ऐसे तंत्र के खिलाफ जनआंदोलन बन चुका है, जिस पर छात्रों का भरोसा लगातार कम होता जा रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के बैनर तले जुटे छात्र साफ संदेश दे रहे हैं कि वे अब किसी भी कीमत पर अपने भविष्य के साथ समझौता नहीं करेंगे।

तिरस्कार से पहचान तक: कैसे बना CJP

इस आंदोलन की सबसे दिलचस्प बात इसका नाम है। "कॉकरोच जनता पार्टी" किसी राजनीतिक रणनीति या प्रचार अभियान का परिणाम नहीं, बल्कि एक कथित अपमानजनक टिप्पणी के जवाब में पैदा हुई पहचान है।

नीट-यूजी पेपर लीक मामले की सुनवाई के दौरान कथित तौर पर प्रदर्शन कर रहे बेरोजगार और नाराज युवाओं की तुलना "कॉकरोच" से की गई थी। लेकिन छात्रों ने इस टिप्पणी को अपमान मानने के बजाय अपनी ताकत बना लिया।

उनका कहना है कि कॉकरोच की तरह वे भी हर परिस्थिति में टिके रहने की क्षमता रखते हैं। उन्हें दबाया जा सकता है, लेकिन खत्म नहीं किया जा सकता।

19 वर्षीय मेडिकल अभ्यर्थी अनन्या, जो आंदोलन के पहले दिन से जंतर-मंतर पर मौजूद हैं, कहती हैं, "अगर निष्पक्ष परीक्षा की मांग करना हमें कॉकरोच बनाता है, तो हम इस देश के सबसे जिद्दी कॉकरोच हैं। सरकार सोचती है कि हमें आसानी से हटाया जा सकता है, लेकिन उसे अंदाजा नहीं कि हमारी संख्या कितनी बड़ी है।"

आंदोलन की वजह: नीट पेपर लीक बना निर्णायक मोड़

इस आंदोलन की जड़ में बार-बार होने वाले पेपर लीक हैं।

देश के करोड़ों परिवारों के लिए नीट जैसी प्रतियोगी परीक्षाएं बेहतर भविष्य का सबसे बड़ा माध्यम मानी जाती हैं। लेकिन जब 2026 की नीट-यूजी परीक्षा का प्रश्नपत्र लाखों रुपये में टेलीग्राम समूहों पर बिकने की खबरें सामने आईं, तो छात्रों का भरोसा पूरी तरह टूट गया।

छात्रों का आरोप है कि इस व्यवस्था ने उनसे केवल एक परीक्षा नहीं छीनी, बल्कि उनके सपनों और मेहनत को भी नुकसान पहुंचाया।

CJP का दावा है कि परीक्षा रद्द होने और दोबारा आयोजित किए जाने से पैदा हुए तनाव के कारण कम से कम 21 छात्रों ने आत्महत्या कर ली। आंदोलन स्थल पर इन छात्रों की याद लगातार आंदोलन को और मजबूत बना रही है।

छात्रों की पांच प्रमुख मांगें

कॉकरोच जनता पार्टी ने सरकार के सामने पांच मुख्य मांगें रखी हैं।

  • सबसे पहली मांग शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की है। छात्रों का मानना है कि परीक्षा व्यवस्था की विफलता की जवाबदेही शीर्ष स्तर से तय होनी चाहिए।
  • दूसरी मांग राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) में व्यापक सुधार और अधिक सुरक्षित, पारदर्शी तथा न्यायिक निगरानी वाली परीक्षा प्रणाली लागू करने की है।
  • तीसरी मांग उन परिवारों को 10 लाख रुपये का मुआवजा देने की है, जिनके बच्चों की परीक्षा विवादों के बाद आत्महत्या हुई।
  • चौथी मांग सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में समयबद्ध न्यायिक जांच की है, जिसमें कोचिंग संस्थानों और पेपर लीक गिरोहों के कथित गठजोड़ की जांच की जाए।
  • पांचवीं मांग शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल छात्रों पर दर्ज सभी मुकदमे वापस लेने और भविष्य में किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई न करने की है।
देशभर से मिल रहा समर्थन

यह आंदोलन इसलिए भी तेजी से बढ़ा क्योंकि इसकी वजह लगभग हर भारतीय परिवार से जुड़ी हुई है। परीक्षा का तनाव, प्रतियोगिता और पेपर लीक का डर लगभग हर छात्र और अभिभावक महसूस करता है।

आंदोलन को नई ऊर्जा तब मिली जब प्रसिद्ध शिक्षा सुधारक और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी धरने में शामिल हुए। उन्होंने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की, जिससे आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली।

18 जुलाई को दिल्ली पुलिस द्वारा उन्हें अस्पताल ले जाने के बाद भी आंदोलन की रफ्तार कम नहीं हुई, बल्कि जनसमर्थन और बढ़ गया।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी, आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल सहित कई विपक्षी नेताओं और फिल्म अभिनेता सलमान खान जैसी हस्तियों ने भी छात्रों की बात सुनने की अपील की।

20 जुलाई की कार्रवाई बनी बड़ा मोड़

आंदोलन के शुरुआती 20 दिनों तक जंतर-मंतर का माहौल शांतिपूर्ण रहा। कविता, संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बीच छात्र अपनी बात रखते रहे। लेकिन 20 जुलाई को स्थिति बदल गई।

करीब 15 हजार छात्र संसद मार्च के लिए निकले, जहां पुलिस ने बैरिकेडिंग, आंसू गैस और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया। CJP का दावा है कि इस कार्रवाई में 150 से अधिक छात्र घायल हुए।

संगठन का आरोप है कि कुछ बाहरी तत्वों ने जानबूझकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश की ताकि शांतिपूर्ण आंदोलन की छवि खराब की जा सके।

22 जुलाई को जंतर-मंतर पहुंचे निहंगों के एक समूह और प्रदर्शनकारियों के बीच हल्की झड़प भी हुई। इसके बाद इलाके में इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गईं, जिससे तनाव और बढ़ गया।

फिलहाल गतिरोध कायम

वर्तमान में सरकार और आंदोलनकारी छात्रों के बीच बातचीत जारी है, लेकिन समाधान अभी दूर दिखाई देता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी परीक्षा संबंधी अपराधों के मामलों में फास्ट-ट्रैक अदालतों की घोषणा कर चुके हैं, लेकिन सरकार शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है।

इधर दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग को लेकर केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा है।

उधर मुंबई, बेंगलुरु और पटना समेत कई शहरों में भी आंदोलन फैल चुका है।

छात्रों ने भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के आवास पर बातचीत के प्रस्ताव को ठुकराते हुए कहा कि वार्ता वहीं होगी, जहां हजारों छात्र पिछले कई दिनों से बैठे हैं।

आगे का रास्ता

इस आंदोलन का समाधान केवल बैरिकेडिंग, इंटरनेट बंद करने या पुलिस कार्रवाई से नहीं निकल सकता। जरूरत इस बात की है कि सरकार और छात्र आमने-सामने खड़े होने के बजाय संवाद और विश्वास का रास्ता अपनाएं। फास्ट-ट्रैक अदालतें एक सकारात्मक शुरुआत हो सकती हैं, लेकिन छात्रों का कहना है कि असली समस्या व्यवस्था पर भरोसे की कमी है।

यदि परीक्षा सुधार के लिए स्वतंत्र विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और छात्र प्रतिनिधियों की भागीदारी वाली एक निष्पक्ष समिति बनाई जाती है, तो यह दोनों पक्षों के बीच विश्वास बहाल करने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है।

छात्र किसी असंभव मांग पर नहीं अड़े हैं। वे केवल ऐसी परीक्षा व्यवस्था चाहते हैं जिसमें सफलता मेहनत से तय हो, न कि पैसे या पेपर लीक करने वाले गिरोहों की पहुंच से।

जंतर-मंतर पर हर रात मोबाइल फोन की रोशनी से जगमगाता दृश्य यह याद दिलाता है कि "कॉकरोच रिवोल्यूशन" केवल एक आंदोलन नहीं, बल्कि उम्मीद, धैर्य और बेहतर भविष्य की लड़ाई का प्रतीक बन चुका है। भारत के इन युवाओं की आवाज सुनी जानी चाहिए, क्योंकि यही देश का भविष्य हैं।

By Sharan Sharma - Independent Political Analyst