नई दिल्ली: सोमवार को दिल्ली ने वो तस्वीर देखी, जिसकी कल्पना दो महीने पहले किसी ने नहीं की थी। स्कूल यूनिफ़ॉर्म में बच्चे। कॉकरोच की पोशाक पहने नौजवान। बुज़ुर्ग, माता-पिता, कॉलेज छात्र। और इन सबके सामने- बैरिकेड की कई परतें, आंसू गैस, लाठीचार्ज और धारा 163। मानसून सत्र के पहले ही दिन ‘चलो संसद’ का यह हुजूम उस आंदोलन का चरम था, जो मई में एक इंटरनेट मज़ाक के तौर पर शुरू हुआ था।
लेकिन इस पूरी कहानी को समझने के लिए पीछे जाना होगा, उस एक टिप्पणी तक, जिसने यह सब शुरू किया। और यहीं वह तथ्य है, जिसे अक्सर ग़लत बताया जाता है।
15 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट डेज़िग्नेशन और फ़र्ज़ी डिग्रियों से जुड़ी एक सुनवाई चल रही थी। इसी दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि ऐसे नौजवान हैं “जो कॉकरोच जैसे हैं, जिन्हें कोई रोज़गार नहीं मिलता या पेशे में कोई जगह नहीं मिलती, और उनमें से कुछ मीडिया, सोशल मीडिया या RTI कार्यकर्ता बनकर "सब पर हमला करने लगते हैं।” उन्होंने “समाज के परजीवी” शब्द का भी इस्तेमाल किया। यह बात घंटों में कोर्ट के गलियारों से सोशल मीडिया की टाइमलाइन तक पहुंच गई।
यहां संतुलन ज़रूरी है। अगले ही दिन CJI सूर्यकांत ने स्पष्टीकरण जारी किया कि उनकी टिप्पणी केवल उन लोगों के लिए थी जो फ़र्ज़ी और बोगस डिग्रियों के सहारे पेशे में घुस आए हैं- देश के युवाओं के लिए नहीं। उन्होंने कहा कि उन्हें भारत के युवाओं पर गर्व है और हर युवा उन्हें प्रेरित करता है। मीडिया पर उन्होंने ग़लत उद्धृत करने का आरोप भी लगाया। लेकिन तब तक बात हाथ से निकल चुकी थी।
16 मई को अभिजीत दीपके, बोस्टन यूनिवर्सिटी से पब्लिक रिलेशंस के स्नातक और राजनीतिक संचार रणनीतिकार, जो 2020 से 2023 तक आम आदमी पार्टी की सोशल मीडिया टीम से जुड़े रहे, ने X पर एक सवाल पोस्ट किया: “अगर सारे कॉकरोच एक साथ आ जाएं तो?”
एक वेबसाइट बनी। एक गूगल फ़ॉर्म आया। और एक नारा अपने आप चल पड़ा, “मैं भी कॉकरोच।”
इस तरह जन्म हुआ कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का नाम ही सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी पर व्यंग्य। यह चुनाव आयोग में पंजीकृत राजनीतिक दल नहीं है; यह एक व्यंग्य-आधारित युवा आंदोलन है। इसका घोषित नारा तक तंज़ है- “आलसी और बेरोज़गारों की आवाज़।”
यानी यह आंदोलन नीट पेपर लीक से शुरू नहीं हुआ था। नीट का मुद्दा बाद में इसका सबसे बड़ा हथियार बना। शुरुआत हुई थी अपमान के उस एहसास से, जो लाखों पढ़े-लिखे बेरोज़गार नौजवानों को लगा।
नीट पेपर लीक: वो चिंगारी जिसने मज़ाक को आंदोलन बना दिया
मई 2026 में हुए नीट-यूजी पेपर लीक ने इस ऑनलाइन गुस्से को ज़मीन दे दी। लाखों छात्रों के भविष्य पर सवाल खड़े हुए, और मांग एक ही बनी, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा।
20 जून से जंतर-मंतर पर धरना शुरू हुआ, दिल्ली की एकमात्र अधिकृत प्रदर्शन स्थली, जहां पुलिस अनुमति के साथ प्रदर्शन की इजाज़त देती है।
इस आंदोलन का मानवीय चेहरा तब सामने आया, जब देहरादून की नीट अभ्यर्थी रिया ने पिछले महीने आत्महत्या कर ली। आज दीपके ने अपना अनशन उन्हीं रिया के पिता के हाथों तोड़ा।
(नोट: आत्महत्या एक संवेदनशील विषय है। अगर आप या आपका कोई परिचित मानसिक तनाव से गुज़र रहा है, तो कृपया किसी विशेषज्ञ या हेल्पलाइन से संपर्क करें।)
सोनम वांगचुक: वो नाम, जिसने आंदोलन को राष्ट्रीय बना दिया
28 जून को सोनम वांगचुक इस आंदोलन से जुड़े और अनिश्चितकालीन अनशन शुरू किया। वांगचुक कौन हैं, यह समझना ज़रूरी है। NIT श्रीनगर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग करने वाले वांगचुक हिमालयी क्षेत्रों में ‘आइस स्तूप’ तकनीक के लिए दुनिया भर में जाने जाते हैं। 2018 में उन्हें रेमन मैगसेसे पुरस्कार मिला। 2009 की फ़िल्म थ्री इडियट्स में आमिर ख़ान का किरदार उन्हीं से प्रेरित बताया जाता है। लद्दाख को राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर वे पहले भी लंबे अनशन कर चुके हैं, 2024 में 21 दिन का ‘क्लाइमेट फ़ास्ट’ इसका उदाहरण है।
कुछ रिपोर्टों में उनके वज़न के सटीक आंकड़े और ‘हेल्थ बुलेटिन’ के क्रमांक बताए जा रहे हैं। दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देश पर 18 जुलाई को दिल्ली पुलिस उन्हें जंतर-मंतर से सफ़दरजंग अस्पताल ले गई, जब उनका अनशन 21वें दिन में था। अस्पताल का कहना है कि वे गंभीर रूप से निर्जलित और कमज़ोर हैं, और इलाज तथा तरल पदार्थ लेने से इनकार कर रहे हैं।
वांगचुक और उनकी पत्नी गीतांजलि आंग्मो ने इसे “अवैध हिरासत” बताया है। 19 जुलाई को दिल्ली हाईकोर्ट ने उन्हें निजी अस्पताल में स्थानांतरित करने की याचिका ख़ारिज कर दी।
आज का दिन: तीन शर्तें, एक चिट्ठी और एक इनकार
आज सुबह वांगचुक ने X पर हस्तलिखित नोट जारी कर अस्पताल से छुट्टी मांगी, ताकि वे मार्च में शामिल हो सकें। उन्होंने लिखा कि वे आज बिल्कुल ठीक महसूस कर रहे हैं और उनके स्वास्थ्य मापदंड सामान्य दिख रहे हैं।
साथ ही उन्होंने अनशन तोड़ने की तीन शर्तें रखीं- इनमें से कोई एक पूरी होने पर वे अनशन समाप्त करेंगे:
सरकार शिक्षा व्यवस्था की हालिया विफलताओं, ख़ासकर पेपर लीक, की जवाबदेही ले।
वे और CJP नेतृत्व संसद के दरवाज़े तक पहुंचें, जहां सांसद और विभिन्न दलों के नेता आश्वासन दें कि मुद्दा संसद में उठाया जाएगा।
अगर स्वास्थ्य यात्रा की अनुमति न दे, तो सांसद और नेता अस्पताल आकर यही आश्वासन दें।
उनकी अपील पर अभिजीत दीपके ने अपना अनशन समाप्त कर दिया, जो उन्होंने 18 जुलाई को वांगचुक के अस्पताल भेजे जाने के बाद शुरू किया था। वांगचुक ने सभी सहयोगी अनशनकारियों से अपील की थी कि वे अपनी ऊर्जा संसद मार्च के लिए बचाएं।
महत्वपूर्ण: वांगचुक ने ख़ुद अपना अनशन जारी रखा है। वह अस्पताल से ही चल रहा है।
सड़क पर क्या हुआ: बैरिकेड, आंसू गैस और ‘क्या यह हमारा देश नहीं?’
पुलिस ने पहले ही साफ़ कर दिया था, मार्च की कोई अनुमति नहीं मांगी गई, न दी गई। नई दिल्ली ज़िले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 लागू कर दी गई, जो पुरानी CrPC की धारा 144 की जगह आई है। इसके तहत पांच या अधिक लोगों के जमावड़े, जुलूस, धरने, नारेबाज़ी और लाठी-बैनर जैसी सामग्री ले जाने पर रोक लगी। छूट सिर्फ़ जंतर-मंतर को थी, वह भी पूर्व अनुमति के साथ।
5,000 से ज़्यादा पुलिस और अर्धसैनिक बल तैनात किए गए। दंगा-रोधी वाहन लगाए गए। कई मेट्रो स्टेशनों के निकास बंद हुए।
लेकिन सुबह होते-होते संसद मार्ग की तस्वीर बदल गई। भीड़ के आकार पर अलग-अलग दावे हैं- दिल्ली पुलिस सूत्रों के हवाले से क़रीब 15,000, CJP प्रवक्ता सौरव दास के अनुसार लगभग 20,000, जबकि कई रिपोर्टों में 10,000 से अधिक बताया गया। (आंकड़े दावों पर आधारित, स्वतंत्र सत्यापन नहीं।)
पुलिस ने लाठीचार्ज किया, आंसू गैस के गोले छोड़े, और कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया। प्रदर्शन स्थल पर इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई, जिसके बाद प्रदर्शनकारियों ने मानव श्रृंखला बनाई। CJP का दावा है कि अभिजीत दीपके को पुलिस ने उठा लिया।
“Police didn’t use force” https://t.co/NZtOKYYw4N pic.twitter.com/yB8CJydiSA
— Cockroach is Back (@Cockroachisback) July 20, 2026
Why are the Police pelting stones at protesters? Was the brutal lathi charge not enough? Shocking visuals coming from Delhi pic.twitter.com/8QF2SyG7gP
— Cockroach is Back (@Cockroachisback) July 20, 2026
विपक्ष खुलकर सामने आया। आम आदमी पार्टी के आतिशी, संजय सिंह और मनीष सिसोदिया प्रदर्शन में शामिल हुए। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने लाठीचार्ज पर कहा- “सरकार नहीं, अहंकार।”
VIDEO | Addressing a press conference in Delhi, AAP MP Sanjay Singh (@SanjayAzadSln) says, "Protesters are being treated like citizens of an enemy nation, with lathi-charge and tear gas being used against them. Representatives of the CJP are believed to have had a 10-minute… pic.twitter.com/xWcEKASp2q
— Press Trust of India (@PTI_News) July 20, 2026
गीतांजलि आंग्मो ने कहा कि लाठीचार्ज से छात्रों का मनोबल कमज़ोर नहीं होगा, बल्कि और मज़बूत होगा।
दूसरा पक्ष: प्रशासन का तर्क
दिल्ली पुलिस का तर्क है कि संसद सत्र के दौरान संसद क्षेत्र देश के सबसे संवेदनशील सुरक्षा ज़ोन में आ जाता है। अगर एक संगठन को बिना अनुमति मार्च की इजाज़त दी जाए, तो यह एक मिसाल बन जाएगी।
पुलिस का दावा है कि कुछ प्रदर्शनकारियों की ओर से पथराव भी हुआ। पुलिस ने यह भी कहा है कि हिरासत में लिए गए लोगों में कई “छात्र नहीं” हैं और उनकी पहचान सत्यापित की जा रही है। दीपके की ओर से जंतर-मंतर के पास पत्थरों से भरे ट्रक खड़े होने का आरोप भी सामने आया। (दोनों पक्षों के ये दावे फ़िलहाल परस्पर विरोधी हैं और स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं।)
#WATCH | Delhi: A Delhi Police Sub Inspector got injured during a clash with protesters near Parliament Street earlier today He says, "We were standing near barricades, stone was pelted by them (protesters)." #CJPProtest pic.twitter.com/bYUHekFGnG
— ANI (@ANI) July 20, 2026
बातचीत की मेज़
दिनभर के तनाव के बीच एक अहम मोड़ भी आया। CJP प्रतिनिधि सौरव दास और आशुतोष रांका ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा से मुलाक़ात की। दास के मुताबिक़ सरकार ने ही सुबह बातचीत के लिए संपर्क किया था।
उधर द वीक की रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा व्यावहारिक रूप से कठिन माना जा रहा है, क्योंकि मौजूदा सरकार सड़क के दबाव पर इस्तीफ़े की मांग शायद ही कभी स्वीकार करती है।
आख़िरी सवाल
आज का दिन दो सवाल छोड़ गया है, और दोनों जायज़ हैं।
एक तरफ़ संविधान शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार देता है। दूसरी तरफ़ प्रशासन पर संसद जैसी संस्था की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी है।
एक तरफ़ 59 साल का एक व्यक्ति अस्पताल के बिस्तर से अनशन जारी रखे है। दूसरी तरफ़ अदालत ने ही उसे अस्पताल भेजने का निर्देश दिया, ताकि जान बचाई जा सके।
पर सबसे बड़ा सवाल शायद यह है- क्या यह टकराव टाला जा सकता था? जब 20 जून से जंतर-मंतर पर धरना चल रहा था, तब बातचीत की मेज़ 20 जुलाई की सुबह ही क्यों सजी, जब सड़कों पर लाठियां चल चुकी थीं?
क्योंकि लोकतंत्र में असहमति नई नहीं है। नया सिर्फ़ यह है कि इस बार वह असहमति एक मीम से शुरू हुई थी।
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