पंजाब: आजादी के 79 साल बाद भारत ने दुनिया के सामने खुद को प्रस्तुत करना सीख लिया है। लेकिन जिस राज्य ने देश के लिए इतनी बड़ी कीमत चुकाई, उसके साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करना शायद अब भी नहीं सीखा। विभाजन ने भारत को समान रूप से घायल नहीं किया था। उसका सबसे गहरा घाव पंजाब के आर-पार गया—जमीन बंटी, नहरें बंटी, गांव बंटे और परिवार बिछड़ गए।

लाखों लोग उजड़ गए और अनगिनत जानें चली गईं। पंजाब ने इतिहास के सबसे बड़े जबरन विस्थापनों में से एक का दर्द सहा और फिर उससे उम्मीद की गई कि वह दोबारा खड़ा होकर काम करे। पंजाब ने ऐसा किया भी।

पंजाब ने क्या दिया?

पंजाब ने खुद को दोबारा खड़ा किया, फिर उसने भारत का पेट भरा। हरित क्रांति को अक्सर भारत की राष्ट्रीय सफलता के रूप में याद किया जाता है। लेकिन इसका सबसे बड़ा प्रयोग पंजाबी धरती पर हुआ, पंजाब के पानी और पंजाबी किसानों की मेहनत के दम पर। भारत को खाद्य सुरक्षा मिली, लेकिन पंजाब को भूजल का गिरता स्तर, थकी हुई मिट्टी और अस्थिर फसल चक्र विरासत में मिला।

आज पंजाब में आकलन किए गए भूजल ब्लॉकों का लगभग पांचवां हिस्सा नहीं, बल्कि लगभग पांच में से चार ब्लॉक अत्यधिक दोहन की स्थिति में बताए जाते हैं। राष्ट्रीय बहस अक्सर यह पूछती है कि पंजाब देश पर कितना बोझ है। सवाल यह कम पूछा जाता है कि पंजाब पहले ही देश के लिए कितनी कीमत चुका चुका है।

‘उड़ता पंजाब’ राज्य की पहचान का पर्याय बनाने की कोशिश

पंजाब ने उग्रवाद, ऑपरेशन ब्लू स्टार, 1984 के नरसंहार और वर्षों तक चले रक्तपात का दौर देखा। पंजाब उस अंधेरे से भी बाहर आया, लेकिन देश की सामूहिक स्मृति में उसकी छवि पूरी तरह सामान्य नहीं हो सकी। बस उसके लिए इस्तेमाल होने वाले लेबल बदलते रहे—कभी सुरक्षा की समस्या, कभी नशे की समस्या और कभी आंदोलन की समस्या।

‘उड़ता पंजाब’ पूरे राज्य की पहचान का पर्याय बनाने की कोशिश तक की गई। किसान आंदोलन के दौरान भी कई बार पंजाबियों को सुने जाने से पहले ही कठघरे में खड़ा कर दिया गया। उनकी नीयत पर सवाल उठे और उनकी देशभक्ति को भी जैसे परीक्षा से गुजरना पड़ा। यहीं भारत की ब्रांडिंग का सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है। किसी राज्य की सामूहिक छवि शायद ही इतनी कमजोर रही हो, जबकि उसके लोगों की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा इतनी मजबूत हो। 

सिख पगड़ी साहस, सेवा और भरोसे की पहचान, फिर भी विरोधाभास क्यों ?

पंजाबी आबादी के अनुपात की तुलना में बड़ी संख्या में सिख और पंजाबी भारतीय सशस्त्र बलों में सेवा देते हैं। सिख पगड़ी दुनिया की सबसे पहचानने योग्य सांस्कृतिक पहचान में से एक है और अक्सर साहस, सेवा और भरोसे का संदेश देती है।

कोरोना महामारी के दौरान लंगरों ने धर्म, जाति और राष्ट्रीयता पूछे बिना लाखों लोगों तक भोजन पहुंचाया। पंजाबी संगीत अब वैश्विक संगीत मंचों और समारोहों तक पहुंच चुका है। दुनिया जिस भारतीय भोजन को पहचानती है, उसमें पंजाबी भोजन की बड़ी हिस्सेदारी है। कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, अमरीका और खाड़ी देशों में पंजाबी समुदाय व्यवसाय, विश्वविद्यालयों, सार्वजनिक संस्थानों और राजनीति में भारत की पहचान को आगे बढ़ा रहा है। भारत बार-बार पंजाबियों को अपना ब्रांड एंबेसडर बनाता है। लेकिन पंजाब को एक बाजार के रूप में महत्व देने में वही भारत पीछे रह जाता है।

'सांस्कृतिक पूंजी, लेकिन निवेश नहीं'

ब्रांड भांगड़ा की धुन उधार लेते हैं, लेकिन पंजाबी मीडिया में निवेश से बचते हैं। सिख चेहरे को साहस, गर्मजोशी या भरोसे का प्रतीक बनाकर विज्ञापन में इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन मीडिया योजना में पंजाब को अक्सर कम महत्व दिया जाता है। मुंबई में पंजाबी संस्कृति को प्रस्तुत करने के लिए प्रीमियम खर्च किया जाता है, लेकिन पंजाब में विश्वसनीय स्थानीय मीडिया के लिए दरों पर मोलभाव किया जाता है। वे पंजाब की सांस्कृतिक पूंजी चाहते हैं, लेकिन पंजाब के मीडिया तंत्र में निवेश नहीं करना चाहते।

यह रणनीति नहीं है, यह संसाधनों का दोहन है। पंजाब को अपनी कमियां भी स्वीकार करनी होंगी। पंजाब को अपनी समस्याओं से भी आंख नहीं चुरानी चाहिए। खराब शासन, वित्तीय अनुशासन की कमी, अपर्याप्त औद्योगिकीकरण और कृषि सुधारों में देरी जैसी चुनौतियां वास्तविक हैं। लेकिन धारणा की भी आर्थिक कीमत होती है।

पंजाब को अपने मीडिया की ताकत चाहिए

अगर किसी राज्य को लगातार नशे, अव्यवस्था और विरोध-प्रदर्शन के चश्मे से दिखाया जाएगा, तो धीरे-धीरे वही धारणा निवेश के फैसलों, विज्ञापन बजट और मीडिया योजनाओं में भी दिखाई देने लगेगी। इसीलिए पंजाब को मजबूत, आधुनिक और स्वतंत्र मीडिया की जरूरत है, एक ऐसे मीडिया की जो उसकी समस्याओं को न तो छिपाए और न ही उसकी पूरी पहचान को उन्हीं समस्याओं तक सीमित कर दे।इसी सोच से जीटीसी नेटवर्क (GTC Network) की भूमिका महत्वपूर्ण बनती है। 

पंजाबी दर्शक भी उसी स्तर की उत्पादन गुणवत्ता, संपादकीय गंभीरता और रणनीतिक सम्मान के हकदार हैं, जो राष्ट्रीय नेटवर्क बड़े बाजारों के लिए निर्धारित करते हैं। पंजाब केवल बैसाखी के मौसम में चलाया जाने वाला कोई अस्थायी विज्ञापन अभियान नहीं है। यह एक वैश्विक रूप से जुड़ा हुआ और प्रभावशाली उपभोक्ता समुदाय है।

हिसाब की किताब ठीक करने का समय

भारत की ब्रांड पहचान पंजाबी वीरता, संगीत, भोजन, उदारता और उद्यमशीलता से लाभ उठाकर मजबूत नहीं हो सकती, जबकि पंजाब को हमेशा जोखिम वाले राज्य की श्रेणी में रखा जाए।

  • कवरेज को सही कीजिए।
  • धारणा को सही कीजिए।
  • निवेश की योजना को सही कीजिए।

अटारी पर तिरंगा उसी तरह लहराता है, जैसे लाल किले पर...लेकिन उसके नीचे की मिट्टी विभाजन की याद रखती है। सैनिकों के खून को याद रखती है। किसानों की मेहनत को याद रखती है। पंजाब को भारत के प्रति अपना प्रेम साबित करने की जरूरत नहीं है। भारत के आजाद होने से पहले से ही पंजाब इस प्रेम की कीमत चुकाता आया है।