नई दिल्ली: मतदाता सूची की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग के भीतर सामने आई आपत्तियों ने राजनीतिक विवाद को और तेज कर दिया है। शिवसेना (UBT) के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर तीखा हमला करते हुए उनके खिलाफ निलंबन और कानूनी कार्रवाई की मांग की है। राउत ने चुनाव प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए। उनके ये बयान एक मीडिया रिपोर्ट के बाद आए हैं, जिसमें चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से SIR तथा मतदाता सूची से जुड़े फैसलों पर आपत्तियां दर्ज किए जाने की बात कही गई है।
राउत ने अपने बयान में ज्ञानेश कुमार को लेकर कहा कि उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए और आरोप लगाया कि देश की चुनाव प्रक्रिया “तमाशा” बन गई है। यह बयान राउत की राजनीतिक प्रतिक्रिया है; चुनाव आयोग के खिलाफ लगाए गए आरोपों को स्थापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता।
‘ज्ञानेश कुमार जेल जाएंगे’ वाले बयान से बढ़ा विवाद
संजय राउत ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि उन्हें निलंबित किया जाना चाहिए और कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को मंत्रिमंडल से हटाने की भी मांग की और इस पूरे मामले में राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की अपील करने की बात कही।
अ-ज्ञानेशकुमार जेल जायेगा!जाना पडेगा!उनके आका देश छोडकर भाग जायेंगे!@PMOIndia @AmitShah @Dev_Fadnavis @Cockroachisback @ECISVEEP pic.twitter.com/uCkBZ5sUqr
— Sanjay Raut (@rautsanjay61) September 23, 2026
राउत ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में भी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ बेहद कड़ी टिप्पणी की थी। उनके बयानों के बाद SIR और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो गई।
राउत के अलावा कांग्रेस समेत कई विपक्षी नेताओं ने भी चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस ने दो चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त के बीच हुए पत्राचार को सार्वजनिक करने की मांग की है।
आखिर SIR को लेकर चुनाव आयोग में क्या हुआ?
विवाद की शुरुआत द इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट से हुई जिसमें बताया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार चुनाव आयोग के भीतर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं।
रिपोर्ट के मुताबिक, ये आपत्तियां नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और बहाल करने, SIR के दौरान अपील दाखिल करने तथा चुनावी डेटा के डिजिटल प्रबंधन जैसे मुद्दों से संबंधित थीं। दोनों आयुक्तों ने कुछ मामलों में यह सवाल उठाया कि निर्णय और आदेश उनकी जानकारी के बिना कैसे आगे बढ़े।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कुछ आपत्तियों में दोनों आयुक्तों ने कथित तौर पर कुछ कदमों को “अनधिकृत” और “अवैध” बताया। हालांकि, यह संबंधित अधिकारियों की दर्ज की गई आपत्तियों और रिपोर्ट का हिस्सा है; इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि आयोग का अंतिम निर्णय कानूनी रूप से अवैध था।
Form 6 में बदलाव पर भी उठे सवाल
विवाद का एक महत्वपूर्ण हिस्सा नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में किए गए बदलाव से जुड़ा है।
रिपोर्ट के अनुसार, SIR से जोड़ते हुए Form 6 में ऐसा सवाल शामिल किया गया जिसमें आवेदक से उसके या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी के पुराने मतदाता रिकॉर्ड से संबंधित जानकारी मांगी गई।
चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मई में इस बदलाव पर आपत्ति जताई थी। उनके अनुसार वैधानिक Form 6 में बदलाव के लिए संबंधित नियमों में संशोधन की जरूरत थी। इसके बाद सुखबीर सिंह संधू ने भी इस बदलाव को हटाने की मांग की।
रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों की चिंता यह भी थी कि इस तरह की अतिरिक्त प्रक्रिया से पहली बार मतदान करने वाले पात्र युवाओं को परेशानी हो सकती है।
Voter Data के केंद्रीकरण का मुद्दा भी उठा
SIR से जुड़े विवाद में केवल Form 6 ही नहीं, बल्कि electoral roll database के प्रबंधन को लेकर भी सवाल सामने आए हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने चिंता जताई कि मतदाता सूची के डिजिटल डेटाबेस का नियंत्रण अधिक केंद्रीकृत होता जा रहा है। सामान्य व्यवस्था में निर्वाचन क्षेत्र के स्तर पर Electoral Registration Officer यानी ERO मतदाता सूची से जुड़े वैधानिक काम करते हैं।
दोनों आयुक्तों ने कथित तौर पर यह सुनिश्चित करने की जरूरत बताई कि संबंधित वैधानिक अधिकारियों के पास मतदाता डेटाबेस तक आवश्यक डिजिटल पहुंच बनी रहे।
#WATCH | Delhi | Shiv Sena (UBT) MP Sanjay Raut reacts to Indian Express report on 2 ECs objecting to discrepancies in SIR processHe says, "Gyanesh Kumar should be suspended, and legal action should be taken against him. In this country, elections have become a farce. ECI comes… pic.twitter.com/d65NBl90EO
— ANI (@ANI) September 23, 2026
Goa के 97 मतदाताओं का मामला भी चर्चा में
रिपोर्ट में गोवा का उदाहरण भी सामने आया। इसके अनुसार, स्थानीय ERO ने 97 मतदाताओं से जुड़े दस्तावेजों की जांच के बाद उन्हें पात्र पाया, लेकिन सॉफ्टवेयर व्यवस्था में उनके नाम बहाल करने से जुड़ी तकनीकी समस्या सामने आई।
रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय अधिकारियों ने इस समस्या को दूर करने के लिए अनुरोध किए, लेकिन तय समयसीमा तक आवश्यक तकनीकी सुविधा उपलब्ध नहीं हो सकी। इसके परिणामस्वरूप इन 97 लोगों के नाम अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो पाए।
यह मामला इस बड़े सवाल से जुड़ गया कि मतदाता सूची तैयार करने में तकनीकी सिस्टम और जमीन पर काम करने वाले वैधानिक अधिकारियों के बीच अधिकार और नियंत्रण का संतुलन कैसे कायम रखा जाए।
चुनाव आयोग का पक्ष भी सामने आया
वहीं, चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों ने इन रिपोर्टों की उस व्याख्या से असहमति जताई है जिसमें आयोग के भीतर औपचारिक विभाजन या SIR से जुड़े फैसलों में दो आयुक्तों को दरकिनार किए जाने की बात कही गई है।
ECI सूत्रों के मुताबिक, आयोग के फैसले निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार लिए गए और SIR से जुड़े निर्णयों पर तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी रही। सूत्रों ने यह भी कहा कि दोनों आयुक्तों ने कुछ मामलों में टिप्पणियां या observations जरूर दिए थे, लेकिन इसे औपचारिक असहमति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
यानी एक तरफ रिपोर्ट में दो चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियों का विवरण सामने आया है, जबकि दूसरी तरफ चुनाव आयोग से जुड़े सूत्र इन आपत्तियों को अंतिम निर्णय प्रक्रिया में किसी टूट या औपचारिक मतभेद के प्रमाण के तौर पर स्वीकार नहीं कर रहे हैं।
SIR को लेकर पहले से चल रहा है विवाद
SIR की शुरुआत जून 2025 में बिहार से हुई थी। इसके बाद मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण का दायरा दूसरे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक बढ़ा। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ड्राफ्ट मतदाता सूचियों में 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने की बात सामने आई है।
मतदाता सूची से नाम हटाने, नाम जोड़ने और अपील की प्रक्रिया को लेकर कई राज्यों में राजनीतिक तथा कानूनी विवाद भी सामने आए हैं। पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान हटाए गए नामों को लेकर बड़ी संख्या में अपीलें दाखिल हुईं। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि लाखों अपीलें लंबित हैं।
ऐसे में चुनाव आयोग के भीतर दो आयुक्तों की आपत्तियों की रिपोर्ट ने पहले से चल रही SIR बहस को नया राजनीतिक आयाम दे दिया है।
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