नई दिल्ली: चर्चित लेखिका तसलीमा नसरीन करीब 19 साल बाद एक बार फिर कोलकाता पहुंची हैं। उनकी यह यात्रा केवल एक शहर में वापसी नहीं, बल्कि लंबे इंतजार और भावनात्मक जुड़ाव की कहानी भी मानी जा रही है। वर्ष 2007 में विरोध प्रदर्शनों और सुरक्षा कारणों के चलते उन्हें कोलकाता छोड़ना पड़ा था। तब से लेकर अब तक वे शहर नहीं लौट सकी थीं।

शुक्रवार को कोलकाता एयरपोर्ट पर उनके पहुंचते ही यह लंबा इंतजार समाप्त हो गया। बताया जा रहा है कि वह शहर में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम में हिस्सा लेने आई हैं। उनकी वापसी की खबर सामने आने के बाद साहित्य और सामाजिक हलकों में इस पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।

2007 में छोड़ना पड़ा था कोलकाता

तसलीमा नसरीन कई वर्षों तक कोलकाता में रहीं और बंगाली साहित्यिक जगत से उनका गहरा जुड़ाव रहा। हालांकि वर्ष 2007 में उनकी कुछ पुस्तकों और विचारों को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे।

स्थिति तनावपूर्ण होने के बाद तत्कालीन राज्य सरकार ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए उन्हें शहर छोड़ने की सलाह दी। इसके बाद उन्होंने कोलकाता छोड़ दिया और फिर लंबे समय तक वापस नहीं लौट सकीं।

बाद के वर्षों में पश्चिम बंगाल में राजनीतिक बदलाव भी हुए, लेकिन उनकी वापसी संभव नहीं हो पाई।

लेखन ने दिलाई पहचान, विवाद भी साथ आए

तसलीमा नसरीन दक्षिण एशिया की उन चर्चित लेखिकाओं में गिनी जाती हैं, जिन्होंने महिलाओं के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक मुद्दों पर खुलकर लेखन किया।

उनकी रचनाओं में कट्टरपंथ, लैंगिक असमानता और मानवाधिकार जैसे विषय प्रमुख रहे हैं। इन्हीं विषयों पर लिखने के कारण उन्हें कई बार विरोध और विवादों का भी सामना करना पड़ा।

'लज्जा' और 'द्विखंडितो' बनीं चर्चा का केंद्र

तसलीमा नसरीन का उपन्यास 'लज्जा' अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे चर्चित कृतियों में से एक माना जाता है। इस पुस्तक में उन्होंने एक हिंदू परिवार के संघर्ष और सामाजिक परिस्थितियों को कहानी के माध्यम से प्रस्तुत किया था।

बाद में उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक 'द्विखंडितो' भी काफी चर्चा में रही। इस पुस्तक को लेकर पश्चिम बंगाल में भी विरोध हुआ और उस समय इसे लेकर राजनीतिक तथा सामाजिक बहस छिड़ गई थी

इन्हीं विवादों के चलते उनके सार्वजनिक कार्यक्रमों और राज्य में रहने को लेकर लगातार सुरक्षा संबंधी चिंताएं बनी रहीं।

लंबे समय से निर्वासन जैसा जीवन

पिछले लगभग ढाई दशकों से तसलीमा नसरीन अलग-अलग देशों में रहकर अपना लेखन जारी रख रही हैं। हालांकि उनका भावनात्मक जुड़ाव बांग्लादेश और कोलकाता दोनों से बना रहा।

उन्होंने कई बार सार्वजनिक मंचों पर यह इच्छा जताई कि उन्हें फिर से कोलकाता आने का अवसर मिले, क्योंकि शहर उनके साहित्यिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

अब उनकी यह यात्रा उसी लंबे इंतजार का अंत मानी जा रही है।

बांग्लादेश के हालात पर भी लिखती रही हैं

तसलीमा नसरीन ने अपनी कई पुस्तकों और लेखों में बांग्लादेश की सामाजिक परिस्थितियों, महिलाओं की स्थिति और कट्टरपंथ से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से लिखा है।

उनका कहना रहा है कि महिलाओं की स्वतंत्रता और समान अधिकारों पर लगातार चर्चा और सुधार की आवश्यकता है। इसी कारण उनका लेखन कई बार बहस और विवाद का विषय भी बना।

वापसी पर बढ़ी राजनीतिक चर्चा

तसलीमा नसरीन की कोलकाता वापसी के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं। कुछ नेताओं ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़कर देखा है, जबकि कुछ इसे राज्य की बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में भी देख रहे हैं।

हालांकि तसलीमा नसरीन की यह यात्रा फिलहाल एक साहित्यिक कार्यक्रम तक सीमित बताई जा रही है। उनकी वापसी ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, साहित्य और सामाजिक विमर्श से जुड़े पुराने सवालों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।