नई दिल्ली: देश की राजनीति एक बार फिर वंदे मातरम् को लेकर गरमा गई है। कांग्रेस और बीजेपी के बीच ये विवाद सिर्फ एक गीत के इर्द-गिर्द नहीं, बल्कि इतिहास, राष्ट्रवाद और चुनावी राजनीति के बड़े सवालों तक पहुंच चुका है। आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर ये पूरा मामला है क्या, कहां से शुरू हुआ, और अब किस मोड़ पर पहुंच चुका है।

वंदे मातरम् की रचना 7 नवंबर 1875 को अक्षय नवमी के दिन बंगाल के प्रख्यात लेखक बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। संस्कृतनिष्ठ बांग्ला में लिखे इस गीत का अर्थ है- “हे मां, मैं तुझे नमन करता हूं।” 1882 में ये गीत उनके उपन्यास आनंदमठ का हिस्सा बना, जो अठारहवीं सदी के संन्यासी विद्रोह की कहानी पर आधारित था।

1896 में कलकत्ता में कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार इस गीत को सार्वजनिक मंच पर गाया, और यहीं से ये गीत राष्ट्रीय चेतना की आवाज बन गया। 1905 में बंगाल विभाजन के बाद स्वदेशी आंदोलन के दौरान वंदे मातरम् आज़ादी की लड़ाई की सबसे बड़ी पहचान बन चुका था, इतना असरदार कि अंग्रेज सरकार को इसके सार्वजनिक गायन पर पाबंदी तक लगानी पड़ी। हजारों क्रांतिकारी फांसी के फंदे पर चढ़ते वक्त यही दो शब्द बोलते थे।

गीत के छह अंतरे और शुरुआती जटिलता

आनंदमठ में गीत के कुल छह अंतरे हैं। पहले दो अंतरे मातृभूमि की सुंदरता, उसकी नदियों, हवाओं और फसलों का वर्णन करते हैं, जबकि आखिरी दो अंतरों में मां को देवी दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में चित्रित किया गया है। 1937 में जब इन बाद के अंतरों को लेकर मुस्लिम लीग की तरफ से आपत्ति सामने आई, तो जवाहरलाल नेहरू ने सुभाष चंद्र बोस को लिखी अपनी चिट्ठियों में स्वीकार किया कि गीत की पृष्ठभूमि मुसलमानों को नाराज कर सकती है, हालांकि उन्होंने ये भी लिखा कि इस विवाद का एक बड़ा हिस्सा सांप्रदायिक तत्वों द्वारा गढ़ा गया लग रहा था।

इसी मंथन के बाद दिसंबर 1937 में कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने प्रस्ताव पास किया कि राष्ट्रीय आयोजनों में सिर्फ पहले दो अंतरे गाए जाएंगे। कांग्रेस का कहना है कि इस फैसले में महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ टैगोर, सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल और नेहरू जैसे नेता शामिल थे।

संविधान सभा और राष्ट्रीय गीत का दर्जा

14 अगस्त 1947 की रात, संविधान सभा में सुचेता कृपलानी ने वंदे मातरम् गाकर सत्ता हस्तांतरण समारोह की शुरुआत की थी। इसके ढाई साल बाद, 24 जनवरी 1950 को राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने ऐलान किया कि जन गण मन राष्ट्रगान रहेगा, जबकि वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत का दर्जा देते हुए दोनों को बराबर सम्मान दिया जाएगा। इसी संविधान सभा में डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जो बाद में जनसंघ के संस्थापक बने, उन्होंने भी सिर्फ दो अंतरों को अपनाने के फैसले का समर्थन किया था। उस वक्त गीत के कितने अंतरे अनिवार्य होंगे, इसका कोई कानूनी प्रोटोकॉल तय नहीं किया गया था।

150वां साल और सरकार का नया प्रोटोकॉल

90 साल बाद, इसी साल वंदे मातरम् के 150 साल पूरे होने के मौके पर, केंद्र सरकार ने 28 जनवरी को नया निर्देश जारी किया, जिसके मुताबिक अब सरकारी कार्यक्रमों में गीत का पूरा तीन मिनट दस सेकंड का संस्करण, यानी सभी छह अंतरे, गाए या बजाए जाने चाहिए। इस दौरान सभी को सावधान की मुद्रा में खड़ा रहना होगा, और जिन आयोजनों में दोनों गीत शामिल हों, वहां वंदे मातरम् पहले और जन गण मन बाद में होगा। 9 जुलाई को मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्रीय मंत्रालयों को इसकी दोबारा याद दिलाई। हालांकि सिनेमाघरों को इस नियम से छूट दी गई है, और फिलहाल गीत न गाने पर कोई दंड या कानूनी कार्रवाई का प्रावधान नहीं रखा गया है।

यानी जो परंपरा दो अंतरों की थी, उसे अब कानूनी प्रोटोकॉल के तहत पूरे गीत तक बढ़ा दिया गया है, और यही टकराव आज की सियासत की जड़ बन गया है।

15 अगस्त: कैसे शुरू हुआ ताजा विवाद?

आज़ादी की 80वीं सालगिरह पर लाल किले पर पहली बार वंदे मातरम् का पूरा संस्करण बजाया गया। लेकिन उसी दिन दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय, इंदिरा भवन में झंडारोहण के दौरान एक वीडियो वायरल हो गया, जिसमें दावा किया गया कि जब पूरा गीत गाया जा रहा था, तो सोनिया गांधी ने इसे बीच में रुकवाने का इशारा किया।

बस यहीं से बीजेपी हमलावर हो गई।

अमित शाह का सबसे बड़ा हमला

इस पूरे विवाद में सबसे आक्रामक चेहरा बनकर उभरे केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह। तमिलनाडु के चेंगलपट्टू में 31वीं दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की बैठक में 20 अगस्त को शाह ने कहा कि कांग्रेस कार्यसमिति का सिर्फ दो अंतरे गाने का फैसला देशविरोधी है और संसद के बनाए कानून की खुली अवहेलना है। उन्होंने आरोप लगाया कि 1937 में तुष्टीकरण के लिए कांग्रेस ने वंदे मातरम् के टुकड़े किए, और वहीं से दो-राष्ट्र सिद्धांत को ताकत मिली, जिसके नतीजे में देश का बंटवारा हुआ। शाह ने मांग की कि कांग्रेस देश और गीत के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय से माफी मांगे।

इसके अलावा शाह ने राजस्थान के जयपुर, भीलवाड़ा, अलवर, उदयपुर और चित्तौड़गढ़ समेत कई कार्यक्रमों में भी ये हमला जारी रखा। चित्तौड़गढ़ में ‘अटल गौरव स्मृति समारोह’ में उन्होंने कहा कि 80 साल में पहली बार लाल किले की प्राचीर पर वंदे मातरम् का पूरा गायन हुआ, जबकि कांग्रेस वोट बैंक की लालच में इस गीत को भुला चुकी है।

बीजेपी के अन्य नेताओं के आरोप

बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन ने कांग्रेस पर सबसे तीखा हमला बोलते हुए 20 अगस्त को उसे "नई मुस्लिम लीग" तक करार दे दिया। झारखंड सांसद निशिकांत दुबे ने राहुल गांधी की तुलना जिन्ना की विरासत से की। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने सोनिया और राहुल गांधी पर देश के हितों के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया। हिमाचल प्रदेश में वरिष्ठ बीजेपी नेता शांता कुमार ने कहा कि तुष्टीकरण की इसी नीति के चलते पहले भी देश का बंटवारा हुआ था, जिसमें लाखों लोगों को जान गंवानी पड़ी थी। विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने भी इस मुद्दे पर कांग्रेस की आलोचना करते हुए अपनी प्रतिक्रिया दी।

देशभर में विरोध प्रदर्शन

बीजेपी और उसके युवा मोर्चे ने बयानबाजी के साथ-साथ सड़कों पर भी मोर्चा खोल दिया। मध्य प्रदेश के इंदौर, मंदसौर और नर्मदापुरम में कैंडल मार्च और मशाल जुलूस निकाले गए। हरियाणा में पार्टी ने प्रदेश की सभी 27 संगठनात्मक जिलों में एक साथ कैंडल मार्च आयोजित किए। कर्नाटक में बीजेपी कार्यकर्ताओं ने सोनिया गांधी के खिलाफ पुलिस शिकायत तक दर्ज कराई। रांची में भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के कार्यकर्ताओं ने राहुल गांधी का पुतला फूंका। इससे पहले मध्य प्रदेश के ग्वालियर में कांग्रेस दफ्तर का घेराव, राजस्थान के सलूंबर में मशाल जुलूस, और हरियाणा के हांसी में कांग्रेस अध्यक्ष खरगे के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन हो चुके थे।

कांग्रेस का पलटवार

दूसरी तरफ कांग्रेस ने बीजेपी के हर आरोप को खारिज किया। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने सफाई दी कि सोनिया गांधी गीत रुकवाने का इशारा नहीं कर रही थीं, बल्कि उम्रदराज मल्लिकार्जुन खरगे के लिए कुर्सी की व्यवस्था करने का इशारा कर रही थीं।

19 अगस्त को दिल्ली स्थित पार्टी मुख्यालय में हुई कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) की बैठक में, जिसमें चार राज्यों के मुख्यमंत्रियों समेत 88 से ज्यादा नेता शामिल हुए, पार्टी ने औपचारिक तौर पर अपना रुख साफ कर दिया कि उसके कार्यक्रमों में 1937 की परंपरा के अनुसार सिर्फ पहले दो अंतरे ही गाए जाएंगे। पार्टी महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल ने कहा कि 15 अगस्त को जो हुआ, वो महज एक "कम्युनिकेशन गैप" यानी संवाद की कमी थी, कोई जानबूझकर किया गया अपमान नहीं।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी पलटवार करते हुए कहा कि पार्टी वही संस्करण गा रही है जिसे महात्मा गांधी, नेहरू और पटेल जैसे नेताओं ने अपनाया था, और बीजेपी को उन्हें देशभक्ति सिखाने की जरूरत नहीं।

नेता राशिद अल्वी ने कहा कि 1937 में कलकत्ता अधिवेशन में जो प्रस्ताव पास हुआ, उसमें महात्मा गांधी, टैगोर, सुभाष बोस और नेहरू शामिल थे, और यहां तक कि जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भी 1950 में संविधान सभा में सिर्फ दो अंतरों को अपनाने का समर्थन किया था। सांसद रेणुका चौधरी ने कहा कि ये फैसला महात्मा गांधी और आंबेडकर जैसे दूरदर्शी नेताओं का था, इसे तुष्टीकरण नहीं बल्कि समावेशी सोच कहा जाना चाहिए। सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद ने कहा कि वो राष्ट्रगीत के सम्मान में खड़े रहेंगे, लेकिन अपनी धार्मिक आस्था के चलते इसे गाएंगे नहीं, क्योंकि उनका धर्म अल्लाह के अलावा किसी और की वंदना की इजाजत नहीं देता।

मुकेश खन्ना का विवादित बयान

इसी सियासी माहौल के बीच अभिनेता मुकेश खन्ना का एक बयान भी चर्चा में आया, जिसमें उन्होंने मांग की कि जन गण मन को हटाकर वंदे मातरम् को राष्ट्रगान बना दिया जाए। हालांकि इस दौरान वे खुद वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत की जगह गलती से राष्ट्रगान बताते और गीत के बोलों को गलत उच्चारण के साथ पढ़ते नजर आए।

क्या सिर्फ एक गीत तक ही सीमित है ये विवाद?

इस पूरे मामले के केंद्र में एक संवैधानिक सवाल भी है। आलोचकों का तर्क है कि वंदे मातरम् को अनिवार्य रूप से गवाना, संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मिले धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार से टकरा सकता है। दूसरी तरफ समर्थकों का कहना है कि वंदे मातरम् धार्मिक आह्वान नहीं, बल्कि देशभक्ति की अभिव्यक्ति है। दिलचस्प बात ये है कि दोनों तरफ के नेता अपने-अपने तर्क के लिए 1937 के उसी प्रस्ताव और उन्हीं ऐतिहासिक हस्तियों, महात्मा गांधी, नेहरू, सुभाष बोस और श्यामा प्रसाद मुखर्जी का हवाला दे रहे हैं, बस नतीजे अलग-अलग निकाल रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में कई राज्यों के चुनाव को देखते हुए, राष्ट्रवाद बनाम तुष्टीकरण की ये बहस आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है। सवाल ये उठता है कि क्या ये बहस वंदे मातरम् के इतिहास को समझने के लिए हो रही है, या फिर दोनों पार्टियों के लिए एक ऐसा मुद्दा बन गई है, जिस पर अपने-अपने राजनीतिक समर्थकों को मजबूत किया जा सके।