नई दिल्ली: देश में पहली बार पेट्रोल सिर्फ पेट्रोल नहीं रहा। हर लीटर पेट्रोल के साथ अब राजनीति, विज्ञान, किसानों की उम्मीद, पर्यावरण की चिंता और करोड़ों वाहन मालिकों की आशंका भी जुड़ चुकी है। जिस एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल, यानी E20 को कभी हरित ईंधन, किसानों की तरक्की का ज़रिया और भारत को तेल आयात से आज़ादी दिलाने वाला सपना बताया गया था, वही आज देश की सबसे बड़ी सार्वजनिक बहसों में शुमार हो चुका है।
सरकार का दावा है कि इससे देश के करोड़ों रुपये बचे हैं, विदेशी तेल पर निर्भरता घटी है, प्रदूषण कम हुआ है और किसानों की आमदनी भी बढ़ी है। दूसरी तरफ लाखों वाहन मालिक सवाल पूछ रहे हैं- अगर सब कुछ इतना अच्छा है, तो गाड़ियों की माइलेज क्यों घट रही है, मैकेनिकों के पास शिकायतें क्यों बढ़ रही हैं, कार कंपनियों की मैनुअल किताबों में अलग-अलग बातें क्यों लिखी हैं, और आखिर यह मामला अदालत तक क्यों पहुंचा?
यह रिपोर्ट इसी बहस को शुरुआत से आखिर तक, हर पहलू के साथ समझने की कोशिश है, ताकि पाठक खुद तय कर सकें कि यह बदलाव उनके लिए कितना फायदेमंद है, और कितना चुनौतीपूर्ण।

शुरुआत कहां से हुई, और आज क्या हैं हालात
भारत में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का कार्यक्रम 2003 में एक पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू हुआ था। इसके बाद देश पहले E5, फिर E10 और अब E20 यानी 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल तक पहुंच चुका है। सरकार का लक्ष्य 2030 तक E20 हासिल करने का था, लेकिन पेट्रोलियम मंत्रालय के मुताबिक यह लक्ष्य दिसंबर 2025 में ही, तय समय से करीब पांच साल पहले, हासिल कर लिया गया, जबकि 2013-14 में ब्लेंडिंग का स्तर महज़ डेढ़ फीसदी के आसपास था। आज देश के लगभग सभी खुदरा पेट्रोल पंपों पर E20 उपलब्ध है।
सरकार के मुताबिक भारत अपनी ज़रूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है, जिस पर हर साल लाखों करोड़ रुपये खर्च होते हैं। पेट्रोलियम मंत्रालय का दावा है कि 2014-15 से अब तक एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम से 1.9 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा की विदेशी मुद्रा बचाई जा चुकी है, किसानों को 1.6 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का भुगतान समय से हुआ है, करीब 930 लाख मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन घटा है, और 310 लाख मीट्रिक टन से ज़्यादा कच्चे तेल के आयात की जगह ली जा चुकी है। देश की स्थापित एथेनॉल उत्पादन क्षमता अब करीब 2,000 करोड़ लीटर तक पहुंच चुकी है, और मौजूदा एथेनॉल सप्लाई ईयर (2025-26) में 1,200 करोड़ लीटर से ज़्यादा खरीद का अनुमान है।
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी लगातार इसे भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम बताते रहे हैं। उनका कहना है कि यह सिर्फ ईंधन बदलने की नीति नहीं, बल्कि किसानों, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था, तीनों के हित में लिया गया फैसला है।
लेकिन जैसे-जैसे E20 पूरे देश में पहुंचा, वैसे-वैसे सवाल भी बढ़ने लगे। सोशल मीडिया पर माइलेज घटने, इंजन की परफॉर्मेंस प्रभावित होने और पुराने वाहनों में तकनीकी दिक्कतों के दावे वायरल होने लगे। भोपाल, रीवा और रायबरेली समेत कई शहरों में वाहन मालिकों ने शिकायतें उठाईं, जिसके बाद स्थानीय स्तर पर पेट्रोल के नमूनों की जांच तक कराई गई।

सर्वे बनाम सरकारी परीक्षण
जून 2026 में जारी हुए लोकलसर्किल्स के एक सर्वे ने इस बहस को और तेज़ कर दिया। देश के 305 ज़िलों में 44 हज़ार से ज़्यादा लोगों की भागीदारी वाले इस सर्वे में, 2023 से पहले खरीदे गए पेट्रोल वाहनों के 66 प्रतिशत मालिकों ने दावा किया कि E20 इस्तेमाल करने के बाद उनकी गाड़ियों का माइलेज 10 प्रतिशत से ज़्यादा घटा है। 55 प्रतिशत लोगों ने मरम्मत और टूट-फूट बढ़ने की शिकायत की, और 53 प्रतिशत प्रतिभागियों ने सरकार की E20 नीति के क्रियान्वयन को 'बेहद खराब' या 'अप्रभावी' बताया। हालांकि यह एक स्वतंत्र सर्वे है, और सरकार इन दावों से सहमत नहीं है।
दूसरी तरफ सरकार की परीक्षण एजेंसी ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI) का कहना है कि चार पहिया गाड़ियों में करीब 40 हज़ार किलोमीटर और दोपहिया वाहनों में करीब 20 हज़ार किलोमीटर तक परीक्षण किए गए, जिनमें ड्राइविंग या ईंधन दक्षता पर कोई बड़ा नकारात्मक असर सामने नहीं आया, सिर्फ मामूली बदलाव दर्ज हुए। एजेंसी ने यह भी माना कि कुछ पुराने वाहनों में रबर के पुर्ज़ों, होज़, गैस्केट और सील पर एथेनॉल का असर पड़ सकता है। एक परीक्षण में 809 घंटे बाद एक वाहन के एग्ज़ॉस्ट वॉल्व में खराबी भी दर्ज हुई, हालांकि एजेंसी का कहना है कि इसके पीछे अन्य तकनीकी कारण भी हो सकते हैं।
पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी का कहना है कि माइलेज पर असर बेहद मामूली है और ज़्यादातर शिकायतें भ्रामक हैं। सरकार का यह भी कहना है कि केवल E20 पेट्रोल भरवाने से किसी वाहन का इंश्योरेंस अपने आप अमान्य नहीं होगा। फिलहाल सरकार का रोडमैप 31 अक्टूबर 2026 तक E20 पर केंद्रित है, और इसके आगे किसी भी कदम से पहले अंतर-मंत्रालयी समिति की रिपोर्ट और सभी पक्षों से सलाह-मशविरा किया जाएगा।
एथेनॉल है क्या, और पेट्रोल में मिलाया कैसे जाता है
एथेनॉल एक तरह का बायो-फ्यूल यानी जैव ईंधन है, जो मुख्य रूप से गन्ने के रस, शीरे (मोलासेस), मक्का, टूटे हुए चावल और कुछ अन्य कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है। इन फसलों में मौजूद स्टार्च और शर्करा को पहले फर्मेंटेशन (किण्वन) की प्रक्रिया से गुज़ारा जाता है, फिर डिस्टिलेशन के ज़रिए शुद्ध एथेनॉल तैयार किया जाता है। इसके बाद पानी को पूरी तरह अलग किया जाता है, ताकि ईंधन के लिए इस्तेमाल होने वाला एनहाइड्रस एथेनॉल, यानी बिना पानी वाला शुद्ध अल्कोहल तैयार हो सके।
इसके बाद तेल कंपनियों के डिपो में इसे तय अनुपात में पेट्रोल के साथ मिलाया जाता है। दस प्रतिशत एथेनॉल वाले मिश्रण को E10 कहा जाता है, बीस प्रतिशत एथेनॉल और अस्सी प्रतिशत पेट्रोल वाले मिश्रण को E20। यानी पेट्रोल पंप पर मिलने वाला E20 कोई अलग ईंधन नहीं, बल्कि तय वैज्ञानिक मानकों के अनुसार तैयार किया गया मिश्रण है।

सरकार इस नीति के पीछे तीन बड़ी वजहें गिनाती है- विदेशी कच्चे तेल पर निर्भरता घटाना, किसानों को गन्ना-मक्का जैसी फसलों के लिए नया और स्थायी बाज़ार देना, और वाहनों से होने वाले कार्बन उत्सर्जन में कमी लाना। गडकरी का कहना रहा है कि अगर किसान 'अन्नदाता' के साथ-साथ 'ऊर्जादाता' भी बनें, तो गांवों की अर्थव्यवस्था मज़बूत होगी और देश की ऊर्जा सुरक्षा भी बढ़ेगी।
सरकार की योजना अब सिर्फ पेट्रोल तक सीमित नहीं है। गडकरी के मुताबिक डीज़ल के लिए भी वैकल्पिक जैव ईंधन पर काम चल रहा है। चूंकि एथेनॉल को सीधे डीज़ल में नहीं मिलाया जा सकता, इसलिए वैज्ञानिक इसे आइसोब्यूटेनॉल में बदलने की तकनीक पर काम कर रहे हैं, जिसमें टाटा मोटर्स समेत कई कंपनियां सहयोग कर रही हैं। सफल रहने पर डीज़ल में भी करीब 15 प्रतिशत तक आइसोब्यूटेनॉल मिलाने की योजना लागू हो सकती है।

विरोध की जड़- मैकेनिक, इंश्योरेंस कंपनियां और कार कंपनियों की मैनुअल किताबें
सबसे बड़ी चिंता उन करोड़ों लोगों की है, जिनके पास 2023 से पहले खरीदी गई गाड़ियां हैं। कई वाहन मालिकों ने माइलेज घटने के अलावा इंजन परफॉर्मेंस, कोल्ड स्टार्ट और फ्यूल सिस्टम से जुड़ी दिक्कतों की शिकायत भी की है। मैकेनिकों का एक वर्ग मानता है कि पुराने वाहनों में लंबे समय तक ज़्यादा एथेनॉल मिश्रित ईंधन इस्तेमाल करने से रबर के कुछ पुर्ज़ों, फ्यूल पाइप, गैस्केट और फ्यूल पंप पर असर पड़ सकता है- हालांकि ऑटोमोबाइल इंजीनियरों का कहना है कि यह असर वाहन की उम्र, तकनीक और डिज़ाइन पर निर्भर करता है, हर वाहन में एक जैसा नहीं होता।
विवाद तब और बढ़ गया जब कुछ वाहन कंपनियों के पुराने ओनर मैनुअल सामने आए। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने आरोप लगाया कि कुछ कंपनियों के मैनुअल में अधिकतम E10 ईंधन इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है, और सवाल उठाया कि जब करोड़ों पुराने वाहन E20 के लिए डिज़ाइन ही नहीं किए गए थे, तो इसे पूरे देश में इतनी तेज़ी से क्यों लागू किया गया। उनका यह भी दावा रहा कि तीन जुलाई को केंद्र सरकार ने मारुति सुज़ुकी, टोयोटा किर्लोस्कर, हीरो मोटोकॉर्प, हुंडई, बजाज ऑटो और टीवीएस मोटर जैसी कंपनियों को एक साझा मंच पर बुलाकर E20 को सुरक्षित बताने के लिए कहा, जबकि टोयोटा की अपनी आधिकारिक मैनुअल किताब सिर्फ E10 तक की सलाह देती है।
बीमा कंपनियों की तरफ से भी सतर्क करने वाले बयान आए। एक बड़ी बीमा कंपनी आईसीआईसीआई लोम्बार्ड ने कहा कि अगर कोई गाड़ी E20 के लिए नहीं बनी और फिर भी उसमें यह ईंधन डाला जाता है, तो इससे होने वाला नुकसान 'लापरवाही' माना जा सकता है, जिससे क्लेम खारिज होने का खतरा बढ़ जाता है। सरकार ने अपनी तरफ से स्पष्ट किया है कि केवल E20 पेट्रोल इस्तेमाल करने से किसी वाहन का बीमा अपने आप अमान्य नहीं होता, लेकिन किसी भी क्लेम का फैसला वाहन की वास्तविक तकनीकी खराबी, निर्माता की गाइडलाइन और पॉलिसी की शर्तों के आधार पर ही होगा- यानी पॉलिसी रद्द न होना और क्लेम पास होना, ये दो अलग बातें हैं।
दूसरी तरफ सरकार और कई प्रमुख ऑटोमोबाइल कंपनियों ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि E20 ईंधन सुरक्षित है और ज़्यादातर वाहनों में इससे कोई बड़ी तकनीकी समस्या नहीं आती। नितिन गडकरी ने आलोचकों को खुली चुनौती दी कि अगर किसी के पास ऐसा एक भी प्रमाणित मामला है जिसमें सिर्फ E20 की वजह से किसी वाहन का इंजन खराब हुआ हो, तो उसे सामने लाया जाए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि एथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर कई भ्रामक और प्रायोजित अभियान चलाए जा रहे हैं। गडकरी के परिवार से जुड़ी कंपनियों- सियान एग्रो इंडस्ट्रीज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर और मानस एग्रो पर लगे हितों के टकराव के आरोपों को भी उन्होंने निराधार बताते हुए कहा कि उनकी पारिवारिक कंपनियां चीनी मिलें चलाती हैं, लेकिन नीति निर्माण में उनकी कोई भूमिका नहीं है।

अदालत में क्या हुआ
यह विवाद अदालत तक भी पहुंचा। भारत पेट्रोलियम और अन्य तेल कंपनियों से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान मीडिया के एक हिस्से में यह खबर चली कि अटॉर्नी जनरल ने अदालत में E20 को एक ‘प्रयोग’ यानी एक्सपेरिमेंट बताया है। इस दावे के बाद विपक्ष ने सवाल उठाया कि अगर यह अब भी प्रयोग है, तो करोड़ों वाहनों पर इसे क्यों थोपा जा रहा है। हालांकि केंद्र सरकार और अटॉर्नी जनरल के कार्यालय ने इन खबरों का खंडन करते हुए स्पष्ट किया कि अदालत में नीति की वैधता या तकनीकी प्रभाव पर कोई टिप्पणी नहीं की गई थी, सुनवाई सिर्फ एथेनॉल आवंटन से जुड़े कानूनी विवाद तक सीमित थी। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मौजूदा एथेनॉल सप्लाई व्यवस्था को यथावत बनाए रखने का आदेश दिया है।
पेट्रोलियम मंत्रालय ने इसी महीने एक विस्तृत 10-सूत्रीय स्पष्टीकरण भी जारी किया, जिसमें पानी की खपत, इंजन को नुकसान, इंश्योरेंस अमान्य होने और पर्यावरण को नुकसान जैसे कई वायरल दावों को भ्रामक बताया गया। मंत्रालय के मुताबिक एथेनॉल संयंत्रों को पर्यावरण मंज़ूरी लेनी होती है, भूजल नियमों का पालन करना होता है और ज़ीरो लिक्विड डिस्चार्ज सिस्टम चलाना अनिवार्य है।
E25, E27, E30, E85 और E100 की तैयारी
सरकार का रोडमैप E20 पर खत्म नहीं होता। 1 अप्रैल 2026 से E20 पेट्रोल के लिए न्यूनतम रिसर्च ऑक्टेन नंबर 95 तय किया जा चुका है, और भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने 22 से 30 प्रतिशत तक एथेनॉल मिश्रण के लिए भी नए मानक अधिसूचित कर दिए हैं।
पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के मुताबिक अब देश की नज़र चरणबद्ध तरीके से E25, E27 और E30 की तरफ है। उनका दावा है कि E20 लागू होने के बाद बीते दस महीनों में इंजन फेल होने या टूटने का एक भी पुष्ट मामला सामने नहीं आया। उन्होंने ब्राज़ील का उदाहरण दिया, जहां सालों से E27 पेट्रोल इस्तेमाल हो रहा है। पेट्रोलियम मंत्रालय के मुताबिक 2030 तक E30 का लक्ष्य हासिल करने की योजना है, और BIS पहले ही E27 के मानकों पर काम शुरू कर चुका है।
इससे भी आगे बढ़कर सरकार ने E85 और लगभग पूरी तरह एथेनॉल पर आधारित ईंधन E100 को भी कानूनी मंज़ूरी दे दी है। गडकरी ने जून 2026 में नागपुर में हुई शुगर, एथेनॉल एंड बायो-एनर्जी इंडिया कॉन्फ्रेंस में बताया कि उन्होंने खुद उसी रात करीब आठ बजे E100 को कानूनी मान्यता देने वाली फाइल पर दस्तखत किए। दिल्ली में E85 बिकना भी शुरू हो चुका है, जिसकी कीमत मौजूदा E20 के मुकाबले करीब बीस रुपये प्रति लीटर कम है।
#WATCH | Nagpur, Maharashtra: Union Minister Nitin Gadkari says, “Last night at 8 PM, I signed the file, finalising the regulations to legally authorise the use of 100% ethanol. I am delighted to share that I, along with Hardeep Singh Puri, had the opportunity to launch the 100%… pic.twitter.com/BDIyTZGZF4
— ANI (@ANI) June 13, 2026
हालांकि E85 और E100 आम गाड़ियों में सीधे नहीं भरे जा सकते। इसके लिए खास तौर पर बनी ‘फ्लेक्स-फ्यूल’ गाड़ियां चाहिए, जिनमें इंजन टंकी में मौजूद एथेनॉल के अनुपात को खुद पहचानकर इग्निशन और फ्यूल इंजेक्शन को अपने आप बदल लेता है। मारुति सुज़ुकी अपनी वैगन आर का फ्लेक्स-फ्यूल वर्ज़न पहले ही दिखा चुकी है, हीरो मोटोकॉर्प की कुछ बाइकें भी तैयार हैं, और गडकरी के मुताबिक टोयोटा, सुज़ुकी, हुंडई और एमजी जैसी कंपनियां भी जल्द अपनी फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां उतारने वाली हैं। सरकार ने दिसंबर 2026 तक करीब पांच सौ पेट्रोल पंपों पर और 2027 के अंत तक करीब पांच हज़ार पंपों पर E85 जैसी सुविधा पहुंचाने का लक्ष्य रखा है।
सस्ते चावल की सब्सिडी, और एक नई स्टडी जो सवाल और गहरे कर देती है
बीते हफ्ते सरकार ने एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने के लिए भारतीय खाद्य निगम (FCI) के अतिरिक्त 20 लाख टन टूटे चावल के भंडार को इस कार्यक्रम के लिए जारी किया है- यह उस 52 लाख टन के अतिरिक्त है, जो पहले ही जारी किया जा चुका था। यह चावल अक्टूबर 2026 तक 2,320 रुपये प्रति क्विंटल और उसके बाद जून 2027 तक 2,390 रुपये प्रति क्विंटल की दर पर एथेनॉल उत्पादकों को बेचा जाएगा, जबकि FCI की अपनी आर्थिक लागत करीब 4,100 रुपये प्रति क्विंटल बैठती है। यानी सरकार अनाज-आधारित एथेनॉल उत्पादकों को भारी सब्सिडी दे रही है, ताकि ब्लेंडिंग कार्यक्रम की रफ़्तार बनी रहे।
लेकिन ठीक इसी हफ्ते, 8 जुलाई को साइंस जर्नल 'पीएलओएस वन' में भारत, जर्मनी और फ्रांस के शोधकर्ताओं की एक साझा स्टडी प्रकाशित हुई है, जो इस पूरी बहस में एक नया और गंभीर आयाम जोड़ती है। यह अध्ययन 2020 से 2050 तक के अनुमानों के आधार पर बताता है कि गन्ने पर आधारित एथेनॉल उत्पादन बढ़ने से ज़मीन के इस्तेमाल के तरीके, नाइट्रोजन उत्सर्जन, पानी की खपत और खाद्य सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक जैसे-जैसे एथेनॉल उत्पादन में गन्ने के रस के सीधे इस्तेमाल का हिस्सा बढ़ता है और मोलासेस यानी शीरे की हिस्सेदारी घटती है, वैसे-वैसे चीनी के अतिरिक्त उत्पादन (सरप्लस) में भी कमी आती जाती है, जिसका सीधा असर घरेलू बाज़ार में चीनी की उपलब्धता और कीमतों पर पड़ सकता है।
यह अध्ययन सरकार के दावों को सिरे से खारिज नहीं करता, लेकिन यह ज़रूर दिखाता है कि ऊर्जा सुरक्षा और किसानों की आय के फायदे अपनी जगह हैं, पर ज़मीन, पानी और खाद्यान्न पर पड़ने वाला दीर्घकालिक दबाव भी उतना ही वास्तविक है, और यही वजह है कि विशेषज्ञ अब सिर्फ इंजन और माइलेज तक सीमित न रहकर, इस नीति के कृषि और पर्यावरणीय पहलुओं पर भी स्वतंत्र आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग कर रहे हैं।
निष्कर्ष: किसी एक पक्ष के पास भी नहीं सच्चाई
बीस फीसदी एथेनॉल, अस्सी फीसदी पेट्रोल, लेकिन इस बहस में सौ फीसदी सच्चाई किसी एक पक्ष के पास नहीं है। सरकारी आंकड़े कहते हैं कि देश ने विदेशी मुद्रा बचाई, किसानों की आमदनी बढ़ी, कार्बन उत्सर्जन घटा। जनता के अनुभव कहते हैं कि माइलेज घट रहा है, मरम्मत का खर्च बढ़ रहा है, और चुनने का हक तक सीमित हो गया है। और अब एक नई वैज्ञानिक स्टडी यह भी बताती है कि इसका असर सिर्फ गाड़ियों तक नहीं, बल्कि ज़मीन, पानी और खाद्य सुरक्षा तक जा सकता है।
सवाल यह नहीं है कि एथेनॉल अच्छा है या बुरा। सवाल यह है कि जब कोई नीति करोड़ों लोगों की जेब, उनकी गाड़ियों की उम्र और देश की खाद्य-सुरक्षा तक से जुड़ी हो, तो क्या सिर्फ भरोसा करने को कहा जाना काफी है, या फिर पारदर्शी आंकड़े, स्पष्ट विकल्प और ज़रूरत पड़ने पर मुआवज़े की गारंटी भी उतना ही ज़रूरी हक है। सरकार कहती है भरोसा रखिए, कार कंपनियां कहती हैं मैनुअल पढ़िए, इंश्योरेंस कंपनियां कहती हैं सावधानी बरतिए, और अब वैज्ञानिक कहते हैं दीर्घकालिक असर पर नज़र रखिए। ऐसे में आम आदमी आखिर किसकी सुने, यही इस पूरी बहस का सबसे बड़ा और अनुत्तरित सवाल बना हुआ है।
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