नई दिल्ली: कुछ ही हफ़्ते पहले दुनिया ने राहत की सांस ली थी। जून के मध्य में इस्लामाबाद समझौता, वह मेमोरैंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग, जिस पर 17 जून को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने दस्तख़त किए, ने ऐसा भरोसा दिलाया था कि फ़रवरी से चली आ रही यह ख़ूनी जंग शायद अपने अंत की ओर बढ़ रही है। नौसैनिक नाकेबंदी हटी, होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाज़ों की आवाजाही लौटने लगी, और कच्चे तेल की क़ीमतें युद्ध-पूर्व स्तर तक फिसल गईं।

लेकिन यह राहत कुछ ही दिनों की मेहमान साबित हुई। इस हफ़्ते वही युद्धविराम इतिहास बन चुका है। तुर्की के अंकारा में नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान ट्रम्प ने खुले शब्दों में ऐलान कर दिया कि ईरान के साथ हुआ समझौता उनकी नज़र में ‘ख़त्म’ हो गया है। और यह सिर्फ़ बयानबाज़ी नहीं थी। अमेरिकी सेना ने लगातार दो रातों तक ईरान पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए, ईरान ने खाड़ी में अमेरिकी ठिकानों पर जवाबी मिसाइलें और ड्रोन दागे, और होर्मुज़ का वह संकरा समुद्री रास्ता, जिससे दुनिया की एक-चौथाई तेल आवाजाही गुज़रती है, एक बार फिर आग की ज़द में आ गया।

यह कहानी सिर्फ़ मिसाइलों की नहीं है। यह उस भरोसे के टूटने की कहानी है, जिस पर वैश्विक अर्थव्यवस्था की सांसें टिकी थीं।

वो सच, जिसे भुलाया नहीं जा सकता

इस पूरे संकट को समझने से पहले एक बुनियादी तथ्य दोहराना ज़रूरी है, क्योंकि उसी की छाया आज के हर घटनाक्रम पर पड़ रही है।

यह जंग 28 फ़रवरी 2026 को शुरू हुई, जब अमेरिका और इज़राइल ने संयुक्त हवाई हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की हत्या कर दी। लगभग चार दशक तक ईरान की सत्ता के केंद्र रहे ख़ामेनेई की मौत ने पूरे क्षेत्र को हिला दिया। उनके बेटे मोज्तबा ख़ामेनेई को नया सर्वोच्च नेता नियुक्त किया गया, हालांकि वे सार्वजनिक रूप से बेहद कम नज़र आए हैं।

चार महीने तक हालात इतने ख़तरनाक बने रहे कि ख़ामेनेई का अंतिम संस्कार तक टलता रहा। यह इसी हफ़्ते, जुलाई के पहले सप्ताह में, तेहरान और मशहद में संपन्न हुआ, ठीक उसी समय जब अमेरिका के ताज़ा हमले फिर शुरू हो गए।

यानी जब हम ‘युद्धविराम के टूटने’ की बात करते हैं, तो हम एक ऐसी जंग की बात कर रहे हैं जो कभी पूरी तरह ठंडी नहीं पड़ी थी।

24 घंटे जिन्होंने तस्वीर पलट दी

घटनाक्रम की रफ़्तार समझनी ज़रूरी है। मंगलवार को होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुज़र रहे तीन व्यावसायिक तेल टैंकरों पर प्रोजेक्टाइल से हमला हुआ। ईरान ने सीधे तौर पर ज़िम्मेदारी नहीं ली, लेकिन अमेरिका और कई खाड़ी देशों ने तुरंत तेहरान पर उंगली उठाई। जवाब में अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने मंगलवार शाम जवाबी हमले शुरू किए। रिपोर्टों के मुताबिक़ 80 से ज़्यादा ठिकानों को निशाना बनाया गया, जिनमें एयर डिफ़ेंस सिस्टम, तटीय रडार और कमांड-एंड-कंट्रोल नेटवर्क शामिल थे। ईरानी सेना के हवाले से राज्य समाचार एजेंसी IRNA ने बंदर अब्बास और बुशेहर में हुए इन हमलों में अपने आठ वायुसैनिकों और नौसैनिकों की मौत की पुष्टि की।

बुधवार को यह और तेज़ हो गया। CENTCOM के अनुसार अमेरिका ने ईरान भर में लगभग 90 सैन्य ठिकानों पर हमले किए। अल जज़ीरा और NBC न्यूज़ की पुष्टि के अनुसार निशाना बने शहरों में ईरानशहर, बंदर अब्बास, कोनारक, चाबहार, बुशेहर और पूर्वोत्तर ईरान का आक़ क़ला शामिल थे। ईरानशहर हवाई अड्डे पर हुए हमले में एक दमकलकर्मी की मौत हुई। ईरानी स्वास्थ्य मंत्रालय ने गुरुवार को इन दो दिनों का पहला समेकित आँकड़ा जारी करते हुए बताया कि कम से कम 14 लोग मारे गए और 78 घायल हुए।

ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई की। तेहरान ने बहरीन और कुवैत में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले का दावा किया, और इसकी गूँज क़तर और जॉर्डन तक अलर्ट के रूप में सुनाई दी। 

(नोट: कुछ शुरुआती दावों में 85 अमेरिकी ठिकानों या फिफ़्थ फ़्लीट मुख्यालय पर सीधे हमले की बात कही गई थी, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध स्रोतों में नहीं है; इसलिए हम केवल पुष्ट जानकारी दे रहे हैं।)

इसी बीच एक और संवेदनशील मुद्दा उभरा। ईरानी विदेश मंत्रालय ने बुधवार के हमलों को ‘गंभीर युद्ध अपराध’ बताते हुए आरोप लगाया कि इनमें दो रेलवे पुलों समेत नागरिक ढांचे को निशाना बनाया गया, वही रास्ता जो मशहद की ओर जाता है, जहाँ ख़ामेनेई को दफ़नाया जाना था। NBC न्यूज़ द्वारा जियोलोकेट किए गए वीडियो में गोलेस्तान प्रांत में एक क्षतिग्रस्त रेलवे पुल दिखा।

बुशेहर परमाणु संयंत्र को लेकर भी सवाल उठे। एक स्थानीय अधिकारी ने दावा किया कि हमले ने संयंत्र की परिधि को छुआ, लेकिन एक अमेरिकी अधिकारी ने गुरुवार को स्पष्ट रूप से इनकार किया कि बुशेहर परमाणु संयंत्र को निशाना बनाया गया।

अमेरिका ने इन्हीं ठिकानों को क्यों चुना?

असली रणनीति यहाँ छिपी है। अमेरिका ने इस बार तेहरान पर सबसे बड़ा हमला नहीं किया। उसने दक्षिणी तट को चुना, और इसके पीछे एक साफ़ तर्क है।

बंदर अब्बास ईरानी नौसेना का सबसे बड़ा परिचालन केंद्र और देश का सबसे व्यस्त बंदरगाह है। फ़ारस की खाड़ी में ईरान की समुद्री ताक़त की रीढ़ यहीं से चलती है।

सिरिक और क़ेश्म द्वीप होर्मुज़ के बेहद क़रीब हैं, वही चोकपॉइंट जहाँ से दुनिया की ऊर्जा गुज़रती है।

चाबहार का नाम सीधे भारत से जुड़ता है। यह वही बंदरगाह है जिसमें भारत ने वर्षों निवेश किया है, और जो पाकिस्तान को दरकिनार कर अफ़ग़ानिस्तान व मध्य एशिया तक पहुँचने की भारत की रणनीति का केंद्र है। इसलिए चाबहार के आसपास बढ़ता तनाव नई दिल्ली की भी चिंता है।

लेकिन सबसे बड़ा किरदार है खार्ग द्वीप - वह टर्मिनल जहाँ से ईरान का लगभग 90 फ़ीसदी कच्चा तेल निर्यात होता है। यही ईरानी अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी धड़कन है। और यहीं सबसे बड़ा ख़तरा भी है: ट्रम्प ने खुलेआम चेतावनी दी है कि भविष्य के हमले खार्ग द्वीप के निर्यात टर्मिनल को निशाना बना सकते हैं। यदि ऐसा हुआ, तो यह सीधे ईरान की कमाई पर वार होगा।

रक्षा विशेषज्ञों का आकलन साफ़ है- अमेरिका ज़मीन पर कब्ज़ा नहीं करना चाहता। वह ईरान की उस समुद्री क्षमता को इतना कमज़ोर करना चाहता है कि होर्मुज़ में अंतरराष्ट्रीय जहाज़ों को दोबारा निशाना बनाना ईरान के लिए मुमकिन न रहे। यह लड़ाई इलाक़े की नहीं, समुद्री नियंत्रण की है।

वो क़ीमत, जो आम आदमी चुकाता है

जंग की शुरुआत मिसाइलों से होती है, पर उसका अंत अक्सर आम आदमी की जेब पर होता है।

पिछले हफ़्तों में तेल बाज़ार ने नाटकीय उतार-चढ़ाव देखा। जून में इस्लामाबाद समझौते के बाद ब्रेंट क्रूड युद्ध-पूर्व स्तर पर लौट आया था। 1 जुलाई को यह 70 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे चला गया। लेकिन इस हफ़्ते हमलों के बाद बाज़ार फिर उछला। बुधवार को ब्रेंट में 3% से ज़्यादा और उसके बाद के सत्र में मई के बाद की सबसे बड़ी एक-दिनी छलांग दर्ज हुई।

हालांकि, और यह अहम है। यह कोई एकतरफ़ा उछाल नहीं रहा। 9 जुलाई तक ब्रेंट फिर घटकर लगभग 73 से 77 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में आ गया। बाज़ार अब भी असमंजस में है: आपूर्ति में वास्तविक बाधा कितनी होगी, यह अभी स्पष्ट नहीं। अमेरिका ने मंगलवार देर रात ईरानी तेल पर लगी 60-दिन की छूट भी वापस ले ली, ये पाबंदी 17 जुलाई से प्रभावी होगी, जो बाज़ार पर एक और दबाव है।

समुद्र में असर तुरंत दिखा। ship-tracking डेटा के मुताबिक़ 8 जुलाई को कम से कम चार तेल और गैस टैंकर होर्मुज़ पार करने की कोशिश बीच में छोड़कर लौट गए। युद्ध से पहले जहाँ रोज़ाना लगभग 110 जहाज़ इस रास्ते से गुज़रते थे, वहीं अब यह संख्या बहुत कम रह गई है, और GPS स्पूफ़िंग जैसी गड़बड़ियाँ फिर लौट आई हैं। एक क़तरी LNG टैंकर, अल रेकायात, ओमान के पास प्रोजेक्टाइल की चपेट में आया, जिसके इंजन रूम में आग लग गई। हालांकि पूरा दल सुरक्षित निकाल लिया गया।

भारत के लिए इसका क्या मतलब है?

भारत इस युद्ध का हिस्सा नहीं है, पर इसका असर सबसे पहले उसी की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

भारत अपनी ज़रूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है, और इसका बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है। अगर होर्मुज़ में आवाजाही लगातार बाधित रही, तो तीन चीज़ें एक साथ बढ़ सकती हैं। कच्चे तेल की क़ीमत, शिपिंग लागत और बीमा प्रीमियम। इसका असर सिर्फ़ पेट्रोल-डीज़ल तक सीमित नहीं रहेगा; रसोई गैस, हवाई किराया, माल ढुलाई और रोज़मर्रा की महंगाई, सब इसकी ज़द में आ सकते हैं।

भारत की चिंता सिर्फ़ तेल तक सीमित नहीं। खाड़ी देशों में काम कर रहे लाखों भारतीय, वहाँ का व्यापार, और चाबहार में भारत का रणनीतिक निवेश, इन सब पर नई दिल्ली की क़रीबी नज़र है।

(नोट: महंगाई और आपूर्ति पर सटीक प्रभाव अभी अनुमानित हैं और हालात के साथ बदल सकते हैं। ये आँकड़े स्थिति-सापेक्ष हैं।)

पर्दे के पीछे की कूटनीति 

यहाँ एक उम्मीद की किरण है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

तमाम हमलों के बावजूद, एक अमेरिकी अधिकारी के अनुसार पर्दे के पीछे कूटनीति जारी है। रिपोर्टों के मुताबिक़ अमेरिका ‘हमला करो, फिर रुको’ की रणनीति अपना रहा है, तनाव को बढ़ने से रोकते हुए बातचीत के लिए जगह छोड़ता हुआ। पाकिस्तान और क़तर दोनों देशों को फिर मेज़ पर लाने की कोशिश में जुटे हैं।

ट्रम्प का रुख विरोधाभासी है। एयर फ़ोर्स वन पर पत्रकारों से उन्होंने कहा कि ईरान समझौता करना चाहता है, पर उन्हें तेहरान पर भरोसा नहीं। एक तरफ़ बातचीत की गुंजाइश जताई जा रही है, दूसरी तरफ़ मिसाइलें दागी जा रही हैं।

ईरान का रुख आक्रामक बना हुआ है। ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के प्रवक्ता ने "कड़े जवाब" की चेतावनी दी है, जबकि विदेश मंत्री अब्बास अराघची दोहरा चुके हैं कि पुराने समझौतों का सम्मान किए बिना नई बातचीत का सवाल ही नहीं।

नाटो सम्मेलन में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने दोनों पक्षों से संयम की अपील की और चेताया कि जंग फिर भड़की तो उसकी आर्थिक क़ीमत पूरी दुनिया चुकाएगी।

आख़िरी सवाल

सवाल यह नहीं है कि इस जंग में कौन सही है और कौन ग़लत। सवाल यह है कि जब दो देशों की लड़ाई में तीसरे देशों के मासूम नाविक, आम नागरिक और अर्थव्यवस्थाएँ बलि चढ़ती हैं, तो उस आग को रोकने की ज़िम्मेदारी आख़िर किसकी है?

अगला हमला कौन करेगा? क्या कूटनीति के लिए अब भी जगह बची है? या दुनिया एक और लंबे युद्ध की ओर बढ़ रही है?

उम्मीद यही है कि हथियारों की आवाज़ से पहले बातचीत की आवाज़ सुनी जाएगी। क्योंकि अगर पश्चिम एशिया की यह आग और भड़की, तो उसकी तपिश सिर्फ़ ईरान या अमेरिका तक नहीं, पूरी दुनिया तक पहुँचेगी।