नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने CJP प्रदर्शनों के दौरान दिल्ली मेट्रो के 17 स्टेशनों को बंद किए जाने को चुनौती देने वाली याचिका पर गुरुवार को केंद्र सरकार समेत अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया। याचिका में सार्वजनिक सुविधा बंद करने और आम लोगों की आवाजाही प्रतिबंधित करने के फैसले की वैधता और अनुपातिकता पर सवाल उठाए गए हैं। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। पीठ ने केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस, दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (DMRC) और दिल्ली सरकार से मामले में जवाब मांगा है।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि मेट्रो स्टेशनों को बंद करने का मामला संविधान के तहत आम लोगों के अधिकारों पर प्रतिबंध और कार्यपालिका की शक्तियों के इस्तेमाल से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करता है। याचिका में कहा गया कि केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने का हवाला देकर सार्वजनिक परिवहन सेवा को बंद करने का फैसला उचित नहीं ठहराया जा सकता, खासकर तब जब ऐसी कार्रवाई के लिए कोई स्पष्ट वैधानिक प्रावधान मौजूद न हो।
Delhi: On the Supreme Court's notice to the Centre regarding the closure of metro stations during the Jantar Mantar protest, advocate Sanjiv Narang says, "Fundamentally, the issue was that the metro was shut down. Seventeen metro stations were shut down during the agitation,… pic.twitter.com/BmnIutmLnU
— IANS (@ians_india) September 10, 2026
मेट्रो बंद करने के लिए SOP पर भी सवाल
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि प्रदर्शनों के दौरान मेट्रो स्टेशनों को बंद करने के लिए कोई स्पष्ट मानक संचालन प्रक्रिया यानी SOP मौजूद नहीं है। यह भी दलील दी गई कि स्टेशनों को बंद करने का फैसला किसी औपचारिक आदेश के जरिए सार्वजनिक नहीं किया गया, बल्कि X पर सेवा संबंधी पोस्ट के माध्यम से इसकी जानकारी दी गई। इससे फैसले के कानूनी आधार को लेकर भी सवाल उठे हैं।
जस्टिस बागची ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में अदालतें आमतौर पर कार्यपालिका के फैसलों में हस्तक्षेप करने से बचती हैं। हालांकि, जब कार्यपालिका अपने विवेक का इस्तेमाल अनुपातहीन तरीके से करती है, तब न्यायिक हस्तक्षेप की गुंजाइश बन सकती है। SOP की मांग पर टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में SOP की अवधारणा “वास्तव में एक मृगतृष्णा” जैसी है।
20 और 22 जुलाई को बंद किए गए थे स्टेशन
याचिका के अनुसार, DMRC ने 20 और 22 जुलाई को CJP प्रदर्शन के दौरान कई मेट्रो स्टेशनों को बंद किया था। DMRC ने इन बंदियों के पीछे सुरक्षा कारणों का हवाला दिया था और X पर सेवा संबंधी अपडेट के माध्यम से यात्रियों को इसकी जानकारी दी थी। याचिका में यह भी दावा किया गया कि मेट्रो अधिनियम में किसी मेट्रो स्टेशन को इस तरह बंद करने की स्पष्ट अनुमति देने वाला प्रावधान नहीं है। साथ ही, भूमिगत रेलवे से जुड़े विषयों के संघ सूची में आने का भी उल्लेख किया गया।
अब सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस, DMRC और दिल्ली सरकार को इस मामले में अपना पक्ष रखना होगा। मामले की आगे की सुनवाई में अदालत यह देख सकती है कि सार्वजनिक परिवहन सेवा को बंद करने के लिए कार्यपालिका के पास किस तरह का वैधानिक आधार और प्रक्रिया होनी चाहिए।
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