नई दिल्ली: दिल्ली-NCR में हाल के दिनों में सामने आई यौन अपराधों की घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका दर्ज करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने विशेष रूप से एक नाबालिग से चलती स्लीपर बस में कथित सामूहिक दुष्कर्म और दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के आस्था कुंज पार्क में 17 वर्षीय लड़की से कथित गैंगरेप की घटना का उल्लेख किया।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि इन घटनाओं से 2012 के निर्भया मामले की दर्दनाक समानताएं याद आती हैं। कोर्ट ने इस पर भी सवाल उठाया कि पिछले वर्षों में कानून लागू करने वाली व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा के स्तर पर वास्तविक सुधार कितना हुआ है।

नाबालिग से चलती बस में कथित यौन अपराध का मामला भी शामिल

सुप्रीम कोर्ट के स्वतः संज्ञान में दिल्ली-NCR में सामने आए कई हालिया मामलों को शामिल किया गया है। इनमें अगस्त में ग्रेटर नोएडा से जुड़ा वह मामला भी है, जिसमें 16 वर्षीय लड़की के साथ चलती बस में कथित सामूहिक दुष्कर्म का आरोप लगा था।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी सितंबर की शुरुआत में इस मामले पर स्वतः संज्ञान लिया था। आयोग के अनुसार, लड़की ने 4 अगस्त को ग्रेटर नोएडा से एक बस ली थी और बाद में उसके साथ बस चालक तथा परिचालक द्वारा कथित यौन अपराध की शिकायत सामने आई। NHRC ने दिल्ली, गौतम बुद्ध नगर और मैनपुरी के संबंधित पुलिस अधिकारियों से जांच की स्थिति और पीड़िता को दी गई सहायता सहित विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी।

इस घटना के बाद NCR में चलने वाली स्लीपर बसों में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे। कुछ बसों में निगरानी और सुरक्षा उपायों की स्थिति की जांच की गई थी।

कालकाजी के आस्था कुंज पार्क की घटना का भी जिक्र

सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के आस्था कुंज पार्क में 17 वर्षीय लड़की के साथ हुई कथित गैंगरेप की घटना भी शामिल है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, 21 सितंबर की शाम लड़की अपने एक पुरुष मित्र के साथ कालकाजी मंदिर गई थी। आरोप है कि तीन लोगों ने खुद को पुलिसकर्मी बताकर दोनों को रोका और बाद में लड़की को उसके दोस्त से अलग कर दिया।

इस मामले में पुलिस ने जांच शुरू की और आरोपियों की पहचान तथा गिरफ्तारी की कार्रवाई की। चूंकि मामला जांच के अधीन है, आरोपों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया के जरिए होगी।

इस घटना के बाद आसपास के शैक्षणिक संस्थानों और छात्रों में भी सुरक्षा को लेकर चिंता सामने आई।

‘सार्वजनिक स्थान High-Risk Zone नहीं बन सकते’

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा को लेकर व्यापक टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि पार्क, बस और अन्य सार्वजनिक स्थानों को खराब रोशनी, निगरानी की कमी या प्रशासनिक लापरवाही जैसी वजहों से लोगों के लिए जोखिम वाला क्षेत्र नहीं बनने दिया जा सकता।

कोर्ट के मुताबिक, महिलाओं और बच्चों सहित आम नागरिकों को सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षित माहौल उपलब्ध कराना प्रशासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। इसके लिए केवल घटना के बाद प्रतिक्रिया देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

सुरक्षा व्यवस्था में स्ट्रीट लाइट, CCTV निगरानी, पुलिस गश्त, आपातकालीन सहायता और संवेदनशील इलाकों की नियमित निगरानी जैसे पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी बताया गया है।

सिर्फ चिंता जताना पर्याप्त नहीं: जवाबदेही पर जोर

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसी घटनाओं के बाद सरकारी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की ओर से चिंता जताना स्वाभाविक है, लेकिन केवल एकजुटता व्यक्त करने से समस्या का समाधान नहीं होगा। कोर्ट ने जवाबदेही तय करने और ठोस कदम उठाने की जरूरत पर जोर दिया।

पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा केवल पुलिस की जिम्मेदारी तक सीमित विषय नहीं है। सार्वजनिक परिवहन, पार्क, सड़क, फुटब्रिज, अंडरपास और दूसरे सार्वजनिक स्थानों की योजना तथा रखरखाव भी सुरक्षा से जुड़े हैं।

कोर्ट की टिप्पणी का व्यापक संदर्भ यह था कि ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए व्यवस्था में मौजूद कमियों की पहचान कर उन्हें दूर करना जरूरी है।

अनुच्छेद 21 और सुरक्षित जीवन का अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षित वातावरण में सम्मान के साथ जीवन जीने के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से जोड़ते हुए सार्वजनिक सुरक्षा के सवाल को गंभीर संवैधानिक मुद्दे के रूप में देखा।

पीठ ने संकेत दिया कि यदि सार्वजनिक स्थानों पर बुनियादी सुरक्षा उपायों की कमी के कारण नागरिकों को लगातार जोखिम का सामना करना पड़ता है, तो प्रशासनिक व्यवस्था की जिम्मेदारी और जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

कोर्ट ने कहा कि अपराध की रोकथाम और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी समीक्षा होनी चाहिए।

अब आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को इस मुद्दे पर स्वतः संज्ञान वाली जनहित याचिका दर्ज करने और मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया है। आगे की सुनवाई में कोर्ट संबंधित अधिकारियों से सुरक्षा व्यवस्था, हालिया घटनाओं की जांच और सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा उपायों से जुड़ी जानकारी मांग सकता है।

इस मामले में अदालत का फोकस केवल किसी एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि दिल्ली-NCR में महिलाओं और बच्चों की सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े व्यापक प्रशासनिक सवालों पर है।

सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा कार्रवाई का उद्देश्य यह देखना भी है कि ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए कानून लागू करने वाली एजेंसियों और प्रशासनिक तंत्र में क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं और उनकी जवाबदेही किस तरह तय की जा सकती है।