नई दिल्ली: कांग्रेस नेता राहुल गांधी इन दिनों युवाओं और छात्रों के बीच संवाद बढ़ाने के लिए ‘छात्रों की गूंज’ जैसे कार्यक्रम कर रहे हैं। लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ यानी DUSU Election 2026 के नतीजों ने कांग्रेस की छात्र राजनीति के सामने एक अलग तस्वीर रख दी है। दिल्ली विश्वविद्यालय के चार प्रमुख पदों में से तीन पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने जीत दर्ज की, जबकि उपाध्यक्ष पद निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन के खाते में गया। कांग्रेस की छात्र इकाई NSUI चारों केंद्रीय पदों में से एक भी सीट नहीं जीत सकी।

यह नतीजा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि DUSU को लंबे समय से छात्र राजनीति का महत्वपूर्ण मंच माना जाता रहा है। यहां से निकले कई छात्र नेता आगे चलकर राष्ट्रीय और राज्य स्तर की राजनीति में पहुंचे हैं। ऐसे में DUSU के नतीजों को केवल एक विश्वविद्यालय के छात्र चुनाव तक सीमित करके देखना आसान नहीं है।

राहुल गांधी का छात्र संवाद और DUSU का अलग संदेश

राहुल गांधी का ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम युवाओं के साथ सीधे संवाद पर केंद्रित है। इन कार्यक्रमों में शिक्षा, रोजगार और व्यवस्था से जुड़े सवालों पर छात्रों से बातचीत की जा रही है। लेकिन DUSU चुनाव का परिणाम यह बताता है कि युवाओं के बीच राजनीतिक पसंद को किसी एक कार्यक्रम या मुद्दे से समझना आसान नहीं है।

DUSU चुनाव में ABVP के यश डबास ने अध्यक्ष पद पर NSUI के विजय शंकर मीणा को हराया। डबास को 24,576 वोट मिले, जबकि मीणा को 22,523 वोट मिले। सचिव पद पर रिया छावड़ी और संयुक्त सचिव पद पर लक्ष्य राज सिंह ने ABVP के लिए जीत दर्ज की।

वहीं उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय दीपांशु शौकीन ने 30,615 वोट हासिल किए। शौकीन पहले NSUI से जुड़े रहे थे और टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़े। उनकी जीत ने चुनाव को एक अलग राजनीतिक संदेश दिया।

NSUI के लिए सबसे बड़ा सवाल: संगठन और टिकट बंटवारा

NSUI के लिए सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि पिछली बार उपाध्यक्ष पद जीतने के बावजूद इस बार संगठन केंद्रीय पैनल की चारों सीटों में से कोई नहीं जीत पाया। हालांकि अध्यक्ष पद पर विजय शंकर मीणा ने 22,523 वोट हासिल किए और मुकाबला काफी करीबी रहा।

उपाध्यक्ष चुनाव का परिणाम कांग्रेस के लिए इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि दीपांशु शौकीन ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत दर्ज की। रिपोर्टों के अनुसार, उन्हें NSUI से टिकट नहीं मिला था। इसके बाद उन्होंने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा और ABVP उम्मीदवार ईशू मौर्य तथा NSUI उम्मीदवार वीर चतरथ को पीछे छोड़ा।

इस नतीजे से कांग्रेस के सामने यह सवाल उठता है कि छात्र राजनीति में उम्मीदवार चयन, स्थानीय संगठन और छात्रों के साथ प्रत्यक्ष संपर्क को किस तरह मजबूत किया जाए।

छात्र मुद्दों ने भी निभाई भूमिका

DUSU चुनाव में केवल राष्ट्रीय राजनीति या पार्टी की विचारधारा ही मुद्दा नहीं थी। चुनाव के दौरान हॉस्टल, PG की सुरक्षा, कैंपस सिक्योरिटी और छात्रों की सुविधाएं भी प्रमुख मुद्दों में शामिल रहे। इस साल मतदान प्रतिशत 40.46% रहा, जो पिछले वर्षों की तुलना में अधिक था।

दीपांशु शौकीन का अभियान भी स्थानीय छात्र मुद्दों से जुड़ा रहा। सत्य निकेतन में PG इमारत गिरने की घटना के बाद छात्रों के लिए सुरक्षित हॉस्टल और PG व्यवस्था का मुद्दा चर्चा में आया था। चुनाव के बाद भी शौकीन ने हॉस्टल और PG के सुरक्षा ऑडिट की मांग उठाई।

इससे यह संकेत मिलता है कि छात्र चुनावों में स्थानीय और सीधे प्रभावित करने वाले मुद्दे भी उम्मीदवारों के समर्थन को प्रभावित कर सकते हैं।

क्या DUSU का परिणाम Gen-Z की पूरी तस्वीर है?

DUSU के नतीजे को पूरी Gen-Z आबादी की राजनीतिक पसंद का सीधा प्रतिनिधि मानना सावधानी मांगता है। दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र एक विशिष्ट मतदाता समूह हैं और उनका चुनावी व्यवहार देश के सभी युवाओं पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता।

इसी तरह, ABVP की तीन सीटों की जीत को केवल किसी एक राष्ट्रीय नेता या पार्टी के समर्थन का परिणाम मानना भी पर्याप्त नहीं होगा। चुनाव में उम्मीदवारों की व्यक्तिगत छवि, स्थानीय संगठन, कैंपस के मुद्दे, प्रचार अभियान और छात्र समूहों की सक्रियता जैसे कई कारक भूमिका निभा सकते हैं।

कांग्रेस के सामने संगठन मजबूत करने की चुनौती

DUSU परिणाम कांग्रेस के लिए छात्र संगठन के स्तर पर समीक्षा का अवसर जरूर पैदा करता है। खासकर तब, जब NSUI केंद्रीय पैनल की कोई सीट नहीं जीत सकी और एक पूर्व NSUI सदस्य ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उपाध्यक्ष पद हासिल किया।

दूसरी तरफ ABVP ने अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव पदों पर जीत हासिल कर लगातार दूसरे साल चार में से तीन केंद्रीय पद अपने पास रखे।

हालांकि इस परिणाम से यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा कि दिल्ली या देश के सभी युवा किसी एक राजनीतिक दिशा में जा रहे हैं। DUSU चुनाव का महत्व छात्र राजनीति और संगठनात्मक क्षमता के संदर्भ में जरूर है, लेकिन राष्ट्रीय चुनावों में युवाओं के व्यवहार को समझने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों और मुद्दों का व्यापक अध्ययन जरूरी होगा।