नई दिल्ली: दिल्ली के 31 वर्षीय रियल एस्टेट प्रोफेशनल युवराज सिंह मनचंदा की हत्या का मामला अब सिर्फ एक क्राइम स्टोरी नहीं रह गया, बल्कि पुलिस की कार्यप्रणाली, प्रोसेस में हुई चूक और न्यायिक निगरानी तक फैल चुका है। अगले महीने शादी करने वाले युवराज 6 सितंबर को लापता हुए, 10 सितंबर को उनका शव गुरुग्राम में मिला, लेकिन पहचान होने से पहले ही 14 सितंबर को उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया। परिवार को इसकी जानकारी दो दिन बाद, 16 सितंबर को दी गई, जब आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी थी।
परिवार और दोस्तों के मुताबिक, युवराज 6 सितंबर को अपनी बहनों के साथ लाजपत नगर मार्केट में शादी की शेरवानी की आखिरी शॉपिंग करने पहुंचे थे। शाम करीब 4 बजे गोल्डन ड्रैगन रेस्तरां में परिवार के साथ बैठे युवराज को इसी दौरान एक फोन कॉल आया। उन्होंने अपनी बहनों और फिओंसे को बताया कि उन्हें गुरुग्राम में अपनी पुरानी सहकर्मी आन्या वत्स के साथ एक क्लाइंट मीटिंग के लिए जाना है, और वो रात करीब 10 बजे तक लौट आएंगे। इसके बाद वो अपनी कार से गुरुग्राम के लिए रवाना हुए, और यही परिवार से उनकी आखिरी मुलाकात साबित हुई।
शाम साढ़े सात बजे परिवार से आखिरी बार बात हुई, जब युवराज ने बताया कि आन्या 20 मिनट में पहुंचने वाली हैं। इसके बाद उनका फोन ज़्यादातर समय बंद रहा। पुलिस के मुताबिक इसी शाम गुरुग्राम पहुंचने के बाद युवराज की मुलाकात आन्या वत्स और उनके साथी संयम सचदेवा से हुई, जहां कार के भीतर उन्हें गोली मारकर हत्या कर दी गई।

गुमराह करने वाले मैसेज और गुमशुदगी की शिकायत
परिवार को हत्या के बाद भी युवराज के फोन से लगातार मैसेज मिलते रहे, कि वो ठीक हैं, किसी बड़ी बिजनेस डील में व्यस्त हैं, उन्हें ‘पीस’ चाहिए और वो जल्द लौटेंगे। कुछ मैसेज में बेंगलुरु या मुंबई जाने की बात भी कही गई, और युवराज के फोन से नोएडा से बेंगलुरु की एक फ्लाइट टिकट भी बुक कराई गई। परिवार के मुताबिक, आखिरी मैसेज 9 सितंबर की सुबह सवा चार बजे आया, जिसमें कहा गया कि वो शनिवार तक लौट आएंगे। पुलिस को शक है कि हत्या के बाद आरोपियों ने ही युवराज के फोन का इस्तेमाल परिवार को गुमराह करने और समय हासिल करने के लिए किया।
जब कोई ठोस जानकारी नहीं मिली, तो परिवार पहले सरिता विहार थाने पहुंचा, लेकिन चूंकि युवराज आखिरी बार लाजपत नगर में देखे गए थे, इसलिए उन्हें लाजपत नगर थाने भेजा गया। 11 सितंबर की शाम करीब सवा चार बजे परिवार ने वहां गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराई।
पुलिस जांच और गिरफ्तारी: DCP का बयान
दक्षिण-पूर्वी दिल्ली की डीसीपी विनीत कुमार के मुताबिक, तकनीकी विश्लेषण के जरिए पुलिस युवराज की पूर्व सहकर्मी आन्या वत्स तक पहुंची, जिनका फोन भी 8 सितंबर से बंद पड़ा था। जांच में पुलिस टीम आन्या और उनके साथी संयम सचदेवा को उत्तराखंड के कैंचीधाम इलाके से ट्रेस करने में कामयाब रही। पूछताछ में दोनों ने युवराज से मुलाकात और उनकी हत्या करने की बात कबूल की, और बताया कि शव को गुरुग्राम के बादशाहपुर इलाके (सेक्टर 70) में ठिकाने लगाया गया।
पुलिस के मुताबिक आरोपियों के पास से युवराज की कार, मोबाइल फोन और एक पिस्टल भी बरामद हुई। बाद में आरोपियों को गुरुग्राम ले जाकर पूरी वारदात का पुनर्निर्माण भी कराया गया, वो जगह जहां गोली मारी गई, वो रास्ता जिससे शव ले जाया गया, और वो नाला जहां उसे फेंका गया। 18 सितंबर को दिल्ली पुलिस ने दोनों आरोपियों की पांच दिन की पुलिस रिमांड भी हासिल कर ली।
Delhi | On 11.09.2026 at about 04:15 PM, a missing person complaint regarding Yuvraj Singh Manchanda (31), resident of Sarita Vihar, New Delhi, was lodged by his sister at PS Lajpat Nagar, and an FIR was registered. On 06.09.2026, while shopping with the complainant, Yuvraj left…
— ANI (@ANI) September 17, 2026
अज्ञात शव, जल्दबाजी में क्रिमेशन और ZIPNET पर सवाल
इस केस का सबसे विवादित पहलू यह है कि जिस वक्त परिवार दिल्ली में युवराज को तलाश रहा था, ठीक उसी दौरान 10 सितंबर को गुरुग्राम के बादशाहपुर थाना क्षेत्र में एक नाले से एक अज्ञात, गंभीर रूप से सड़ा हुआ शव बरामद हो चुका था। उस वक्त इसकी पहचान नहीं हो पाई थी। नियमों के मुताबिक किसी भी अज्ञात शव की जानकारी 24 घंटे के भीतर ज़ोनल इंटीग्रेटेड पुलिस नेटवर्क यानी ZIPNET पोर्टल पर अपलोड करना अनिवार्य है, ताकि लापता व्यक्तियों के परिवार उसे देख सकें।
परिवार के करीबी और पारिवारिक मित्र रजत जैन के मुताबिक, वो 9 सितंबर से ही रोज़ाना ज़िपनेट पोर्टल नियमित रूप से चेक कर रहे थे, लेकिन गुरुग्राम पुलिस की तरफ से कोई जानकारी अपलोड नहीं की गई। बिना किसी को सूचित किए और बिना ठीक से जांच किए, शव को 14 सितंबर को अंतिम संस्कार कर दिया गया। रजत जैन का आरोप है कि 16 सितंबर को जब लाजपत नगर पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार किया और उन्होंने बादशाहपुर में शव ठिकाने लगाने की बात कबूली, तभी लाजपत नगर पुलिस ने बादशाहपुर थाने से संपर्क किया, और तब जाकर पता चला कि वहां पहले से एक अज्ञात सिख व्यक्ति (उम्र 30-40 वर्ष) का शव मिल चुका था। उनका यह भी दावा है कि जिपनेट पर जानकारी शव मिलने के 6 दिन बाद और अंतिम संस्कार के 2 दिन बाद, 16 सितंबर को ही अपलोड की गई, वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि परिवार ने पुलिस से सवाल-जवाब किए।
एक मीडिया रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि गुरुग्राम पुलिस ने ज़िपनेट एंट्री में शव को गलत श्रेणी में दर्ज किया था। वहीं गुरुग्राम पुलिस का पक्ष इससे अलग है, पुलिस का कहना है कि अज्ञात शव की जानकारी CCTNS और दूसरे सरकारी नेटवर्क पर दर्ज की गई थी, फेशियल रिकॉग्निशन सिस्टम का इस्तेमाल किया गया, और उनके मुताबिक ज़िपनेट पर अलग से जानकारी डालना अनिवार्य नहीं था। यानी परिवार के आरोप और पुलिस के जवाब में साफ विरोधाभास है, और यह किस हद तक सही है, यह रिकॉर्ड की पूरी पड़ताल के बाद ही स्पष्ट होगा।
परिवार का पुलिस के व्यवहार पर आरोप
युवराज की बहन ने बताया कि जब वे बादशाहपुर थाने अपने भाई का सामान लेने पहुंचे, तो पुलिस का रवैया बेहद रूखा और लापरवाह रहा। परिवार का आरोप है कि उन्हें ना पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट दी गई, ना कपड़े, ना घड़ी, ना अंगूठी जैसी अन्य निजी वस्तुएं वापस मिलीं, पुलिस का कहना था कि ये चीज़ें मेडिकल हॉस्पिटल के पास हैं, जबकि हॉस्पिटल का कहना था कि जांच अधिकारी पहले ही यह सामान ले जा चुके हैं।
परिवार का यह भी आरोप है कि शुरुआत में उन्हें बताया गया कि यह ‘ड्राउनिंग’ यानी डूबने का मामला है, जबकि परिवार का तर्क था कि जिस इलाके में शव मिला वहां इतना गहरा पानी था ही नहीं कि एक लंबे-चौड़े कद का व्यक्ति डूब सके। इस मामले में लापरवाही के आरोप में एक ASI को पहले ही सस्पेंड किया जा चुका है।
अब मामला हाईकोर्ट/साकेत कोर्ट की निगरानी में
परिवार के वकील एडवोकेट नेहारिका कुशवाह के मुताबिक, शव की बरामदगी से लेकर पहचान और पोस्टमार्टम तक पूरी प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल हैं, जिनके बारे में परिवार को स्पेकुलेट करने की बजाय रिकॉर्ड्स से ही जवाब मिलना चाहिए। इसी आधार पर परिवार ने अदालत का रुख किया।
नवीनतम अपडेट (20 सितंबर): युवराज की बहन हरसिमरन मनचंदा, जो इस केस में शिकायतकर्ता भी हैं, ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 94 के तहत दिल्ली की साकेत कोर्ट में अर्जी दाखिल की। इस पर साकेत कोर्ट ने गुरुग्राम पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया कि शव की बरामदगी, पहचान और अंतिम संस्कार से जुड़े सभी रिकॉर्ड सुरक्षित रखकर अदालत में पेश किए जाएं। कोर्ट के आदेश के मुताबिक, इसमें शामिल हैं:
- पुलिस डायरी और थाना रिकॉर्ड
- रिकवरी व इन्क्वेस्ट रिकॉर्ड
- पोस्टमार्टम व फोरेंसिक रिपोर्ट
- DNA सैंपल व सुरक्षित बायोलॉजिकल सामग्री
- फोटोग्राफ्स और वीडियो
- CCTV फुटेज व कॉल डेटा रिकॉर्ड सहित डिजिटल सबूत
- ज़िपनेट से जुड़े पूरे रिकॉर्ड
- क्रिमेशन दस्तावेज़ और शव के साथ मिले सामान की जानकारी
#WATCH | Delhi: On the Yuvraj Singh Manchanda murder case, Advocate Niharika Kushwaha, representing the family and sister of Yuvraj Singh Manchanda, says, "There were serious concerns regarding the investigation, particularly the recovery and identification of his body and the… pic.twitter.com/AKlwyEhjBM
— ANI (@ANI) September 20, 2026
यह सभी दस्तावेज़ 22 सितंबर दोपहर साढ़े बारह बजे तक अदालत में पेश किए जाने हैं। एडवोकेट कुशवाह का कहना है कि उन्हें उम्मीद है कि अदालत की निगरानी में जांच के चलते दोषियों को इंसाफ के कटघरे में लाया जाएगा।

हत्या के पीछे की वजह: सामने आया फाइनेंशियल एंगल
अब जब हत्या का खुलासा हो चुका है, पुलिस और परिवार दोनों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि आखिर युवराज को निशाना क्यों बनाया गया। युवराज और आन्या वत्स पहले एक ही रियल एस्टेट कंपनी में साथ काम कर चुके थे। परिवार के मुताबिक, आन्या को कथित वित्तीय अनियमितताओं और फ्रॉड के एक मामले के चलते सितंबर 2022 में उस कंपनी से निकाला गया था, हालांकि तब तक युवराज खुद कंपनी छोड़कर गोदरेज होते हुए अडानी रियलिटी जॉइन कर चुके थे, जहां वो टीम लीडर/प्रोजेक्ट मैनेजर के पद पर कार्यरत थे। परिवार ने साफ किया कि युवराज को कभी नौकरी से नहीं निकाला गया, बल्कि उन्हें हमेशा अच्छी परफॉर्मेंस के आधार पर सम्मानजनक विदाई और बड़ी कंपनियों में मौके मिले।

पारिवारिक मित्र रजत जैन के मुताबिक, 2022 में जब आन्या और युवराज एक साथ काम करते थे, तब आन्या ने युवराज से पैसे उधार लिए थे और समय पर लौटाने में आनाकानी की थी, बाद में एक पोस्ट-डेटेड चेक के जरिए वह रकम वापस हुई, जिसके बाद दोनों के बीच कोई संपर्क नहीं रहा। 6 सितंबर को जिस मीटिंग के लिए युवराज गुरुग्राम गए, उसे लेकर परिवार को सिर्फ इतना पता था कि यह कोई बड़ी बिजनेस डील है, जो अदानी कंपनी से जुड़ी नहीं थी।
जांच एजेंसियां अब इस एंगल पर काम कर रही हैं कि क्या युवराज को आरोपियों की किसी वित्तीय गतिविधि की जानकारी लग गई थी, जिसकी वजह से उनकी हत्या हुई। सामने आए दो बड़े मामले इस प्रकार हैं:
- धोखाधड़ी का मामला: एक वरिष्ठ NBFC अधिकारी का आरोप है कि आन्या वत्स और संयम सचदेवा ने फर्जी ईडी (ED) और गृह मंत्रालय के नोटिस दिखाकर उन्हें डराया-धमकाया, यह दावा करते हुए कि उनकी सरकारी स्तर पर बड़ी पहुंच है और वे मामला रफा-दफा करा सकते हैं। इसी भरोसे पर उनसे सवा करोड़ रुपये (₹1.2 करोड़) से अधिक की रकम वसूली गई।
- संपत्ति विवाद: संयम सचदेवा, उनकी अलग रह रही पत्नी और आन्या वत्स के बीच लगभग चार करोड़ रुपये (₹4 करोड़) की एक संपत्ति को लेकर विवाद भी अब जांच के दायरे में है।
पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, इन दोनों मामलों को फिलहाल आरोपियों की आर्थिक पृष्ठभूमि समझने के लिए खंगाला जा रहा है, लेकिन अब तक इन्हें युवराज की हत्या से जोड़ने वाला कोई सीधा और पुख्ता सबूत सामने नहीं आया है। यानी इन्हें हत्या की पुष्ट वजह मान लेना फिलहाल जल्दबाज़ी होगी — जांच अभी जारी है।
परिवार की अपील
युवराज की बहन ने मीडिया से अपील करते हुए कहा कि बिना सत्यापन के कोई भी अनवेरिफाइड जानकारी या उनके भाई के चरित्र पर सवाल उठाने वाली खबरें ना छापी जाएं। परिवार का कहना है कि युवराज बेहद जिम्मेदार, कानून का पालन करने वाला और परिवार के प्रति संवेदनशील इंसान थे, जिन्होंने बहुत छोटी उम्र से ही बीमार माता-पिता और परिवार की जिम्मेदारी संभाल रखी थी।
अब आगे क्या
केस अब एक साथ कई दिशाओं में आगे बढ़ रहा है, दो आरोपी पुलिस हिरासत में हैं, करोड़ों रुपये के फाइनेंशियल मामलों की जांच जारी है, युवराज के फोन से भेजे गए कथित गुमराह करने वाले मैसेज की पड़ताल हो रही है, और गुरुग्राम में मिले अज्ञात शव की पहचान व अंतिम संस्कार से जुड़ी पूरी प्रक्रिया अब अदालत की सीधी निगरानी में है। 22 सितंबर को अदालत में पेश होने वाले दस्तावेज़ यह तय करेंगे कि प्रक्रिया में चूक हुई या जानबूझकर लापरवाही बरती गई, और आने वाले दिनों में इस केस की कई अहम परतें और खुल सकती हैं।
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