पंजाब कांग्रेस में लंबे समय से चल रही अंदरूनी खींचतान के बीच परगट सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के बाद पार्टी में फिलहाल सियासी माहौल कुछ शांत नजर आ रहा है। कांग्रेस हाईकमान ने दो अक्टूबर को परगट सिंह को यह जिम्मेदारी दी। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उनका नेतृत्व पार्टी के अलग-अलग गुटों को एक मंच पर ला पाएगा या 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पुरानी गुटबाजी फिर उभर सकती है?
परगट सिंह को ऐसे समय में प्रदेश कांग्रेस की कमान मिली है, जब पार्टी के भीतर पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के समर्थकों के बीच मतभेद चर्चा में रहे हैं। दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक दूरी ने संगठन के सामने एकजुटता की चुनौती खड़ी कर दी थी।
दोनों गुटों के लिए स्वीकार्य चेहरा
परगट सिंह की नियुक्ति को कांग्रेस के भीतर एक संतुलित फैसले के तौर पर देखा जा रहा है। वह चन्नी सरकार में मंत्री रह चुके हैं, लेकिन वड़िंग और चन्नी के बीच चली राजनीतिक खींचतान में उनकी भूमिका अपेक्षाकृत अलग रही।
प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के बाद चन्नी ने दिल्ली में परगट सिंह से मुलाकात की। वहीं, परगट सिंह के मुताबिक उनकी राजा वड़िंग से भी मुलाकात हो चुकी है। वड़िंग ने भी नए प्रदेश अध्यक्ष को बधाई और शुभकामनाएं दी हैं।
इन मुलाकातों को फिलहाल कांग्रेस के भीतर सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी नेतृत्व चाहता है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संगठन के नेता व्यक्तिगत मतभेदों से ऊपर उठकर चुनावी तैयारी पर ध्यान दें।
2027 चुनाव पर फोकस
परगट सिंह ने स्पष्ट किया है कि उनका मुख्य लक्ष्य पंजाब में कांग्रेस संगठन को मजबूत करना और 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी को तैयार करना है। वह जल्द ही औपचारिक रूप से प्रदेश अध्यक्ष का कार्यभार संभालने वाले हैं।
उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन के अलग-अलग नेताओं और गुटों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना होगी। पार्टी लंबे समय से सत्ता से बाहर है और आगामी चुनाव में वापसी के लिए उसे मजबूत संगठन की जरूरत होगी।
परगट सिंह ने यह भी संकेत दिया है कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की भूमिका बनी रहेगी। उनका कहना है कि विचारों में मतभेद होना सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया है और हर असहमति को गुटबाजी के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
चन्नी-रंधावा खेमे की नाराजगी के बाद बदलाव
परगट सिंह की नियुक्ति से पहले पंजाब कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष के नेतृत्व को लेकर असंतोष सामने आया था। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और गुरदासपुर के सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा समेत कई नेताओं ने वड़िंग की कार्यशैली पर सवाल उठाए थे और नेतृत्व परिवर्तन की मांग की थी।
इसके बाद कांग्रेस ने पंजाब के संगठनात्मक मामलों में भी बदलाव किए। पार्टी ने सचिन पायलट को पंजाब का प्रभारी बनाया। पायलट ने प्रदेश कांग्रेस के नेताओं से मुलाकात कर उनकी राय और संगठन की स्थिति को समझने की कोशिश की।
इसी राजनीतिक प्रक्रिया के बीच वड़िंग ने राहुल गांधी से मुलाकात के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया। उनके इस्तीफे के बाद परगट सिंह के नाम पर मुहर लगी।
कांग्रेस के भीतर इसे किसी एक गुट की जीत के बजाय समझौते और संतुलन की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। अगर हाईकमान किसी एक प्रमुख गुट के नेता को अध्यक्ष बनाता, तो दूसरे खेमे में असंतोष बढ़ने की आशंका थी।
परगट सिंह को ही क्यों चुना गया?
परगट सिंह की राजनीतिक पहचान और व्यक्तिगत छवि भी उनकी नियुक्ति के पीछे अहम कारण मानी जा रही है। वह भारतीय हॉकी टीम के पूर्व कप्तान रह चुके हैं और जालंधर कैंट से कई बार विधायक रहे हैं।
राजनीति में आने के बाद उन्होंने पंजाब सरकार में शिक्षा और खेल मंत्री की जिम्मेदारी भी संभाली। उनकी छवि अपेक्षाकृत साफ-सुथरे और कम विवादित नेता की रही है।
इसके अलावा उनका दोआबा क्षेत्र से आना और जाट सिख समुदाय से होना भी कांग्रेस के सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी ने ऐसा चेहरा चुना है जो संगठन के भीतर किसी एक गुट से पूरी तरह जुड़ा हुआ दिखाई न दे।
प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ में पूर्व मंत्री विजय इंदर सिंगला का नाम भी चर्चा में था। हालांकि अंतिम दौर में कांग्रेस नेतृत्व ने परगट सिंह को प्राथमिकता दी।
क्या यह शांति स्थायी होगी?
यही पंजाब कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल है। फिलहाल चन्नी, वड़िंग और दूसरे नेताओं की ओर से परगट सिंह के पक्ष में सकारात्मक संदेश सामने आए हैं, लेकिन इससे यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि पार्टी की अंदरूनी राजनीति पूरी तरह बदल गई है।
पंजाब कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद की महत्वाकांक्षा रखने वाले कई नेता हैं। चुनाव के करीब आने के साथ टिकट वितरण, चुनाव प्रचार की कमान, संगठन में प्रभाव और मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर फिर से मतभेद उभर सकते हैं।
2027 के चुनाव में अभी समय है। ऐसे में वर्तमान शांति को पार्टी की स्थायी एकता के बजाय एक राजनीतिक समझौते का शुरुआती चरण भी माना जा सकता है।
परगट सिंह के लिए सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि वह अलग-अलग नेताओं को साथ लेकर चल पाते हैं या नहीं। अगर वह चन्नी, वड़िंग, सुखजिंदर सिंह रंधावा और अन्य वरिष्ठ नेताओं के बीच बेहतर तालमेल बनाने में सफल होते हैं तो कांग्रेस को चुनावी फायदा मिल सकता है।
लेकिन अगर टिकट वितरण या नेतृत्व को लेकर पुरानी प्रतिस्पर्धा दोबारा सामने आती है, तो पार्टी के भीतर की खींचतान फिर सुर्खियों में आ सकती है।
फिलहाल परगट सिंह की नियुक्ति ने पंजाब कांग्रेस को एक ऐसा चेहरा जरूर दिया है जिसे अलग-अलग खेमों में स्वीकार्यता हासिल है। अब यह नेतृत्व की क्षमता और आने वाले महीनों की राजनीतिक रणनीति पर निर्भर करेगा कि यह शांति चुनाव तक कायम रहती है या फिर पंजाब कांग्रेस की पुरानी गुटबाजी दोबारा लौट आती है।
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