चंडीगढ़:  पंजाब की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले नए राजनीतिक समीकरणों की आहट तेज हो गई है। अमृतपाल सिंह से जुड़े  अकाली दल (Waris Punjab De)  ने अब अपने राजनीतिक आधार को व्यापक बनाने की दिशा में एक नया कदम उठाया है। संगठन की ओर से बहुजन राजनीति के प्रमुख नेता और बहुजन समाज पार्टी (BSP) के संस्थापक  बाबू कांशीराम  की पुण्यतिथि पर चंडीगढ़ में एक सेमिनार आयोजित करने की तैयारी है।

राजनीतिक तौर पर इस कार्यक्रम को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि संगठन अब तक मुख्य रूप से सिख पहचान, पंजाब के अधिकारों और अमृतपाल सिंह की राजनीतिक छवि के इर्द-गिर्द अपनी गतिविधियां चलाता रहा है। कांशीराम की विचारधारा को सामने लाकर संगठन सामाजिक न्याय और दलित प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को अपने राजनीतिक एजेंडे में जोड़ने की कोशिश करता दिखाई दे रहा है।

कांशीराम की विचारधारा को राजनीतिक संदेश बनाने की तैयारी

संगठन के कार्यक्रम के संयोजक गंगवीर राठौर के मुताबिक कांशीराम का सामाजिक न्याय और समानता का विचार संगठन के लिए महत्वपूर्ण है। उनका कहना है कि कांशीराम ने समाज के वंचित और पिछड़े वर्गों को राजनीतिक रूप से एकजुट करने की कोशिश की थी और इसी विचार से प्रेरणा लेकर संगठन अपने राजनीतिक दायरे को बढ़ाना चाहता है।

सेमिनार में कांशीराम की बहन स्वर्ण कौर के शामिल होने की संभावना भी बताई गई है। संगठन की ओर से कार्यक्रम के प्रचार में कांशीराम की तस्वीर और उनके विचारों से जुड़े संदेशों को प्रमुखता दी जा रही है।

राठौर का कहना है कि पंजाब में किसान और दलित समुदायों के बीच सामाजिक दूरी को कम करना जरूरी है। उनके अनुसार, संगठन ऐसी राजनीति को आगे बढ़ाना चाहता है जिसमें सामाजिक समानता और वंचित वर्गों की भागीदारी को अधिक महत्व मिले।

दलित मतदाताओं पर क्यों है नजर?

पंजाब की राजनीति में अनुसूचित जाति समुदाय का महत्वपूर्ण चुनावी प्रभाव है। राज्य में दलित आबादी करीब एक-तिहाई मानी जाती है। ऐसे में विधानसभा चुनाव से पहले कोई भी राजनीतिक संगठन इस बड़े मतदाता वर्ग को नजरअंदाज नहीं कर सकता।

पंजाब में लंबे समय से राजनीतिक दल किसान समुदाय के साथ-साथ अनुसूचित जाति मतदाताओं को साधने की रणनीति बनाते रहे हैं। ऐसे में वारिस पंजाब दे की ओर से कांशीराम और बहुजन राजनीति को अपने सार्वजनिक कार्यक्रम में जगह देना उसके सामाजिक आधार को विस्तार देने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

संगठन के भीतर भी कुछ प्रमुख दलित चेहरे मौजूद हैं। फरीदकोट से सांसद सरबजीत सिंह खालसा को संगठन के प्रमुख दलित चेहरों में गिना जाता है। इसके अलावा बसंत सिंह दौलतपुर भी संगठन से जुड़े प्रमुख नामों में हैं और निहाल सिंह वाला क्षेत्र से राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रहे हैं।

हालांकि, इन नेताओं की राजनीतिक भूमिका और संगठन का व्यापक चुनावी प्रभाव आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा।

BSP से गठजोड़ की अटकलों के बीच अहम कदम

कांशीराम की विचारधारा को लेकर संगठन की सक्रियता ऐसे समय सामने आई है जब 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले BSP और वारिस पंजाब दे के बीच संभावित राजनीतिक समझौते को लेकर चर्चा हो रही है।

हालांकि BSP प्रमुख मायावती यह कह चुकी हैं कि उनकी पार्टी पंजाब विधानसभा चुनाव अपने दम पर लड़ने की तैयारी कर रही है। ऐसे में फिलहाल किसी औपचारिक गठबंधन की पुष्टि नहीं हुई है।

इसके बावजूद कांशीराम को राजनीतिक विमर्श में प्रमुखता देना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि वारिस पंजाब दे दलित और बहुजन मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने का प्रयास कर रहा है।

यदि संगठन भविष्य में किसी व्यापक राजनीतिक मोर्चे या गठबंधन की दिशा में आगे बढ़ता है, तो सामाजिक न्याय और दलित प्रतिनिधित्व उसके राजनीतिक संदेश का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।

अमृतपाल की छवि से आगे बढ़ने की कोशिश?

राजनीतिक विश्लेषण के स्तर पर इस पहल का एक दूसरा पहलू भी है। संगठन की पहचान अब तक काफी हद तक अमृतपाल सिंह के नाम से जुड़ी रही है। अमृतपाल सिंह के जेल में होने के कारण संगठन के सामने नेतृत्व और राजनीतिक पहुंच से जुड़ी चुनौतियां भी बनी हुई हैं।

ऐसे में कांशीराम जैसे व्यापक सामाजिक आंदोलन से जुड़े नेता की विचारधारा को अपने राजनीतिक विमर्श में शामिल करना संगठन को एक अलग पहचान देने की कोशिश हो सकती है।

इस रणनीति के तहत संगठन सिर्फ धार्मिक या पहचान आधारित मुद्दों तक सीमित रहने के बजाय रोजगार, सामाजिक समानता, किसान-दलित संबंध और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है।

चुनाव से पहले राजनीतिक संपर्क बढ़ाने की तैयारी

संगठन ने 2027 चुनाव से पहले राजनीतिक दलों, किसान संगठनों और स्थानीय समूहों के साथ बातचीत के लिए एक समन्वय समिति भी गठित की है। इसका उद्देश्य विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक समूहों के साथ संवाद बढ़ाना बताया जा रहा है।

इससे संकेत मिलता है कि संगठन चुनावी राजनीति में अपनी संभावित भूमिका को लेकर व्यापक स्तर पर तैयारी कर रहा है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि वह अकेले चुनाव मैदान में उतरेगा, किसी गठबंधन का हिस्सा बनेगा या किसी बड़े राजनीतिक मोर्चे के साथ जाएगा।

पार्टी के पंजीकरण को लेकर राज्यपाल से मुलाकात

इसी राजनीतिक गतिविधि के बीच संगठन के प्रतिनिधिमंडल ने पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया से भी मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल में सांसद सरबजीत सिंह खालसा और अन्य नेता शामिल थे।

प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग के पास संगठन के पंजीकरण की प्रक्रिया में कथित देरी का मुद्दा उठाया। संगठन का आरोप है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कारणों का हवाला देकर पंजीकरण प्रक्रिया में बाधा डाली जा रही है।

संगठन के प्रतिनिधियों ने इसे अन्यायपूर्ण बताया और पंजीकरण प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की मांग की। हालांकि, इस संबंध में लगाए गए आरोप संगठन का पक्ष हैं और संबंधित चुनावी प्राधिकरण की ओर से स्थिति स्पष्ट होना बाकी है।

2027 में बदल सकता है पंजाब का राजनीतिक समीकरण

पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक दल और नए संगठन अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने में जुट गए हैं। वारिस पंजाब दे का कांशीराम की विचारधारा की ओर बढ़ना इसी व्यापक चुनावी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

एक तरफ संगठन अपनी पारंपरिक सिख और पंजाब-केंद्रित राजनीति को बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ दलित और बहुजन मतदाताओं के बीच पहुंच बनाने की कोशिश कर रहा है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि कांशीराम की विचारधारा को अपनाने का यह प्रयास जमीनी स्तर पर कितना प्रभाव पैदा करता है और क्या इससे संगठन अपने मौजूदा राजनीतिक आधार से आगे निकल पाता है।

2027 के चुनाव में पंजाब की राजनीति में मुकाबला केवल बड़े पारंपरिक दलों के बीच नहीं रहने की संभावना है। नए सामाजिक और राजनीतिक गठजोड़ भी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में वारिस पंजाब दे का यह नया प्रयोग आने वाले महीनों में राज्य की राजनीति में कितना असर डालता है, इस पर राजनीतिक पर्यवेक्षकों की नजर रहेगी।