नई दिल्ली: पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत बलूचिस्तान इन दिनों उसी के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुका है। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी यानी BLA का दावा है कि पिछले सिर्फ आठ दिनों में उसने 22 हमले किए और 26 पाकिस्तानी सुरक्षाकर्मियों को मार गिराया। इसी बीच सुराब में हुई एक घटना को लेकर पाकिस्तानी सेना और बलूच पक्ष के दावे बिल्कुल अलग-अलग हैं। पाकिस्तानी सेना इसे IED धमाके से जोड़ रही है, जबकि बलूच नेताओं का आरोप है कि यह पाकिस्तानी सेना की एयरस्ट्राइक थी, जिसमें महिलाओं और बच्चों समेत कई नागरिक मारे गए। 11 अगस्त को बलूच राष्ट्रवादियों ने अपना "स्वतंत्रता दिवस" मनाया, और तीन दिन बाद जब पाकिस्तान अपना स्वतंत्रता दिवस मना रहा था, बलूच नेताओं ने उसे "ब्लैक डे" घोषित कर दिया।

आखिर बलूचिस्तान में हो क्या रहा है, यह इलाका इतना अहम क्यों है, और अगर इसकी राजनीतिक स्थिति बदलती है तो पाकिस्तान, चीन, ईरान और पूरे अरब सागर की भूराजनीति पर क्या असर पड़ेगा। साथ ही भारत के लिए इसके क्या मायने हैं। आइए विस्तार से समझते हैं।

संघर्ष की जड़ें: 1947 से आज तक की कहानी

बलूचिस्तान में आज जो उथल-पुथल दिखाई दे रही है, उसकी जड़ें सिर्फ पिछले कुछ दिनों की हिंसा में नहीं हैं। बलूच राष्ट्रवादी संगठनों और पाकिस्तान के बीच टकराव कई दशक पुराना है। 1947 में ब्रिटिश राज खत्म होने के बाद कलात रियासत ने अपनी अलग स्वतंत्र स्थिति बनाए रखने की कोशिश की। लेकिन मार्च 1948 में कलात के खान मीर अहमद यार खान ने पाकिस्तान के साथ विलय के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर कर दिए। पाकिस्तान इसे वैध और संवैधानिक विलय मानता है, जबकि बलूच राष्ट्रवादी इसे आज भी जबरन कब्ज़ा बताते हैं।

इसी वजह से बलूच राष्ट्रवादी 11 अगस्त 1947 को ‘बलूचिस्तान का सार्वभौमत्व दिवस’ के तौर पर मनाते हैं, यह वह तारीख है जब कलात और मुस्लिम लीग के बीच हुए एक समझौते ने कलात को स्वतंत्र राज्य के तौर पर मान्यता दी थी। हालांकि पाकिस्तान में आधिकारिक तौर पर 14 अगस्त ही स्वतंत्रता दिवस के रूप में मान्यता प्राप्त है, बलूचिस्तान प्रांत में भी। 1948 से लेकर अलग-अलग दौर में बलूचिस्तान में विद्रोह होते रहे हैं, और 2000 के दशक के बाद अलगाववादी आंदोलन और ज्यादा तेज हुआ है। यानी आज का संघर्ष किसी एक सरकार या किसी एक घटना से पैदा हुआ संकट नहीं है, बल्कि राजनीतिक अधिकारों, संसाधनों पर नियंत्रण, पहचान और लंबे समय से चली आ रही असंतुष्टि का मिला-जुला परिणाम है।

BLA के हमले और सुराब विवाद: दोनों पक्षों के परस्पर विरोधी दावे

इस बार हालात इसलिए भी गंभीर हैं क्योंकि हिंसा का दायरा सिर्फ किसी एक जिले तक सीमित नहीं दिख रहा। BLA ने पिछले कुछ दिनों में कलात, सुराब, चागाई, खारान और पंजगुर समेत कई जगहों पर हमलों की ज़िम्मेदारी लेने का दावा किया है, जिसमें सुरक्षाबलों, रेलवे ट्रैक, वाणिज्यिक वाहनों और दूसरे ठिकानों को निशाना बनाने की बात शामिल है। इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन पाकिस्तान की तरफ से भी लगातार सैन्य और सुरक्षा अभियान चलाए जा रहे हैं। 12 अगस्त को पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में एक ऑपरेशन में 10 उग्रवादियों के मारे जाने की बात कही, जबकि उसी दिन सुराब में एक कार-बम के समय से पहले फटने की घटना में आठ उग्रवादियों और तीन नागरिकों की मौत की जानकारी दी गई। इस घटना में दो सैनिकों के घायल होने की बात भी सामने आई।

सुराब की यही घटना अब दोनों पक्षों के अलग-अलग दावों का केंद्र बन चुकी है। बलूच नेता मीर यार बलूच ने आरोप लगाया कि पाकिस्तानी सेना ने हवाई हमला किया और इसमें महिलाओं, बच्चों और नवजात शिशुओं समेत 30 नागरिक मारे गए। उन्होंने इस मामले को अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय तक ले जाने और अमेरिका से पाकिस्तान पर सैन्य प्रतिबंध लगाने की मांग की है। 

दूसरी तरफ, पाकिस्तानी सेना की मीडिया शाखा ISPR ने एयरस्ट्राइक के इन आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है और इसे आतंकियों द्वारा तैयार किए जा रहे IED के समय से पहले फटने की घटना बताया है। यानी एक ही घटना की दो बिल्कुल अलग तस्वीरें सामने आ रही हैं, और किसी स्वतंत्र स्रोत से अब तक इसकी पुष्टि नहीं हुई है।

इसी बीच खारान में एक अलग ऑपरेशन में पाकिस्तानी सुरक्षाबलों ने सात आतंकियों को मार गिराने का दावा किया, वहीं किला अब्दुल्ला के सेगी इलाके में एक कबायली झड़प में सिंध के एक परिवार की दो महिलाओं की मौत हो गई। यह इलाका पहले से ही "नो-गो ज़ोन" माना जाता रहा है।

इतना अहम इलाका क्यों है बलूचिस्तान 

बलूचिस्तान पाकिस्तान के कुल क्षेत्रफल का करीब 43.6 फीसदी हिस्सा है, लेकिन इसकी आबादी करीब डेढ़ करोड़ के आसपास ही है। यानी जमीन बहुत बड़ी है, लेकिन आबादी का घनत्व काफी कम। यही विशाल भूभाग और इसकी भौगोलिक स्थिति बलूचिस्तान को पाकिस्तान के दूसरे प्रांतों से अलग बनाती है।

इसकी असली ताकत सिर्फ जमीन में नहीं, बल्कि जमीन के नीचे छिपे संसाधनों में भी है। यहां कोयला, प्राकृतिक गैस, तांबा और सोने जैसे खनिज संसाधनों के बड़े भंडार हैं। इन्हीं में से एक है रेको दिक परियोजना, जिसे दुनिया के बड़े अविकसित कॉपर-गोल्ड प्रोजेक्ट्स में गिना जाता है। इस परियोजना में खनन कंपनी बैरिक की 50 फीसदी हिस्सेदारी है, जबकि पाकिस्तान की सरकार और बलूचिस्तान प्रांत की सरकार की भी हिस्सेदारी है।

लेकिन संसाधनों के बाद बलूचिस्तान की सबसे बड़ी ताकत है उसकी लोकेशन। करीब 760 किलोमीटर लंबी तटरेखा, अरब सागर तक सीधी पहुंच, पश्चिम में ईरान और उत्तर में अफगानिस्तान की सीमा। इसी तट पर है ग्वादर बंदरगाह, जिसे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे यानी CPEC के अहम हिस्से के तौर पर विकसित किया गया है। CPEC की आधिकारिक परियोजनाओं में ग्वादर से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा प्रोजेक्ट्स शामिल हैं। यानी बलूचिस्तान की जमीन और समुद्र, दोनों पाकिस्तान के लिए आर्थिक और रणनीतिक महत्व रखते हैं।

अगर बलूचिस्तान में स्थिरता आए तो क्या बदल सकता है

अगर बलूचिस्तान में कभी लंबे समय के लिए राजनीतिक स्थिरता आती है, तो यहां के खनिज संसाधन, ग्वादर जैसे बंदरगाह और अरब सागर तक पहुंच इस इलाके को एक बड़े क्षेत्रीय व्यापार और निवेश नेटवर्क का हिस्सा बनाने की क्षमता रखते हैं। लेकिन यह फिलहाल सिर्फ एक संभावना है, क्योंकि आज की वास्तविकता में सुरक्षा संकट खुद बड़े निवेशों के सामने चुनौती बना हुआ है। इसका उदाहरण खुद रेको दिक परियोजना है, जिसे आगे बढ़ाया जा रहा है, लेकिन बैरिक कंपनी ने 2026 में पाकिस्तान और क्षेत्र में बढ़ते सुरक्षा जोखिमों के चलते डेवलपमेंट एक्टिविटी को धीमा करने और प्रोजेक्ट रिव्यू जारी रखने की बात कही है।

यानी बलूचिस्तान के पास संसाधन तो हैं, लेकिन सवाल यह है कि उनका फायदा किसे मिलता है, और सुरक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर तथा स्थानीय भागीदारी के बिना ये संसाधन कितनी बड़ी आर्थिक ताकत बन सकते हैं। पाकिस्तान सरकार रेको दिक को निवेश, रोज़गार और बलूचिस्तान के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण परियोजना बताती है, वहीं बलूचिस्तान में संसाधनों के नियंत्रण और हिस्सेदारी को लेकर लंबे समय से राजनीतिक असंतोष भी रहा है।

यहीं से इसकी भूराजनीति और दिलचस्प हो जाती है। एक तरफ ग्वादर और CPEC के ज़रिए चीन की मौजूदगी है, दूसरी तरफ ईरान के साथ सीमा और अरब सागर का समुद्री रास्ता। अगर कभी बलूचिस्तान की राजनीतिक स्थिति बदलती है, तो इसका असर पाकिस्तान के क्षेत्रीय नियंत्रण से आगे जाकर चीन के रणनीतिक हितों, ईरान के साथ क्षेत्रीय समीकरण और अरब सागर की सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।

भारत के लिए बलूचिस्तान के मायने

भारत के लिए भी यही भौगोलिक स्थिति महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि अरब सागर के इसी व्यापक क्षेत्र में ईरान का चाबहार बंदरगाह है, जिसमें भारत की महत्वपूर्ण भूमिका और निवेश है। बलूचिस्तान की अस्थिरता अगर लंबे समय तक जारी रहती है, तो इसका असर CPEC की सुरक्षा और पाकिस्तान के पश्चिमी इलाकों की स्थिरता पर भी पड़ सकता है। इसलिए भविष्य में बलूचिस्तान की स्थिति चाहे जिस दिशा में जाए, उसका असर भारत की कनेक्टिविटी, क्षेत्रीय सुरक्षा और चीन-पाकिस्तान के समीकरण पर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

भारत की पूर्व राजनयिक वीणा सिकरी ने भारत की पाकिस्तान नीति को लेकर कहा कि आतंकवाद और बातचीत को एक साथ नहीं चलाया जा सकता। उनके मुताबिक पाकिस्तान की तरफ से आतंकवाद को लेकर भारत का रुख सख्त है, और बलूचिस्तान तथा पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर जैसे इलाकों में पाकिस्तान के अपने ही नागरिकों के साथ व्यवहार पर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं।

रक्षा विशेषज्ञ कैप्टन (रिटायर्ड) अनिल गौड़ बलूचिस्तान की अस्थिरता को पाकिस्तान के दूसरे अशांत इलाकों से जोड़कर देखते हैं। उनका सामरिक आकलन है कि पाकिस्तान के भीतर बढ़ता असंतोष उसकी सुरक्षा व्यवस्था पर दबाव बढ़ा सकता है, और ऐसी स्थिति में भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों का खतरा भी बढ़ सकता है। हालांकि यह किसी स्थापित तथ्य के बजाय एक विशेषज्ञ के सामरिक आकलन के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।

इसी बीच पाकिस्तान के भीतर के असंतोष की तस्वीर देश के बाहर भी दिखाई दे रही है। ब्रिटेन के ब्रैडफोर्ड शहर में पाकिस्तानी वाणिज्य दूतावास के बाहर प्रदर्शन हुआ, जहां कार्यकर्ताओं ने पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर के हालात को लेकर विरोध जताया।

सिर्फ पाकिस्तान का नहीं, पूरे इलाके की भूराजनीति का सवाल

बलूचिस्तान में आज जो कुछ हो रहा है, उसे सिर्फ पाकिस्तान का अंदरूनी मसला मानकर नहीं देखा जा सकता। इसके तार CPEC यानी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे से, ईरान की सीमा से, और अरब सागर की अहम भौगोलिक स्थिति से जुड़े हैं। फिलहाल बलूचिस्तान की आज़ादी कोई तय राजनीतिक वास्तविकता नहीं है, लेकिन वहां अलगाव की मांग और हिंसक संघर्ष लगातार पाकिस्तान के लिए एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं।

अगर आगे चलकर बलूचिस्तान की तस्वीर बदलती है, तो इसका असर सिर्फ इस्लामाबाद तक सीमित नहीं रहेगा। ग्वादर, चीन, ईरान, अफगानिस्तान, अरब सागर और भारत, इन सबके रणनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। यानी बलूचिस्तान का सवाल सिर्फ पाकिस्तान के भविष्य का सवाल नहीं है, यह पूरे इलाके की भूराजनीति का सवाल है, जिस पर आने वाले समय में दुनिया की नज़र बनी रहेगी।