बडगाम, जम्मू-कश्मीर: जम्मू-कश्मीर के बडगाम जिले में मुहर्रम की 10वीं तारीख यानी आशूरा के अवसर पर शुक्रवार को कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच पारंपरिक मातमी जुलूस निकाला गया। प्रशासन और पुलिस की निगरानी में जिलेभर में शांतिपूर्ण ढंग से मुहर्रम के कार्यक्रम संपन्न हुए। बडगाम के उपायुक्त अथर आमिर खान ने बताया कि जिले में लगभग 196 बड़े जुलूस आयोजित किए जा रहे हैं। इन्हें शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने के लिए प्रशासन ने स्थानीय समुदाय और विभिन्न हितधारकों के साथ समन्वय स्थापित किया है।

उन्होंने कहा, "सभी कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से चल रहे हैं। प्रशासन और सुरक्षा से जुड़े सभी आवश्यक इंतजाम किए गए हैं। पुलिस अधीक्षक भी मौके पर मौजूद हैं। जिलेभर में होने वाले जुलूसों के लिए स्थानीय लोगों और संबंधित विभागों के साथ समन्वय कर सभी व्यवस्थाएं सुनिश्चित की गई हैं। विभिन्न विभागों के कर्मचारी भी मैदान में तैनात हैं, ताकि सभी आयोजन सुचारु और शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सकें।"

'दो महीने पहले शुरू हो गई थी सुरक्षा-व्यवस्था की तैयारी'

वहीं, बडगाम के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक हरिप्रसाद के.के. ने बताया कि सुरक्षा व्यवस्था को लेकर करीब दो महीने पहले से ही तैयारियां शुरू कर दी गई थीं। जिला और स्थानीय स्तर पर सभी संबंधित विभागों के साथ कई समन्वय बैठकें आयोजित की गईं। उन्होंने कहा, "सुरक्षा व्यवस्था को बहु-स्तरीय बनाया गया है। क्विक रिस्पॉन्स टीम (क्यूआरटी) और '112' आपातकालीन प्रतिक्रिया वाहनों को विभिन्न इलाकों में तैनात किया गया है। सभी विभागों ने अपने-अपने दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया है और पूरे क्षेत्र में लगातार गश्त की जा रही है।"

कई जिलों में बहु-स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था लागू

मुहर्रम के अवसर पर जम्मू-कश्मीर के अन्य हिस्सों में भी मातमी जुलूस निकाले गए। कश्मीर के पुलिस महानिरीक्षक वी.के. बिरदी ने बताया कि श्रीनगर सहित विभिन्न जिलों में पुलिस ने बहु-स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था लागू की है और यातायात को इस तरह नियंत्रित किया गया है कि आम जनजीवन प्रभावित न हो। उन्होंने कहा कि जुलूस आयोजकों की ओर से भी स्वयंसेवकों की तैनाती की गई है, जो निर्धारित मार्गों पर जुलूसों को व्यवस्थित और शांतिपूर्ण ढंग से आगे बढ़ाने में सहयोग कर रहे हैं।

शिया मुस्लिम समुदाय इस दिन को शोक मनाते हैं

मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है और इसकी 10वीं तारीख, जिसे आशूरा कहा जाता है, विशेष महत्व रखती है। इसी दिन वर्ष 680 ईस्वी (61 हिजरी) में इराक के कर्बला में पैगंबर हजरत मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन इब्न अली और उनके साथियों ने शहादत दी थी। शिया मुस्लिम समुदाय इस दिन को शोक और श्रद्धांजलि के रूप में मनाता है। मातमी जुलूसों के दौरान श्रद्धालुओं ने इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हुए सीना-ज़नी की और कर्बला की कुर्बानी को श्रद्धापूर्वक नमन किया। वहीं, सुन्नी मुस्लिम समुदाय के लोग इस दिन रोजा भी रखते हैं।