नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने कहा कि पृथ्वी और पर्यावरण के संरक्षण का विचार भारत की सभ्यतागत विरासत में गहराई से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि प्रकृति के प्रति भारत की सदियों पुरानी श्रद्धा की झलक देश के संविधान में भी दिखाई देती है। दिल्ली में “द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनेमिक्स” विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए CJI सूर्यकांत ने संविधान को केवल राजनीतिक दस्तावेज मानने से इनकार किया। उन्होंने इसे “अतीत, वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के साथ नैतिक समझौता” बताया।

CJI सूर्यकांत ने कहा, “सभ्यता के उदय से ही भारत ने प्रकृति माता के प्रति शाश्वत श्रद्धा रखी है। पर्यावरण की जीवंत संरचना के प्रति यह गहरा सम्मान हमारे गणराज्य के संस्थापक दस्तावेज में भी दिखाई देता है।” उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था में अनुच्छेद 48A राज्य को पर्यावरण की रक्षा और सुधार का निर्देश देता है। वहीं अनुच्छेद 51A(g) प्रत्येक नागरिक से प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और उसे बेहतर बनाने की अपेक्षा करता है।

न्यायिक व्याख्या से संवैधानिक प्रावधानों को मिली ताकत

CJI ने कहा कि केवल संवैधानिक प्रावधान पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि उन्हें प्रभावी संरक्षण में बदलने के लिए न्यायिक व्याख्या की भी आवश्यकता है। उन्होंने कहा, “संविधान के शब्द केवल बीज हैं। उन्हें न्यायिक बुद्धिमत्ता के पोषण की आवश्यकता है, ताकि वे जीवन में अंकुरित हो सकें।” CJI सूर्यकांत ने सुप्रीम कोर्ट को पर्यावरणीय न्याय का “बरगद का पेड़” बताते हुए कहा कि अदालत की पर्यावरण संबंधी न्यायशास्त्र भारत की सभ्यतागत सोच से जुड़ी है और इसका उद्देश्य आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा करना भी रहा है।

पर्यावरण न्यायशास्त्र में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका

CJI ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने दशकों के दौरान पर्यावरण संबंधी कानून और न्यायशास्त्र को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अदालत ने ऐसे कई सिद्धांत विकसित किए हैं, जिनका उद्देश्य विकास और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच संतुलन कायम करना है। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21 के तहत स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार को जीवन के अधिकार का हिस्सा माना है।

इसके अलावा अदालत ने सावधानी का सिद्धांत (Precautionary Principle), प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle), पूर्ण दायित्व (Absolute Liability) और लोक न्यास सिद्धांत (Public Trust Doctrine) जैसे महत्वपूर्ण सिद्धांतों को विकसित किया है। इन सिद्धांतों के जरिए पर्यावरणीय नुकसान को रोकने, क्षतिग्रस्त पर्यावरण को बहाल करने और नुकसान के लिए जिम्मेदारी तय करने पर जोर दिया गया है।

विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन जरूरी

CJI सूर्यकांत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सतत विकास (Sustainable Development) की अवधारणा को भी विकसित किया है। इसका उद्देश्य विकास को पूरी तरह रोकना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि विकास पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों की अनदेखी करते हुए आगे न बढ़े। उन्होंने कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने दशकों से इस विचार को मजबूत किया है कि संरक्षण के बिना प्रगति ऐसी मृगतृष्णा है, जो पारिस्थितिक विनाश के रेगिस्तान में गायब हो जाती है।” उन्होंने यह भी कहा कि प्रकृति की रक्षा केवल परोपकार का कार्य नहीं है, बल्कि यह मानव अस्तित्व और जीवन की निरंतरता से सीधे जुड़ी हुई है।

आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों पर जोर

CJI के संबोधन में पर्यावरण संरक्षण को केवल वर्तमान जरूरतों तक सीमित रखने के बजाय भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों से जोड़ने पर विशेष जोर रहा। उनकी टिप्पणी ऐसे समय आई है जब सुप्रीम कोर्ट की पर्यावरण संबंधी न्यायिक प्रक्रिया में आर्थिक और बुनियादी ढांचा विकास तथा पर्यावरण संरक्षण के बीच संवैधानिक संतुलन का मुद्दा लगातार महत्वपूर्ण बना हुआ है।