नई दिल्ली: अमेरिकी संसद के निचले सदन, हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने 16 सितंबर 2026 को रूस और ईरान पर नए प्रतिबंधों वाला बिल 262 के मुकाबले 159 वोटों से पास कर दिया। इससे पहले सीनेट इसे 7 अगस्त 2026 को ही 86-11 के भारी बहुमत से मंजूरी दे चुकी थी। हाउस में वोटिंग के आंकड़े दिखाते हैं कि 203 रिपब्लिकन, 58 डेमोक्रेट्स और एक निर्दलीय सांसद ने बिल के पक्ष में वोट डाला, जबकि 7 रिपब्लिकन और 152 डेमोक्रेट्स ने इसका विरोध किया।
इस बिल को आधिकारिक तौर पर नाम दिया गया है - ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’, दिवंगत अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम के सम्मान में, जिन्होंने रूस पर सख्ती की यह मुहिम शुरू की थी।
व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने 17 सितंबर को समाचार एजेंसी ANI को बताया कि राष्ट्रपति ट्रंप बिल पर हस्ताक्षर करने की योजना बना रहे हैं, हालांकि हस्ताक्षर की कोई तय तारीख अभी सामने नहीं आई है। बिल कानून बनते ही खुद-ब-खुद कोई टैरिफ लागू नहीं होगा, यह राष्ट्रपति को रूस से तेल-गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का विवेकाधीन अधिकार (discretionary power) देता है।
बिल में क्या-क्या शामिल है?
- रूस से तेल-गैस खरीदने वाले बड़े देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का राष्ट्रपति को अधिकार
- रूस से अमेरिका आने वाले सामान पर 500% तक टैरिफ का प्रावधान
- प्रतिबंधों से बचकर रूसी तेल पहुंचाने वाले टैंकरों ('शैडो फ्लीट') पर सीधी कार्रवाई
- रूस के ऊर्जा उद्योग, बैंकिंग सेक्टर, रक्षा उद्योग और राष्ट्रपति पुतिन के करीबियों पर प्रतिबंध
- 1996 का ईरान प्रतिबंध कानून 2031 तक विस्तारित
डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने बिल पास होने के बाद कहा कि भारत और चीन को अब रूस के अलावा कहीं और से तेल-गैस खरीदना चाहिए। वहीं कुछ डेमोक्रेट सांसदों ने इसका विरोध करते हुए कहा कि यह राष्ट्रपति को अतिरिक्त और बेलगाम टैरिफ अधिकार देता है।

भारत पर पहले से ही लागू टैरिफ का बोझ
यह नया बिल एक ऐसे समय आया है जब भारत पहले से ही अमेरिकी टैरिफ का सामना कर रहा है। 27 अगस्त 2025 से अमेरिका ने भारतीय सामान पर 25% रेसिप्रोकल टैरिफ के अलावा, रूसी तेल खरीद को लेकर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगा रखा है, यानी कुछ भारतीय एक्सपोर्ट्स पर कुल टैरिफ 50% तक पहुंच चुका है, जिससे करीब ₹41,500 करोड़ का व्यापार प्रभावित हो रहा है।
भारत की ऊर्जा निर्भरता, आंकड़ों में
- वित्त वर्ष 2026 में भारत के कुल क्रूड आयात का करीब 30% रूस से आया
- जुलाई 2026 में रूसी तेल की हिस्सेदारी 50% से भी ज्यादा रही
- भारत अपनी कुल क्रूड जरूरत का 88% से ज्यादा आयात करता है
- भारत की स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व सिर्फ 9-10 दिन के आयात जितनी है (जापान: 200 दिन, दक्षिण कोरिया: 207 दिन)
- 2022 के बाद से रूस के सस्ते तेल से भारत को करीब 12.6 अरब डॉलर की बचत हुई है
आम आदमी की जेब पर कितना असर?
भारत का अमेरिका के साथ कुल गुड्स-एंड-सर्विसेज व्यापार करीब 240 अरब डॉलर का है, जिसमें अकेले भारत का अमेरिका को एक्सपोर्ट करीब 104 अरब डॉलर सालाना है। इसमें इलेक्ट्रॉनिक्स (~26 अरब डॉलर), फार्मास्यूटिकल्स (~10 अरब डॉलर) और मशीनरी (~7 अरब डॉलर) की बड़ी हिस्सेदारी है। अगर 100% टैरिफ लागू हुआ, तो अमेरिकी खरीदार बांग्लादेश, वियतनाम, मैक्सिको जैसे सस्ते विकल्पों की तरफ रुख कर सकते हैं, जिसका सीधा असर टेक्सटाइल, जेम्स-ज्वेलरी और लेदर जैसे लेबर-इंटेंसिव सेक्टर्स पर पड़ेगा, जहां लाखों मजदूर जुड़े हैं।
दूसरी तरफ, अगर भारत रूस से तेल खरीद घटाता है, तो महंगे विकल्पों (इराक, सऊदी अरब, यूएई, ब्राजील, अमेरिका) की तरफ जाना होगा, जिसका असर सीधे पेट्रोल-डीजल की कीमतों, रसोई गैस (भारत अपनी 60% LPG जरूरत आयात करता है), रुपये की कीमत और महंगाई पर पड़ सकता है।

भारत सरकार और रूस-चीन की प्रतिक्रिया
भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि वह हालात पर नजर बनाए हुए है और 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा। अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने कहा कि ऊर्जा स्रोत तय करना भारत की ‘बुनियादी राष्ट्रीय जिम्मेदारी’ है।

रूस ने भी इस बिल पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने इसे ‘अमित्रतापूर्ण कदम’ बताया और कहा कि अतिरिक्त अमेरिकी प्रतिबंध यूक्रेन में शांति प्रयासों को और जटिल बनाएंगे। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ च्याकुन ने कहा कि किसी तीसरे देश को सामान्य आर्थिक सहयोग में दखल देने या दबाव बनाने का अधिकार नहीं है।
इसी बीच, भारत-अमेरिका द्विपक्षीय ट्रेड डील पर बातचीत जारी है, और इस महीने के अंत में विस्कॉन्सिन में होने वाली G20 ट्रेड मिनिस्टर्स मीटिंग के दौरान आगे की बातचीत होने की उम्मीद है।
Our statement on passage of the Sanctioning Russia and Iran Act in the US Congress🔗 https://t.co/kD0Yg9sWbU pic.twitter.com/rSc21AqwEh
— Randhir Jaiswal (@MEAIndia) September 17, 2026
कानूनी पेचीदगी: ट्रंप की टैरिफ नीति को पहले भी झटके लगे हैं
गौरतलब है कि ट्रंप प्रशासन की व्यापक टैरिफ नीति को अमेरिका में ही कानूनी चुनौतियां मिल चुकी हैं। फरवरी 2026 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ के एक बड़े हिस्से को अमान्य करार दिया था, और मई 2026 में एक संघीय अदालत ने 10% की ब्लैंकेट ग्लोबल टैरिफ को भी खारिज कर दिया था। इसके बाद द्विपक्षीय सांसदों के एक समूह ने इन उपायों को पलटने के लिए अलग प्रस्ताव भी पेश किया है, यानी राष्ट्रपति के टैरिफ अधिकार को लेकर अमेरिका में ही कानूनी विवाद जारी है।

सिर्फ भारत नहीं, ट्रंप की वैश्विक दबाव रणनीति
यह बिल एक बड़े पैटर्न का हिस्सा है, जो दिखाता है कि ट्रंप प्रशासन टैरिफ और व्यापार को दुनिया भर में दबाव के हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है:
- कनाडा-यूरोप: ट्रंप ने चेतावनी दी है कि अगर कनाडा यूरोपीय संघ का पहला 'एसोसिएट मेंबर' बनता है, तो यूरोप पर भारी टैरिफ लगाया जा सकता है। कनाडा के PM मार्क कार्नी ने यूरोपीय संसद में कहा कि कनाडा अपनी विदेश नीति खुद तय करेगा।
- सऊदी अरब: अमेरिका ने सऊदी अरब को 48 F-35 फाइटर जेट बेचने को मंजूरी दी है, जो करीब 142 अरब डॉलर के बड़े डिफेंस पैकेज का हिस्सा है। पेंटागन की अपनी खुफिया एजेंसी ने आशंका जताई है कि इस टेक्नोलॉजी के चीन तक पहुंचने का खतरा है। जुलाई 2026 में दोनों देशों के बीच 30 साल का सिविल न्यूक्लियर सहयोग समझौता भी हुआ।
- चीन: रूस से तेल खरीदने वाले टॉप देशों में चीन भारत से भी आगे है, लेकिन अमेरिका-चीन आर्थिक रिश्तों का पैमाना अलग स्तर का है।
खुद अमेरिका में ट्रंप की टैरिफ नीति को कितना समर्थन?
प्यू रिसर्च सेंटर के 36-देशों के सर्वे (फरवरी-मई 2026, जुलाई में जारी) में भारत में सिर्फ 18% लोगों ने ट्रंप की टैरिफ नीति को मंजूरी दी; ब्रिटेन (27%), कनाडा (17%), जापान (15%), दक्षिण कोरिया (14%), मेक्सिको (11%), जर्मनी (8%) - 36 में से सिर्फ केन्या ही ऐसा देश था जहां बहुमत ने इसे सही ठहराया
अमेरिका के भीतर, प्यू के घरेलू सर्वे में 60% अमेरिकी टैरिफ बढ़ोतरी से असहमत मिले, सिर्फ 37% ने समर्थन किया
ABC News-वॉशिंगटन पोस्ट-इप्सॉस सर्वे में 64% अमेरिकियों ने टैरिफ नीति को नामंजूर किया
Marquette Law School Poll में 63% अमेरिकियों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को राष्ट्रपति के टैरिफ अधिकार को सीमित करना चाहिए
आगे क्या?
बिल अभी कानून नहीं बना है, राष्ट्रपति ट्रंप के हस्ताक्षर बाकी हैं, हालांकि व्हाइट हाउस ने संकेत दिया है कि वे साइन करने की योजना बना रहे हैं। साइन होने के बाद भी टैरिफ लागू करना या न करना राष्ट्रपति के विवेक पर निर्भर करेगा। भारत के लिए असली चुनौती रूस से मिलने वाली सस्ती ऊर्जा और अमेरिका के बड़े बाजार, दोनों के बीच संतुलन बनाना है, और इसका असर आखिरकार आम आदमी की जेब तक पहुंच सकता है।
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