सांसदों के टूटने की अटकलों के बीच शिवसेना (यूबीटी) ने लोकसभा अध्यक्ष से की अपील, कहा- किसी भी अलग गुट को न दी जाए मान्यता; पार्टी में नई राजनीतिक हलचल तेज।
महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) को लेकर सियासी चर्चाएं तेज हो गई हैं। पार्टी के भीतर संभावित असंतोष और सांसदों के टूटने की अटकलों के बीच उद्धव ठाकरे गुट ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक महत्वपूर्ण पत्र भेजा है। इस पत्र में आग्रह किया गया है कि यदि पार्टी के कुछ सांसद अलग गुट बनाने या किसी अन्य राजनीतिक दल के साथ जाने का दावा करते हैं, तो उन्हें संसद में किसी प्रकार की अलग मान्यता न दी जाए।
यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है जब राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि शिवसेना (यूबीटी) के कुछ सांसद पार्टी नेतृत्व से नाराज हैं और भविष्य की रणनीति को लेकर अलग रास्ता चुन सकते हैं। हालांकि इन अटकलों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन पार्टी नेतृत्व ने संभावित संकट को देखते हुए पहले ही कानूनी और राजनीतिक मोर्चे पर तैयारी शुरू कर दी है।
#WATCH | Delhi | Amid speculations of a split in Shiv Sena UBT, party MP Sanjay Raut says, "I have information that Rs 15 crore each was delivered to the MPs, after which they boarded charter flights from three places, including Nanded and Pune. We have issued a whip for the… pic.twitter.com/s50XxiJV3E
— ANI (@ANI) June 17, 2026
2022 जैसी स्थिति से बचने की कोशिश
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पूरा घटनाक्रम वर्ष 2022 की उस बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल की याद दिलाता है, जब एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायक शिवसेना से अलग हो गए थे। उस घटनाक्रम ने महाराष्ट्र की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया था और अंततः चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को आधिकारिक शिवसेना के रूप में मान्यता दे दी थी।
अब उद्धव गुट नहीं चाहता कि सांसदों के स्तर पर वैसी ही स्थिति दोबारा बने। यही वजह है कि पार्टी ने पहले से ही लोकसभा अध्यक्ष को संवैधानिक और कानूनी पहलुओं का हवाला देते हुए अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया है।
अरविंद सावंत ने रखा कानूनी पक्ष
शिवसेना (यूबीटी) संसदीय दल के नेता अरविंद सावंत ने पत्र में कहा कि संविधान के 91वें संशोधन के बाद राजनीतिक दलों में “विभाजन” की अवधारणा को कानूनी संरक्षण नहीं मिला हुआ है। उनका तर्क है कि केवल सांसदों या विधायकों की संख्या के आधार पर कोई नया समूह स्वतः वैध राजनीतिक इकाई नहीं बन जाता।
सावंत ने यह भी कहा कि सांसद जिस चुनाव चिन्ह और राजनीतिक दल के आधार पर चुनकर संसद पहुंचे हैं, उनकी वैधता उसी मूल राजनीतिक दल से जुड़ी हुई है। इसलिए केवल अलग होने की घोषणा कर देने से कोई नया संसदीय समूह संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं कर सकता।
#WATCH | Delhi | Amid speculations of a split in Shiv Sena UBT, party MP Arvind Sawant says, "I have written to Lok Sabha Speaker Om Birla over safeguarding the Constitution. Until now, no party leader has told us that they are leaving." pic.twitter.com/enmDoCctGV
— ANI (@ANI) June 17, 2026
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला
पत्र में महाराष्ट्र के राजनीतिक संकट पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले का भी उल्लेख किया गया है। पार्टी का कहना है कि अदालत ने स्पष्ट किया था कि राजनीतिक दल की पहचान और अधिकार विधायिका दल से ऊपर हैं। इसलिए केवल विधायकों या सांसदों के बहुमत के आधार पर पार्टी की पहचान तय नहीं की जा सकती।
शिवसेना (यूबीटी) का मानना है कि यदि कोई सांसद पार्टी नेतृत्व की अनुमति के बिना अलग राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश करता है तो वह दलबदल विरोधी कानून के दायरे में आ सकता है।
सांसदों को जारी किया गया व्हिप
संभावित राजनीतिक संकट के बीच पार्टी ने अपने सांसदों को संसदीय दल की बैठक में शामिल होने के लिए व्हिप भी जारी किया है। इसे पार्टी नेतृत्व की ओर से एकजुटता बनाए रखने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, पार्टी नेतृत्व लगातार सांसदों के संपर्क में है और किसी भी असंतोष को दूर करने का प्रयास कर रहा है। वहीं दूसरी ओर राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी जारी है कि आने वाले दिनों में महाराष्ट्र की राजनीति में नए समीकरण देखने को मिल सकते हैं।
क्या फिर बदलेंगे महाराष्ट्र के राजनीतिक समीकरण?
महाराष्ट्र में पिछले कुछ वर्षों के दौरान कई बड़े राजनीतिक बदलाव हुए हैं। ऐसे में शिवसेना (यूबीटी) के भीतर उठ रही नई चर्चाओं ने राजनीतिक माहौल को फिर गर्म कर दिया है। हालांकि अभी तक किसी सांसद ने सार्वजनिक रूप से पार्टी छोड़ने की घोषणा नहीं की है, लेकिन घटनाक्रम पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
फिलहाल उद्धव ठाकरे गुट अपने संगठन को एकजुट रखने और किसी भी संभावित टूट को रोकने की कोशिश में जुटा है। आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि यह केवल राजनीतिक अटकलें हैं या फिर महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर किसी बड़े बदलाव की ओर बढ़ रही है।
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