पंजाब में सरकारी कर्मचारियों और पेंशनर्स के महंगाई भत्ते (DA) के बकाया भुगतान का मामला एक बार फिर चर्चा में है। सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार को फिलहाल बड़ी कानूनी राहत देते हुए राज्य के मुख्य सचिव केएपी सिन्हा के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई पर रोक लगा दी है। अदालत के इस फैसले से मुख्य सचिव को तत्काल सख्त कार्रवाई और व्यक्तिगत पेशी के दबाव से राहत मिली है। हालांकि, कर्मचारियों और पेंशनर्स का बकाया भुगतान अब भी सरकार के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार को स्पष्ट कर दिया है कि उसे बकाया महंगाई भत्ते के भुगतान को लेकर ठोस योजना पेश करनी होगी। सरकार को बताना होगा कि वह 31 मार्च 2027 तक कर्मचारियों और पेंशनर्स को कितनी राशि का भुगतान कर सकती है। इस मामले में अगली सुनवाई 1 दिसंबर को निर्धारित की गई है।

मुख्य सचिव के खिलाफ अवमानना कार्रवाई पर लगी रोक

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने मुख्य सचिव केएपी सिन्हा के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई पर रोक लगाई है। इसके साथ ही अदालत ने संबंधित सिविल अवमानना मामले में भी फिलहाल कोई कठोर कदम नहीं उठाने का निर्देश दिया।

यह मामला उस समय और गंभीर हो गया था, जब पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले से दो दिन पहले मुख्य सचिव को अवमानना नोटिस जारी किया था। हाईकोर्ट ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का निर्देश भी दिया था। बकाया महंगाई भत्ते का भुगतान नहीं होने को लेकर कर्मचारियों और पेंशनर्स की ओर से अदालत में लगातार सवाल उठाए जा रहे थे।

मुख्य सचिव के खिलाफ कार्रवाई की आशंका ने राज्य सरकार पर कानूनी दबाव बढ़ा दिया था। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद फिलहाल इस दबाव में कमी आई है। हालांकि, इसे सरकार को पूरी तरह दोषमुक्त करने वाला फैसला नहीं माना जा सकता, क्योंकि भुगतान की जिम्मेदारी अब भी राज्य सरकार के पास है।

अदालत ने पूछा- मकसद भुगतान कराना है या अधिकारी को जेल भेजना?

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से मुख्य सचिव को जेल भेजने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए। जस्टिस बीवी नागरत्ना ने पूछा कि याचिकाकर्ताओं का उद्देश्य अदालत के आदेश का पालन करवाना है या राज्य के सबसे वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी को जेल भेजना?

पीठ ने याचिकाकर्ताओं के उस रवैये पर भी नाराजगी जताई, जिसे उसने दबाव बनाने की कोशिश के रूप में देखा। अदालत के रुख से संकेत मिला कि कर्मचारियों के बकाया भुगतान का समाधान प्राथमिकता होनी चाहिए, न कि केवल अधिकारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की मांग।

इसके साथ ही अदालत ने सरकार से भुगतान की व्यावहारिक योजना मांगी है। अब राज्य को अपनी वित्तीय स्थिति को ध्यान में रखते हुए यह बताना होगा कि वह निर्धारित समयसीमा तक कितनी देनदारी चुका सकती है।

22,818 करोड़ रुपये का DA और DR बकाया

इस विवाद का सबसे बड़ा पहलू इसकी आर्थिक देनदारी है। हाईकोर्ट में पेश की गई मुख्य सचिव की स्टेटस रिपोर्ट के मुताबिक, 1 जुलाई 2021 से 30 सितंबर 2026 तक सरकारी कर्मचारियों के महंगाई भत्ते (DA) और पेंशनर्स की महंगाई राहत (DR) का कुल बकाया 22,818 करोड़ रुपये बताया गया है।

रिपोर्ट में कर्मचारियों और पेंशनर्स की कुल बकाया देनदारी 32,418 करोड़ रुपये बताई गई है। ये आंकड़े राज्य के वित्तीय प्रबंधन के सामने खड़ी बड़ी चुनौती को दिखाते हैं। इतनी बड़ी राशि का भुगतान एक साथ करना सरकार के लिए आसान नहीं होगा।

राज्य सरकार का तर्क है कि उसे पिछली सरकार से करीब 13,000 करोड़ रुपये की पुरानी देनदारी विरासत में मिली थी। इसके अलावा सरकार ने पंजाब की कमजोर वित्तीय स्थिति का हवाला देते हुए कहा है कि राज्य की कुल राजस्व प्राप्तियों का लगभग 51 प्रतिशत हिस्सा वेतन और पेंशन पर खर्च होता है।

सरकार के मुताबिक, ब्याज भुगतान सहित उसकी कुल तय देनदारियां राजस्व प्राप्तियों के लगभग 82 प्रतिशत तक पहुंच जाती हैं। ऐसे में यदि पूरा DA और DR बकाया एक साथ चुका दिया जाता है, तो सरकारी खजाने पर भारी दबाव पड़ सकता है।

आठ लाख कर्मचारियों और पेंशनर्स पर टिकी नजर

मुख्यमंत्री भगवंत मान ने बुधवार को बताया था कि पंजाब में करीब आठ लाख सरकारी कर्मचारी और पेंशनर्स हैं। ऐसे में महंगाई भत्ते का मुद्दा केवल प्रशासनिक या कानूनी मामला नहीं रह गया है, बल्कि इसका सीधा संबंध बड़ी संख्या में परिवारों की आर्थिक स्थिति से है।

कर्मचारी संगठन लंबे समय से बकाया भुगतान की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि महंगाई भत्ता और महंगाई राहत कर्मचारियों तथा पेंशनर्स का अधिकार है। भुगतान में लगातार देरी से उन्हें आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि राज्य की आर्थिक सीमाओं को देखते हुए भुगतान की प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से तय करनी होगी। सुप्रीम कोर्ट की ओर से योजना मांगे जाने के बाद सरकार को अब अपनी वित्तीय क्षमता और कर्मचारियों की मांगों के बीच संतुलन बनाना होगा।

विपक्ष को मिला सरकार को घेरने का मुद्दा

DA बकाया विवाद ने पंजाब की राजनीति को भी गर्म कर दिया है। विपक्षी दल लगातार भगवंत मान सरकार से सवाल कर रहे हैं कि कर्मचारियों और पेंशनर्स की इतनी बड़ी रकम अब तक क्यों नहीं चुकाई गई। मुख्य सचिव के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की आशंका ने विपक्ष को सरकार पर हमला करने का एक और मुद्दा दिया था।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के आदेश से आम आदमी पार्टी सरकार को फिलहाल राजनीतिक राहत मिली है। अब सरकार यह कह सकती है कि मुख्य सचिव के खिलाफ तत्काल आपराधिक अवमानना की कार्रवाई नहीं होगी। लेकिन कर्मचारियों के बकाया भुगतान का सवाल अभी भी जस का तस बना हुआ है।

पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कहा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश की जांच कर रही है और आदेश की प्रति मिलने के बाद ही इस पर विस्तृत प्रतिक्रिया दी जाएगी। शिरोमणि अकाली दल के प्रवक्ता अरशदीप सिंह कलेर ने भी आदेश को पढ़ने के बाद पार्टी का रुख स्पष्ट करने की बात कही।

2027 चुनाव से पहले सरकार के सामने बड़ी चुनौती

पंजाब में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में मार्च 2027 तक बकाया भुगतान की योजना पेश करने की समयसीमा राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण हो गई है। विपक्ष की नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार अदालत के सामने कितनी राशि चुकाने का प्रस्ताव रखती है और वास्तव में कर्मचारियों तथा पेंशनर्स को कितना भुगतान करती है।

कर्मचारी संगठनों ने भी इस मामले में अपनी कानूनी रणनीति में बदलाव का संकेत दिया है। सांझा मुलाजिम मोर्चा के संयोजक सुखचैन सिंह खैरा के मुताबिक, संगठन सुप्रीम कोर्ट के फैसले को स्वीकार करता है, लेकिन उनका मानना है कि मौजूदा वकील मामले को प्रभावी ढंग से पेश नहीं कर पाए। इसलिए संगठन नया वकील नियुक्त करने पर विचार कर रहा है।

कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पंजाब सरकार को फिलहाल कानूनी राहत जरूर मिली है, लेकिन असली परीक्षा अब भुगतान योजना को लेकर होगी। 1 दिसंबर की अगली सुनवाई में सरकार को अपनी योजना और मार्च 2027 तक संभावित भुगतान का ब्योरा देना होगा। कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए सबसे अहम सवाल यही रहेगा कि उन्हें उनके बकाया महंगाई भत्ते की रकम कब और कितनी मिलेगी।