अलीगंज, उत्तर प्रदेश: सोमवार दोपहर करीब ढाई बजे, लखनऊ के अलीगंज इलाके का पुरनिया इलाका अपनी सामान्य रफ्तार में था। सड़कों पर रोज़ की तरह आवाजाही थी। दुकानों पर ग्राहक मौजूद थे। और रमेश्वरम इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट यानी RITM की इस बहुमंजिला इमारत में दर्जनों छात्र अपने करियर और भविष्य के सपनों के साथ क्लासरूम में बैठे थे। लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि अगले कुछ मिनटों में यह इमारत एक खौफनाक मौत के जाल में बदलने वाली है।
प्रारंभिक जांच के मुताबिक दूसरी मंजिल पर लगे एक एयर कंडीशनर के कंप्रेसर में अचानक धमाका हुआ। धमाके के साथ ही आग भड़क उठी। वहां मौजूद प्लास्टिक शीट, फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और वायरिंग ने आग को और तेजी से फैलाने का काम किया।
लोगों को संभलने का मौक़ा नहीं मिला- प्रत्यक्षदर्शी
लेकिन जानलेवा सिर्फ आग नहीं थी… सबसे बड़ा खतरा था वह जहरीला काला धुआं, जिसने कुछ ही मिनटों में पूरी इमारत को अपनी चपेट में ले लिया। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक लोगों को संभलने तक का मौका नहीं मिला। धुआं इतनी तेजी से फैला कि कई छात्रों को यह समझने का समय ही नहीं मिला कि आखिर हुआ क्या है।
खिड़कियों से भाग निकलने के लिए तोड़ने पड़े शीशे
ऊपरी मंजिलों पर मौजूद छात्र खिड़कियों की तरफ भागे। कुछ ने शीशे तोड़ दिए। कुछ मदद के लिए चिल्लाने लगे। नीचे खड़े लोगों ने जब बच्चों को हाथ हिलाते देखा तो अफरा-तफरी मच गई। कई छात्र पाइपों और बिजली के तारों के सहारे नीचे उतरने की कोशिश करते दिखाई दिए। कुछ ने जान बचाने के लिए दूसरी और तीसरी मंजिल से छलांग लगा दी।
कई छात्रों ने घबराहट में किया परिवार को फोन
स्थानीय लोगों ने नीचे गद्दे, कपड़े और जो कुछ हाथ लगा, उसे बिछाकर बच्चों को बचाने की कोशिश की। इस दौरान कई छात्रों ने अपने घरों में फोन किए। एक छात्र ने अपने पिता को फोन कर कहा… “पापा... मैं आग में फंस गया हूं... शायद अब नहीं बच पाऊंगा।”
यह फोन कॉल आज भी उस परिवार के कानों में गूंज रही है। कई छात्र बाथरूम में घुस गए। उन्हें लगा कि शायद पानी और बंद जगह उन्हें धुएं से बचा लेगी। लेकिन जहरीला धुआं वहां भी पहुंच गया। जब फायर ब्रिगेड की गाड़ियां मौके पर पहुंचीं, तब तक हालात बेहद भयावह हो चुके थे। दमकल कर्मियों को ऊपरी मंजिलों तक पहुंचने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा।
कई घंटों तक चला रेस्क्यू ऑपरेशन
रेस्क्यू ऑपरेशन कई घंटों तक चला। धुएं से बेहोश हुए लोगों को बाहर निकाला गया। कई को अस्पताल भेजा गया। लेकिन कई ऐसे भी थे जिनकी सांसें दम घुटने से पहले ही थम चुकी थीं।
इस हादसे में कम से कम 15 लोगों की मौत हुई है, जबकि कुछ रिपोर्टों में मृतकों की संख्या 18 तक बताई गई है। मृतकों में अधिकांश युवा छात्र और प्रशिक्षु शामिल बताए जा रहे हैं। लेकिन यह तो सिर्फ शुरुआत थी... जांच आगे बढ़ी तो सामने आया कि आग जितनी खतरनाक थी, उससे कहीं ज्यादा खतरनाक वह इमारत थी जिसमें ये बच्चे फंसे हुए थे।
'सिंगल एंट्री और सिंगल एग्जिट बनी मौत का कारण'
लेकिन शुरुआती जांच यह संकेत जरूर दे रही है कि कई लोगों की जान सिर्फ आग की वजह से नहीं... बल्कि बाहर निकलने के रास्तों की कमी और सुरक्षा व्यवस्थाओं की गंभीर खामियों के कारण भी गई। सबसे पहले बात इस इमारत की बनावट की। जांच में सामने आया है कि बहुमंजिला भवन में आने-जाने के लिए केवल एक ही संकरा रास्ता था। यानी सिंगल एंट्री और सिंगल एग्जिट।
जब आग लगी और धुआं सीढ़ियों तक पहुंचा, तो वही एकमात्र रास्ता भी बंद हो गया। लोग ऊपर फंस गए। लोग नीचे नहीं आ सके। और यहीं से यह इमारत मौत के जाल में बदल गई। जांच एजेंसियों को यह भी पता चला है कि छत पर जाने वाले दरवाजे पर ताला लगा हुआ था। यानी जो छात्र छत पर जाकर अपनी जान बचा सकते थे, उनके लिए भी रास्ता बंद था।
मुख्य प्रवेश द्वार बायोमेट्रिक सिस्टम बाधित था
कुछ रिपोर्टों में यह दावा भी सामने आया है कि मुख्य प्रवेश द्वार बायोमेट्रिक सिस्टम से संचालित था। बिजली बाधित होने के बाद यह सिस्टम काम नहीं कर पाया और बाहर निकलने में अतिरिक्त दिक्कतें पैदा हुईं। हालांकि इस पहलू की अंतिम पुष्टि जांच रिपोर्ट के बाद होगी।
हर बड़े हादसे के बाद अक्सर एक जैसी तस्वीर दिखाई देती है। पहले हादसा होता है... फिर जांच बैठती है... फिर अधिकारियों पर कार्रवाई होती है... और फिर यह सवाल उठता है कि अगर खामियां पहले से मौजूद थीं, तो उन्हें समय रहते सुधारा क्यों नहीं गया? लखनऊ अग्निकांड में भी अब यही सवाल प्रशासन के सामने खड़े हैं।
सीएम योगी आदित्यनाथ ने गठित की SIT
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घटना के तुरंत बाद हाई-लेवल SIT जांच के आदेश दिए हैं। चार अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है। इमारत के मालिक समेत कई लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। पुलिस का कहना है कि गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है और जांच लगातार आगे बढ़ रही है।
यानी अब जांच का फोकस सिर्फ आग लगने के कारण पर नहीं, बल्कि जिम्मेदार लोगों की भूमिका पर भी है। लेकिन जांच एजेंसियां अब उस सवाल का जवाब तलाश रही हैं, जो शायद इस पूरे मामले का सबसे अहम सवाल है… क्या इस हादसे को पहले ही रोका जा सकता था?
क्या निरीक्षण सिर्फ कागजों तक सीमित रहे?
जांच में सामने आया है कि जिस इमारत में यह हादसा हुआ, उसे जिस उद्देश्य के लिए मंजूरी मिली थी, उसका उपयोग बाद में अलग तरीके से किया जा रहा था। रिकॉर्ड बताते हैं कि वर्ष 2016 में इस भवन को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज की गई थीं और कार्रवाई तथा ध्वस्तीकरण की सिफारिश तक की गई थी। अगर ऐसा था, तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या फाइलें दबा दी गईं? क्या निरीक्षण सिर्फ कागजों तक सीमित रहे? या फिर नियमों के उल्लंघन को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया?
जांच में यह भी सामने आया है कि भवन का स्वीकृत बिजली लोड लगभग 20 किलोवाट था, जबकि वास्तविक खपत इससे काफी अधिक बताई जा रही है। ऐसे में यह भी जांच का विषय है कि क्या बिजली व्यवस्था पर कभी गंभीर ऑडिट किया गया था या नहीं।
क्या फायर NOC की सभी शर्तों का पालन किया जा रहा था?
फायर सेफ्टी को लेकर भी कई सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या इमारत का नियमित फायर ऑडिट हुआ था? क्या इमरजेंसी एग्जिट और निकासी व्यवस्था की जांच की गई थी? क्या अग्निशमन उपकरण पूरी तरह कार्यरत थे? और सबसे महत्वपूर्ण... क्या फायर NOC की सभी शर्तों का पालन किया जा रहा था?
इन सवालों के जवाब अब SIT तलाश रही है। लेकिन फिलहाल जो तस्वीर सामने आ रही है, वह सिर्फ एक शॉर्ट सर्किट या तकनीकी खराबी की नहीं है। यह उस व्यवस्था की तस्वीर है जहां नियम तो मौजूद रहते हैं, लेकिन उनका पालन कराने वाले तंत्र की जवाबदेही अक्सर हादसे के बाद ही तय होती है।
सवाल सिर्फ आग लगने का नहीं, सुरक्षा के इंतजाम का भी है
यही वजह है कि आज सवाल सिर्फ आग लगने का नहीं है। सवाल यह भी है कि अगर चेतावनी के संकेत पहले से मौजूद थे, तो उन्हें अनदेखा किसने किया? और अगर समय रहते कार्रवाई होती, तो क्या आज 18 परिवारों के घरों में मातम नहीं होता?
इस हादसे की सबसे दर्दनाक तस्वीर उन परिवारों की है, जिनके सपने अब हमेशा के लिए राख हो चुके हैं। मृतकों की सूची में दर्ज हर नाम सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है। हर नाम के पीछे एक सपना था... एक संघर्ष था... और एक ऐसा परिवार था जिसने अपने बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए न जाने कितनी उम्मीदें पाल रखी थीं।
सपने हुए खाक, पीछे छोड़ गए आंसुओं की झड़ी
किसी ने अपने बेटे को इंजीनियर बनाने का सपना देखा था... कोई बेटी डिजिटल एनीमेशन और गेमिंग की दुनिया में पहचान बनाना चाहती थी... कोई अपने परिवार की आर्थिक स्थिति बदलने के लिए पढ़ाई कर रहा था। लेकिन कुछ ही मिनटों में आग की उन लपटों ने सब कुछ छीन लिया।
नीलेश और अनामिका की कहानी पूरे देश को भावुक कर रही है। दोनों एक ही संस्थान में काम करते थे। दोनों की शादी इसी साल दिसंबर में होने वाली थी। लेकिन नियति ने ऐसा क्रूर फैसला सुनाया कि दोनों की अर्थी एक साथ उठी। पश्चिम बंगाल से लखनऊ आई अनामिका अपने परिवार की उम्मीद थी। पोस्टमॉर्टम हाउस के बाहर उसकी मां बार-बार बेहोश हो रही थीं। उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि करियर बनाने के लिए भेजी गई बेटी अब कभी घर नहीं लौटेगी। पश्चिम बंगाल से पहुंचे अनामिका के परिवार के लिए इस सदमे को स्वीकार करना आज भी मुश्किल है।
सिस्टम की नाकामी बनी परिवार के दर्द की वजह
अनामिका अब इस दुनिया में नहीं हैं... लेकिन उनके परिवार के सवाल अब भी ज़िंदा हैं। कानपुर के सूरज और संयम भी बड़े सपने लेकर लखनऊ आए थे। दोनों दोस्त एनीमेशन और डिजाइनिंग की दुनिया में नाम कमाना चाहते थे। लेकिन अब उनके सपने भी इसी आग में जल चुके हैं। एक परिवार का यह दर्द आज उन सभी परिवारों की कहानी बन चुका है जिन्होंने इस हादसे में अपने बच्चों को खो दिया।
इसी तरह मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और देश के अलग-अलग हिस्सों से आए कई छात्र अब सिर्फ तस्वीरों में रह गए हैं। पीछे छूट गए हैं उनके माता-पिता, उनके अधूरे सपने और वे सवाल जिनका जवाब कोई नहीं दे पा रहा। लेकिन इन परिवारों के लिए अब सिर्फ संवेदनाएं नहीं, जवाबदेही ज्यादा महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि हादसे के बाद सरकार की कार्रवाई भी अब सवालों के घेरे में है।
हादसे के बाद प्रशासन ने दिए जांच के आदेश
हादसे के बाद उत्तर प्रदेश सरकार पूरी तरह एक्शन मोड में दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घटना के तुरंत बाद उच्च स्तरीय SIT जांच के आदेश दिए हैं। आईएएस अधिकारी अमृत अभिजात और आईपीएस अधिकारी प्रवीण कुमार की अगुवाई में विशेष जांच दल गठित किया गया है, जिसे सात दिनों के भीतर रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है। एसआईटी के दूसरे सदस्य और एडीजी प्रवीण कुमार ने भी कहा है कि जांच हर एंगल से की जा रही है। यानी जांच एजेंसियां अब सिर्फ हादसे के कारण ही नहीं, बल्कि जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही भी तय करने की कोशिश कर रही हैं।
4 अधिकारी निलंबित, कई गिरफ्तार
सरकार ने शुरुआती स्तर पर कार्रवाई करते हुए चार अधिकारियों को निलंबित कर दिया है। इनमें विकास प्राधिकरण और संबंधित विभागों के अधिकारी शामिल हैं। भवन स्वामी वीरेंद्र शुक्ला समेत कई लोगों को गिरफ्तार किया गया है। एफआईआर दर्ज की गई है और जांच लगातार आगे बढ़ रही है। सरकार का दावा है कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा और जांच पूरी पारदर्शिता के साथ होगी।
प्रधानमंत्री मोदी समेत कई नेताओं ने किया दु:ख व्यक्त
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस हादसे पर गहरा दुख व्यक्त किया है और मृतकों के परिजनों के लिए प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष से आर्थिक सहायता का ऐलान किया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी शोक व्यक्त करते हुए पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना जताई है।
लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कार्रवाई हादसे के बाद ही क्यों होती है? अगर नियम टूट रहे थे तो पहले कार्रवाई क्यों नहीं हुई? अगर निर्माण में खामियां थीं तो इमारत को सील क्यों नहीं किया गया? अगर सुरक्षा मानकों का पालन नहीं हो रहा था तो कोचिंग चलाने की अनुमति किसने दी? यही सवाल अब पूरे प्रशासनिक तंत्र के सामने खड़े हैं।
कानपुर प्रशासन ने कई कोचिंग संस्थानों की शुरू की जांच
लखनऊ की आग का असर अब पूरे प्रदेश में दिखाई देने लगा है। कानपुर प्रशासन ने कई कोचिंग संस्थानों और व्यावसायिक इमारतों की जांच शुरू कर दी है। सुरक्षा मानकों के उल्लंघन पर 22 संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई की गई है। कई जगहों पर नोटिस जारी हुए हैं। कई इमारतों को सील किया गया है। फायर सेफ्टी ऑडिट शुरू कर दिए गए हैं।
यानी सरकार अब नुकसान होने के बाद उस खतरे को तलाश रही है जो पहले से मौजूद था। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई स्थायी सुधार में बदलेगी? या फिर कुछ दिनों बाद सब कुछ सामान्य हो जाएगा? दिल्ली के होटल अग्निकांड की तस्वीरें अभी लोगों के ज़हन से पूरी तरह मिट भी नहीं पाई थीं कि लखनऊ की इस त्रासदी ने एक बार फिर वही सवाल खड़े कर दिए हैं। हर बड़े हादसे के बाद तस्वीर लगभग एक जैसी होती है… आग लगती है, जानें जाती हैं, जांच बैठती है, अधिकारी निलंबित होते हैं, गिरफ्तारियां होती हैं, मुआवजे का ऐलान होता है और फिर कुछ समय बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है। इस हादसे की गूंज अब सियासी गलियारों तक भी पहुंच चुकी है। विपक्ष का आरोप है कि यह सिर्फ हादसा नहीं बल्कि प्रशासनिक विफलता है।
दूसरे शहरों में भी प्रशासन हरकत में
इस हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हमने वास्तव में कुछ सीखा है? लखनऊ की आग के बाद अब दूसरे शहरों में भी सुरक्षा इंतजामों की हकीकत जांची जा रही है। हादसे के बाद अब दूसरे शहरों में भी प्रशासन हरकत में आ गया है।
लखनऊ की यह घटना सिर्फ एक शहर या एक इमारत की कहानी नहीं है। यह देशभर में तेजी से फैलती उस कोचिंग और ट्रेनिंग इंडस्ट्री की कहानी है, जो आज हजारों करोड़ रुपये का कारोबार बन चुकी है। छात्रों और उनके परिवारों से लाखों रुपये की फीस ली जाती है, लेकिन सुरक्षा इंतजामों को अक्सर खर्च समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
'अब समय सिर्फ कार्रवाई का नहीं, बल्कि व्यापक सुधार का है'
दिल्ली के मुखर्जी नगर से लेकर कोटा, सूरत और अब लखनऊ तक... लगभग हर बड़े हादसे में एक जैसी खामियां सामने आती हैं… संकरी सीढ़ियां, क्षमता से अधिक भीड़, अपर्याप्त वेंटिलेशन, फायर सेफ्टी मानकों की अनदेखी और प्रशासनिक लापरवाही। विशेषज्ञों का मानना है कि अब समय सिर्फ कार्रवाई का नहीं, बल्कि व्यापक सुधार का है। देशभर में कोचिंग संस्थानों के लिए एक समान और सख्त सुरक्षा कानून, नियमित फायर ऑडिट, स्वतंत्र निगरानी तंत्र और उल्लंघन की स्थिति में सीधे आपराधिक जवाबदेही तय करने जैसे कदम उठाने होंगे।
क्योंकि... सवाल सिर्फ 18 मौतों का नहीं है। सवाल उन लाखों छात्रों का है जो हर दिन अपने सपनों के साथ ऐसे संस्थानों में प्रवेश करते हैं। सवाल उन माता-पिता का है जो अपने बच्चों का भविष्य बेहतर बनाने के लिए अपनी जिंदगी की कमाई खर्च करते हैं। और सवाल यह भी है कि क्या अगला हादसा रोकने के लिए हमें फिर किसी और शहर से ऐसी ही दर्दनाक खबर का इंतजार करना पड़ेगा?
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