नई दिल्ली: संभल हिंसा मामले में आरोपी बनाए गए मुल्ला अफरोज को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत की गई निवारक हिरासत को रद्द कर दिया है और उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। अदालत ने अफरोज की रिहाई का रास्ता भी साफ किया है। यह फैसला उस याचिका पर आया जिसमें अफरोज ने अपनी NSA हिरासत को चुनौती दी थी।

यह मामला नवंबर 2024 में संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हुई हिंसा से जुड़ा है। अफरोज को पुलिस ने इस मामले में कथित साजिशकर्ता बताया था। हालांकि, बाद में उनकी हिरासत और NSA लगाए जाने की प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कानूनी सवाल उठे।

पुलिस हिरासत में दिए कथित बयान पर उठे सवाल

मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से पूछा था कि क्या पुलिस हिरासत में दिए गए कथित इकबालिया बयान को किसी व्यक्ति की निवारक हिरासत का आधार बनाया जा सकता है। अदालत ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि यदि ऐसा बयान सामान्य आपराधिक मुकदमे में स्वीकार्य नहीं है, तो NSA के तहत हिरासत के लिए उस पर कितना भरोसा किया जा सकता है।

8 सितंबर की सुनवाई में जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। कोर्ट ने यह भी पूछा था कि हिंसा के करीब 54 दिन बाद अफरोज की गिरफ्तारी क्यों हुई, जबकि घटना के समय से CCTV फुटेज उपलब्ध होने की बात सामने आई थी।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में निवारक हिरासत के लिए जरूरी ‘subjective satisfaction’ यानी सक्षम प्राधिकारी की कानूनी और तथ्यात्मक संतुष्टि के आधार पर भी सवाल उठे थे।

पहले हाईकोर्ट से मिली थी जमानत

मामले की टाइमलाइन के मुताबिक, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सितंबर 2025 में अफरोज को एक मामले में जमानत दी थी। इसके बाद 13 अक्टूबर 2025 को संभल के जिलाधिकारी ने उनके खिलाफ NSA के तहत निवारक हिरासत का आदेश जारी किया। बाद में इस आदेश को चुनौती दी गई, लेकिन हाईकोर्ट ने NSA कार्रवाई को बरकरार रखा। इसके बाद अफरोज ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

सुप्रीम कोर्ट में अफरोज की ओर से दलील दी गई कि उनकी हिरासत का आधार बनाए गए पुलिस कस्टडी के कथित बयान की कानूनी वैधता पर सवाल है। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि केवल कई आपराधिक मामलों का होना अपने आप में निवारक हिरासत का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।

दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश सरकार ने हिरासत का बचाव करते हुए कहा था कि अफरोज की रिहाई से सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने और दोबारा हिंसा की आशंका थी। राज्य की दलील थी कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए NSA के तहत कार्रवाई जरूरी थी।

संभल हिंसा में क्या हुआ था?

नवंबर 2024 में संभल की शाही जामा मस्जिद के अदालत के आदेश पर हो रहे सर्वे के दौरान हिंसा भड़क गई थी। घटना में चार लोगों की मौत हुई थी और पुलिसकर्मियों समेत कई लोग घायल हुए थे। हिंसा के बाद पुलिस ने बड़ी संख्या में मामले दर्ज किए और कई लोगों को आरोपी बनाया।

अफरोज को पुलिस और प्रशासन की ओर से हिंसा की साजिश में शामिल बताया गया था। हालांकि, यह आरोप आपराधिक मुकदमे में न्यायिक रूप से साबित होना अलग प्रश्न है। सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा फैसला मुख्य रूप से उनके खिलाफ NSA के तहत की गई निवारक हिरासत की वैधता से संबंधित है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों उठाया था सवाल?

इस मामले में अदालत के सामने सबसे अहम सवाल यह था कि निवारक हिरासत का आदेश किस तरह के विश्वसनीय और कानूनी रूप से प्रासंगिक आधार पर बनाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पुलिस कस्टडी में कथित स्वीकारोक्ति और हिरासत आदेश के बीच संबंध पर विशेष ध्यान दिया।

अदालत ने यह भी पूछा था कि जब घटना के बाद CCTV फुटेज उपलब्ध था तो गिरफ्तारी के लिए 54 दिन का अंतर क्यों रहा और NSA आदेश में CCTV सामग्री का उल्लेख किस तरह किया गया।

मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट करने की जरूरत पर जोर दिया कि NSA जैसी निवारक हिरासत की शक्ति का इस्तेमाल कानूनी प्रक्रिया और संवैधानिक सुरक्षा उपायों के अनुरूप होना चाहिए।

फैसले में दिवंगत लॉ क्लर्क को श्रद्धांजलि

इस मामले के फैसले से जुड़ा एक भावनात्मक पहलू भी सामने आया। जस्टिस दीपांकर दत्ता ने अपने निर्णय को दिवंगत लॉ क्लर्क रित्विक देसवाल की स्मृति को समर्पित किया। अदालत से जुड़े काम में लॉ क्लर्क न्यायाधीशों को शोध और कानूनी सामग्री तैयार करने में सहायता करते हैं।

फैसले की शुरुआत में जस्टिस दत्ता ने जीवन की क्षणभंगुरता का उल्लेख करते हुए दिवंगत लॉ क्लर्क के योगदान को याद किया। उन्होंने कहा कि रित्विक ने फैसले की तैयारी के दौरान जरूरी शोध में सहायता की थी और उनके अंतिम काम की छाप निर्णय में मौजूद है।

यह पहल इसलिए भी उल्लेखनीय रही क्योंकि न्यायिक फैसलों में किसी दिवंगत लॉ क्लर्क की स्मृति को इस तरह दर्ज करना बेहद दुर्लभ माना जाता है।

आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मुल्ला अफरोज को NSA के तहत हिरासत में रखने का आधार समाप्त हो गया है। साथ ही अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है।

हालांकि, इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि संभल हिंसा से जुड़े सभी आपराधिक आरोप स्वतः समाप्त हो गए हैं। अदालत का फैसला NSA के तहत निवारक हिरासत की वैधता पर है। हिंसा से जुड़े अन्य आपराधिक मामलों में आरोप और उनकी न्यायिक स्थिति अलग प्रक्रिया के तहत तय होगी।