नई दिल्ली: दिल्ली की राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने उन्नाव दुष्कर्म मामले में FIR दर्ज न करने के आरोप में घिरे उत्तर प्रदेश पुलिस के तीन अधिकारियों को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि पीड़िता ने पुलिस के पास सीधे शिकायत दर्ज नहीं कराई थी, बल्कि पहले मुख्यमंत्री शिकायत पोर्टल पर अपनी शिकायत दर्ज की थी।
अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मयंक गोयल ने 14 मार्च को अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्यों से पता चलता है कि पीड़िता ने सबसे पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के IGRS (इंटीग्रेटेड ग्रिवांस रिड्रेसल सिस्टम) पोर्टल पर शिकायत दर्ज की थी। बाद में यह शिकायत प्रशासनिक माध्यमों से पुलिस को केवल जांच और रिपोर्ट देने के लिए भेजी गई थी।
पुलिस के पास सीधे शिकायत का सबूत नहीं
अदालत ने कहा कि ऐसा कोई साक्ष्य सामने नहीं आया जिससे यह साबित हो सके कि पीड़िता ने आरोपित पुलिस अधिकारियों, थाना प्रभारी या संबंधित थाने को सीधे तौर पर अपराध की जानकारी दी थी, जैसा कि CrPC की धारा 154(1) में अपेक्षित है।
Victim did not approach police directly before CM portal complaint: Rouse Avenue Court acquits three officers in Unnao caseRead @ANI Story I https://t.co/92fnWsUWgu #DelhiCourt #UnnaoRapeCase pic.twitter.com/0l8w6AqXLf
— ANI Digital (@ani_digital) March 16, 2026
जिरह के दौरान पीड़िता ने भी किया स्वीकार
जिरह के दौरान पीड़िता ने स्वीकार किया कि 17 अगस्त 2017 को मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत दर्ज करने से पहले उसने पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के खिलाफ यौन उत्पीड़न की कोई शिकायत किसी पुलिस थाने में दर्ज नहीं कराई थी। पीड़िता की मां ने भी अदालत में अपनी गवाही के दौरान यही बात दोहराई।
इन पुलिस अधिकारियों पर था मामला
इस मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने तीन पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया था, जिनमें, कुंवर बहादुर सिंह (तत्कालीन सर्किल ऑफिसर, सफीपुर), धर्म प्रकाश शुक्ला (तत्कालीन थाना प्रभारी, माखी), दिग्विजय सिंह (तत्कालीन सब-इंस्पेक्टर) शामिल हैं। CBI ने इन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 166A के तहत आरोप लगाया था कि उन्होंने 4 जून 2017 को हुई कथित दुष्कर्म घटना की जानकारी मिलने के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं की।
CM पोर्टल की शिकायत FIR के समान नहीं
अदालत ने कहा कि मुख्यमंत्री के शिकायत पोर्टल या किसी अन्य ऑनलाइन प्रशासनिक मंच पर शिकायत दर्ज करना CrPC की धारा 154(1) के तहत पुलिस को सीधे अपराध की सूचना देने के बराबर नहीं माना जा सकता। हालांकि, ऐसी शिकायतें प्रशासनिक कार्रवाई शुरू कर सकती हैं।
बाद में दर्ज हुई थी FIR
न्यायाधीश ने यह भी स्पष्ट किया कि बाद में FIR दर्ज हुई और मामले में आरोपी को दुष्कर्म के अपराध में दोषी ठहराया गया, लेकिन इससे यह स्वतः साबित नहीं होता कि संबंधित समय पर पुलिस अधिकारियों ने जानबूझकर कानूनी दायित्व का उल्लंघन किया था।
इससे पहले पीड़िता ने मीडिया से बातचीत में कहा था, "...मैंने अपने पिता से वादा किया था कि भले ही अब आप इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन मैं यह सुनिश्चित करूंगी कि कोर्ट में अपील करके हम इन लोगों को फांसी तक पहुंचाएंगे... मेरे पिता के पांच और हत्यारे अभी भी आज़ाद हैं। इस मामले में पुलिस भी शामिल है... उन्नाव प्रशासन भी इस साज़िश में उनके साथ मिला हुआ है। मैंने कई बार अपील भेजी है, लेकिन उन्नाव प्रशासन ने अब तक कोई भी कार्रवाई नहीं की है।"
#WATCH | Delhi | Unnao rape and custodial death case | The victim says, "... I promised my father that even though you are no more, I will ensure that we will take these people to the gallows by appealing to the Court... Five more of my father's murderers are still free. The… https://t.co/8vD6AGRwIY pic.twitter.com/bszp8X6mEF
— ANI (@ANI) February 20, 2026
सबूत साबित करने में विफल रहा अभियोजन
अदालत ने कहा कि IPC की धारा 166A के तहत आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि आरोपी अधिकारी को सीधे संज्ञेय अपराध की सूचना दी गई थी और उसने जानबूझकर एफआईआर दर्ज नहीं की। चूंकि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा, इसलिए अदालत ने तीनों पुलिस अधिकारियों को आरोपों से बरी कर दिया।
साथ ही अदालत ने CrPC की धारा 437A के तहत आरोपियों के जमानत बांड स्वीकार करते हुए मामले की फाइल को आवश्यक औपचारिकताओं के बाद रिकॉर्ड रूम में भेजने का निर्देश दिया। इस मामले में सीबीआई की ओर से वरिष्ठ लोक अभियोजक अनुराग मोदी पेश हुए, जबकि आरोपियों की ओर से अधिवक्ता सूर्यनाथ पांडेय ने पैरवी की।