पश्चिम बंगाल, भारत: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कोलकाता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को अतिरिक्त सिविल जज (तीन वर्ष के अनुभव वाले) तैनात करने और आवश्यकता पड़ने पर झारखंड व ओडिशा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से सहायता लेने की अनुमति दी, ताकि पश्चिम बंगाल में निर्वाचन आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची में आपत्तियों के सत्यापन के लिए पर्याप्त न्यायिक बल उपलब्ध कराया जा सके।
यह निर्देश भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने उस समय जारी किए, जब कोलकाता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ श्रेणी के तहत 50 लाख से अधिक आपत्तियों के सत्यापन के लिए अधिकारियों की कमी का मुद्दा उठाया। हाईकोर्ट ने कहा था कि यदि 250 न्यायिक अधिकारियों को भी लगाया जाए, तो सत्यापन प्रक्रिया पूरी करने में लगभग 80 दिन लगेंगे।
#BREAKING: #SupremeCourt flags acute human resource crunch in WB SIR verification; expands judicial pool, protects voters via Article 142Court notes enormity of 80 lakh LD and unmapped cases and 50 lakh claims before 250 officers.Permits induction of civil judges and officers… pic.twitter.com/4Ua1SHIi5e
— Bar and Bench (@barandbench) February 24, 2026
यात्रा, आवास, मानदेय और अन्य व्यय निर्वाचन आयोग द्वारा वहन होंगे
अदालत ने अपने आदेश में कहा, “यदि कोलकाता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की राय में अतिरिक्त मानव संसाधन की आवश्यकता हो, तो वे ओडिशा और झारखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से सेवारत और पूर्व न्यायिक अधिकारियों की मांग कर सकते हैं, जो लंबित प्रक्रिया को पूरा कर सकें। ऐसी स्थिति में यात्रा, आवास, मानदेय और अन्य व्यय निर्वाचन आयोग द्वारा वहन किए जाएंगे। ओडिशा और झारखंड के मुख्य न्यायाधीशों से अनुरोध है कि वे कोलकाता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के किसी भी अनुरोध पर विचार करें।”
इसका उद्देश्य आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र किया गया
न्यायिक बल के विस्तार का उद्देश्य आगामी विधानसभा चुनावों से पहले पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से संबंधित आपत्तियों का समयबद्ध और निष्पक्ष सत्यापन सुनिश्चित करना है। गौरतलब है कि इससे पहले शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 (पूर्ण न्याय करने की विशेष शक्ति) का उपयोग करते हुए पश्चिम बंगाल में जिला न्यायाधीशों की प्रतिनियुक्ति का आदेश दिया था, ताकि निर्वाचन आयोग की SIR प्रक्रिया में ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ सूची में शामिल मतदाताओं के लंबित दावों का निपटारा किया जा सके।
पीठ में भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत के साथ जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली शामिल थे।