मुंबई, महाराष्ट्र: बॉम्बे हाई कोर्ट ने अभिनेता शेखर सुमन और कॉमेडियन भारती सिंह के खिलाफ 2010 में दर्ज FIR को रद्द कर दिया है। यह मामला एक टीवी कॉमेडी शो में कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों से जुड़ा था।
यह FIR पायधोनी पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि कॉमेडी सर्कस का जादू के एक एपिसोड में "या अल्लाह! रसगुल्ला! दही भल्ला!" जैसे शब्दों के इस्तेमाल से धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं। शिकायत में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 295-A और 34 के तहत मामला दर्ज किया गया था।
शो एक "फैमिली एंटरटेनमेंट प्रोग्राम" है- कोर्ट
29 अप्रैल को सुनाए गए अपने आदेश में हाई कोर्ट ने कहा कि यह शो एक "फैमिली एंटरटेनमेंट प्रोग्राम" है और इसमें इस्तेमाल किए गए शब्द एक स्क्रिप्टेड हास्य प्रस्तुति का हिस्सा थे, जिनका उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं था।
Mumbai, Maharashtra: Bombay high court quashes FIR registered against Shekhar Suman and Bharati Singh in 2010 for uttering the words 'Ya Allah! Rasgulla! Dahi Bhalla! pic.twitter.com/LKPAO6oYH8
— IANS (@ians_india) April 30, 2026
कार्यक्रम का उद्देश्य भावना आहत करना नहीं था- कोर्ट
अदालत ने कहा कि IPC की धारा 295-A के तहत अपराध साबित करने के लिए “जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण इरादा” होना जरूरी है, जो इस मामले में मौजूद नहीं था। अदालत ने कहा, “यह कार्यक्रम किसी भी धर्म, जाति या समुदाय की भावनाओं को आहत करने के उद्देश्य से नहीं बनाया गया था। किसी प्रस्तुति के कुछ शब्दों को अलग करके नहीं देखा जा सकता।”
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि “कॉमेडी सर्कस” 2007 से सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन पर विभिन्न प्रारूपों में प्रसारित होता रहा है, जैसे "Comedy Circus Ke Superstar" और "Comedy Circus Teen Ka Tadka", जिसमें कलाकार समूहों में प्रदर्शन करते हैं और जजों द्वारा उनका मूल्यांकन किया जाता है।
"या अल्लाह! रसगुल्ला! दही भल्ला!" जैसे शब्दों पर थी आपत्ति
पुलिस अधिकारी के अनुसार, शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि 20 नवंबर 2010 को प्रसारित एपिसोड में "या अल्लाह! रसगुल्ला! दही भल्ला!" जैसे शब्दों का प्रयोग मुस्लिम समुदाय की भावनाओं को आहत करने वाला था, जिसके आधार पर FIR दर्ज की गई थी।
हालांकि, अदालत ने कहा कि 'रसगुल्ला' और 'दही भल्ला' आम खाद्य पदार्थ हैं और इनका कोई धार्मिक अर्थ नहीं है। इन्हें हास्य के रूप में इस्तेमाल करना धार्मिक वैमनस्य फैलाने के रूप में नहीं देखा जा सकता।
आपराधिक मंशा का कोई सबूत नहीं है- कोर्ट
कोर्ट ने यह भी पाया कि IPC की धारा 34 के तहत साझा आपराधिक मंशा का कोई सबूत नहीं है और इस मामले को आगे बढ़ाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि धारा 295-A के तहत मुकदमा चलाने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 196 के तहत पूर्व स्वीकृति आवश्यक होती है, जो इस मामले में नहीं ली गई थी।
कोर्ट ने FIR और सभी कानूनी कार्यवाही को रद्द किया
इन सभी तथ्यों को स्वीकार करते हुए हाई कोर्ट ने FIR और उससे जुड़े सभी कानूनी कार्यवाही को रद्द कर दिया और कहा कि इस मामले का कोई कानूनी आधार नहीं है। यह याचिका शेखर सुमन और भारती सिंह द्वारा दायर की गई थी, जिसमें नवंबर 2010 में प्रसारित इस शो के एपिसोड 18 से संबंधित FIR को चुनौती दी गई थी।