नई दिल्ली: देश के कुछ राज्यों में एक बार फिर चांदीपुरा वायरस (Chandipura Virus - CHPV) ने स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ा दी है। गुजरात और राजस्थान में सामने आए मामलों के बाद प्रशासन सतर्क हो गया है और लोगों से विशेष सावधानी बरतने की अपील की जा रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह वायरस खासतौर पर 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए अधिक खतरनाक साबित हो सकता है, क्योंकि बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता और तंत्रिका तंत्र (Central Nervous System) पूरी तरह विकसित नहीं होता।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि समय रहते लक्षणों की पहचान कर इलाज शुरू न किया जाए तो संक्रमण तेजी से गंभीर रूप ले सकता है। ऐसे में माता-पिता के लिए यह जरूरी है कि वे बच्चों की सेहत में आने वाले छोटे-से-छोटे बदलाव पर भी नजर रखें।

बच्चों पर क्यों ज्यादा असर करता है वायरस?

डॉक्टरों के मुताबिक, चांदीपुरा वायरस शरीर में प्रवेश करने के बाद सीधे सेंट्रल नर्वस सिस्टम को प्रभावित कर सकता है। बच्चों में इम्यून सिस्टम पूरी तरह विकसित न होने के कारण संक्रमण तेजी से फैल सकता है और कम समय में गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्याएं पैदा कर सकता है।

कई मामलों में संक्रमण के बाद केवल 24 से 48 घंटे के भीतर मरीज की हालत तेजी से बिगड़ सकती है। इसलिए शुरुआती लक्षणों को सामान्य वायरल बुखार समझकर नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है।

कैसे फैलता है यह संक्रमण?

विशेषज्ञों का कहना है कि चांदीपुरा वायरस मुख्य रूप से सैंडफ्लाई (रेतीली मक्खी) के काटने से फैलता है। कुछ शोधों में मच्छरों की भूमिका पर भी चर्चा हुई है, लेकिन प्रमुख माध्यम सैंडफ्लाई को ही माना जाता है।

राहत की बात यह है कि यह वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में सीधे नहीं फैलता। यानी संक्रमित बच्चे के संपर्क में आने से संक्रमण नहीं होता। इसके बावजूद संक्रमित क्षेत्रों में अतिरिक्त सतर्कता बरतने की सलाह दी जा रही है।

किन लक्षणों को गंभीरता से लें?

चांदीपुरा वायरस के लक्षण अचानक दिखाई दे सकते हैं। शुरुआत में बच्चे को तेज बुखार, लगातार उल्टी, सिरदर्द, शरीर में दर्द और कमजोरी महसूस हो सकती है।

यदि संक्रमण बढ़ने लगे तो बच्चा अत्यधिक सुस्त हो सकता है, उसे चक्कर आ सकते हैं, बेहोशी, दौरे पड़ना या भ्रम की स्थिति जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे किसी भी लक्षण को नजरअंदाज करने के बजाय तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए।

इलाज के लिए क्या विकल्प हैं?

फिलहाल चांदीपुरा वायरस के लिए कोई विशेष एंटीवायरल दवा या वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। डॉक्टर मरीज के लक्षणों के अनुसार उपचार करते हैं। इसमें बुखार नियंत्रित करना, शरीर में पानी की कमी रोकना, दौरे की स्थिति को संभालना और जरूरत पड़ने पर आईसीयू में निगरानी शामिल होती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर चिकित्सा मिलने से जटिलताओं का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है।

बचाव ही सबसे प्रभावी उपाय

चूंकि इस वायरस का कोई टीका उपलब्ध नहीं है, इसलिए बचाव को ही सबसे प्रभावी हथियार माना जा रहा है।

विशेषज्ञों की सलाह है कि बच्चों को मच्छरदानी के अंदर सुलाया जाए और बाहर निकलते समय पूरी बांह के कपड़े पहनाए जाएं। घर और आसपास की साफ-सफाई बनाए रखें तथा पानी जमा न होने दें। मिट्टी की दीवारों, दरारों और नमी वाली जगहों की नियमित सफाई करें, क्योंकि सैंडफ्लाई ऐसे स्थानों पर पनप सकती है।

यदि स्थानीय स्वास्थ्य विभाग की ओर से कीटनाशक छिड़काव की सलाह दी जाए तो उसका पालन करना भी जरूरी है।

डॉक्टरों की सलाह

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून के दौरान बच्चों में होने वाले तेज बुखार या लगातार उल्टी को सामान्य मौसमी संक्रमण मानकर घर पर इलाज करने की गलती न करें। यदि बच्चे की हालत तेजी से बिगड़ रही हो, बार-बार उल्टी हो रही हो या दौरे जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराना चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि जागरूकता, समय पर पहचान और त्वरित उपचार ही इस वायरस से होने वाले गंभीर खतरे को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका है।