अमृतसर, पंजाब: गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी (GNDU), अमृतसर में राज्यसभा सांसद सतनाम सिंह संधू की पुस्तक ‘गुरुद्वारा श्री लखपत साहिब: सेवा और संभाल’ का लोक अर्पण किया गया। इस अवसर पर श्री अकाल तख्त साहिब के पूर्व कार्यकारी जत्थेदार सिंह साहिब प्रो. मनजीत सिंह ने संबोधित करते हुए कहा कि यह पुस्तक युवा पीढ़ी को सिख गुरुओं से जुड़े ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों के बारे में जानने और उनसे जुड़ने के लिए प्रेरित करेगी।
पुस्तक का लोकार्पण गुरुवार, 5 नवंबर को किया गया। कार्यक्रम में सिख संत समाज के प्रतिनिधियों और सिख पंथ की कई प्रमुख हस्तियों ने हिस्सा लिया।
पुस्तक में दर्ज है गुरुद्वारा श्री लखपत साहिब का इतिहास
पुस्तक के माध्यम से गुजरात के कच्छ स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री नानक दरबार लखपत साहिब के इतिहास, धार्मिक महत्व और संरक्षण के प्रयासों को सामने लाया गया है। गुरुद्वारा लखपत साहिब गुजरात के उन ऐतिहासिक गुरुधामों में शामिल है, जिनका संबंध श्री गुरु नानक देव जी की दो उदासियों से बताया जाता है।
पुस्तक के लेखक सतनाम सिंह संधू के अनुसार, इस ऐतिहासिक गुरुद्वारे में गुरु नानक देव जी से जुड़ी दुर्लभ निशानियां भी संरक्षित हैं। इनमें गुरु साहिब की चरण पादुकाएं भी शामिल हैं। पुस्तक पंजाबी और हिंदी भाषाओं में प्रकाशित की गई है।
कच्छ की पावन धरती पर स्थित श्री लखपत साहिब, प्रथम पातशाह श्री गुरु नानक देव जी की दो उदासियों की ऐतिहासिक स्मृतियों को संजोए हुए है। आज श्री अमृतसर साहिब स्थित गुरु नानक देव विश्वविद्यालय में सिंह साहिब ज्ञानी रघबीर सिंह जी, सिंह साहिब प्रो. मनजीत सिंह जी तथा सिख संत समाज की सम्मानित शख्सियतों ने इस पावन स्थल के इतिहास को समर्पित पुस्तक ‘गुरुद्वारा श्री लखपत साहिब: सेवा और संभाल’ का लोकार्पण किया।
वर्ष 2001 में आए भूकंप के बाद गुरुद्वारा श्री लखपत साहिब के मूल स्वरूप को संरक्षित करने में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और आज के प्रधानमंत्री श्री @narendramodi जी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। श्री लखपत साहिब के संरक्षण से लेकर श्री करतारपुर साहिब के दर्शनों के लिए गलियारा खोलने तक, इन प्रयासों में सिख संगत की भावनाओं और गुरु साहिबान की विरासत के प्रति उनका सम्मान स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। 1/3
— Satnam Singh Sandhu (@satnamsandhuchd) November 5, 2026
2001 के भूकंप में क्षतिग्रस्त हुआ था गुरुद्वारा
कार्यक्रम के दौरान गुरुद्वारा श्री लखपत साहिब के संरक्षण और पुनर्निर्माण के इतिहास पर भी चर्चा हुई। वर्ष 2001 में गुजरात में आए विनाशकारी भूकंप के कारण इस ऐतिहासिक गुरुद्वारे को भारी नुकसान पहुंचा था। इसके बाद पारंपरिक निर्माण सामग्री और कारीगरों की मदद से इसके मूल स्वरूप को संरक्षित रखते हुए पुनर्निर्माण किया गया।
गुरुद्वारे के संरक्षण कार्य को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली। यूनेस्को ने वर्ष 2004 में गुरुद्वारा लखपत साहिब को एशिया-पैसिफिक हेरिटेज अवॉर्ड के तहत विशिष्टता पुरस्कार (Award of Distinction) से सम्मानित किया था।
कई प्रमुख सिख हस्तियों ने की शिरकत
पुस्तक के लोक अर्पण समारोह में श्री अकाल तख्त साहिब के पूर्व जत्थेदार ज्ञानी रघबीर सिंह, तख्त श्री केसगढ़ साहिब के पूर्व जत्थेदार प्रो. मनजीत सिंह, गुरुद्वारा श्री लखपत साहिब गुजरात के अध्यक्ष जुग राज सिंह, एसजीपीसी सदस्य चरनजीत सिंह कालेवाल, भाई मोहकम सिंह, डॉ. हरपाल सिंह पन्नू और गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी के गुरु नानक अध्ययन विभाग के प्रमुख प्रो. अमर सिंह सहित कई प्रमुख हस्तियां मौजूद रहीं। इस अवसर पर ज्ञानी रघबीर सिंह ने पुस्तक को भारत की प्रमुख भाषाओं में प्रकाशित करने की आवश्यकता पर जोर दिया, ताकि देशभर के युवा इस ऐतिहासिक गुरुद्वारे और सिख विरासत के बारे में जान सकें।
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