मोगा, पंजाब: आज मोगा स्थित शहीद स्मारक पर 25 जून 1989 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की शाखा पर हुए पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकी हमले में शहीद हुए वीर स्वयंसेवकों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस अवसर पर भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुग भी उपस्थित रहे और उन्होंने शहीदों को नमन किया।
तरुण चुग ने कहा कि 37 वर्ष पहले आतंकवादियों ने शाखा में "भारत माता की जय" के नारे लगा रहे निहत्थे और निर्दोष स्वयंसेवकों पर अंधाधुंध गोलियां बरसा दी थीं। यह हमला केवल स्वयंसेवकों पर नहीं, बल्कि पंजाब की शांति, भाईचारे, सामाजिक सद्भाव और देश की एकता पर भी सीधा हमला था। उन्होंने कहा कि इतने बड़े नरसंहार के बावजूद अगले ही दिन उसी पवित्र स्थान पर शाखा का पुनः आयोजन किया गया, जो देशभक्ति, साहस और अटूट संकल्प का अद्वितीय उदाहरण है।
ਅੱਜ ਮੋਗਾ ਵਿਖੇ ਸ਼ਹੀਦ ਸਮਾਰਕ 'ਤੇ, 25 ਜੂਨ, 1989 ਨੂੰ ਰਾਸ਼ਟਰੀ ਸਵੈਮ ਸੇਵਕ ਸੰਘ ਦੀ ਸ਼ਾਖਾ 'ਤੇ ਪਾਕਿਸਤਾਨ-ਪ੍ਰਯੋਜਿਤ ਅੱਤਵਾਦੀ ਹਮਲੇ ਵਿੱਚ ਸ਼ਹੀਦ ਹੋਏ ਬਹਾਦਰ #ਸਵਯਮਸੇਵਕਾਂ ਨੂੰ ਦਿਲੋਂ ਸ਼ਰਧਾਂਜਲੀ ਭੇਟ ਕੀਤੀ ਗਈ।37 ਸਾਲ ਪਹਿਲਾਂ, ਅੱਤਵਾਦੀਆਂ ਨੇ ਸ਼ਾਖਾ 'ਤੇ "ਭਾਰਤ ਮਾਤਾ ਦੀ ਜੈ" ਦੇ ਨਾਅਰੇ ਲਗਾ ਰਹੇ ਨਿਹੱਥੇ ਅਤੇ ਮਾਸੂਮ… pic.twitter.com/ViGqv18Qdm
— Tarun Chugh (@tarunchughbjp) June 25, 2026
पंजाब की रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहेंगे- तरुण चुग
तरुण चुग ने कहा कि हम सभी संकल्प लेते हैं कि सनातन मूल्यों, पंजाबियत और स्वयं पंजाब की रक्षा के लिए किसी भी प्रकार का बलिदान देने को सदैव तैयार रहेंगे। उन्होंने कहा कि शहीद स्वयंसेवकों का बलिदान राष्ट्र की स्मृति में सदैव जीवित रहेगा। उन्होंने दोहराया, "हम न तो इस घटना को भूले हैं, न कभी भूलेंगे और न ही इसे कभी भुलाने देंगे।"

पंजाब के इतिहास का वो ज़ख़्म जो आज भी हरा है
25 जून, 1989 की वह सुबह पंजाब के इतिहास का ऐसा जख्म बन गई, जिसकी टीस आज भी महसूस की जाती है। यह सिर्फ 25 लोगों की हत्या नहीं थी, बल्कि भारत की एकता, सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रभक्ति को चुनौती देने की एक सुनियोजित कोशिश थी। गोलियों की गूंज ने उस दिन मोगा ही नहीं, पूरे देश को झकझोर दिया था। घर-घर मातम था, आंखों में आंसू थे और दिलों में सवाल था कि आखिर इंसानियत का कसूर क्या था?
यह वह दौर था, जब पंजाब आतंकवाद की आग में झुलस रहा था। गांवों और शहरों में डर का साया था। लोग घरों से निकलते समय इस चिंता में रहते थे कि अगला निशाना कौन होगा। लेकिन इसी भयावह माहौल में कुछ लोग हर सुबह खुले मैदान में जुटते थे। उनके हाथों में हथियार नहीं, बल्कि अनुशासन और राष्ट्रसेवा का संकल्प होता था।

25 जून 1989 की सुबह पर था आतंक का साया
25 जून 1989 की सुबह भी मोगा के नेहरू पार्क में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा सामान्य दिनों की तरह लगी हुई थी। सुबह करीब छह बजे स्वयंसेवक प्रार्थना और दैनिक गतिविधियों में व्यस्त थे। पार्क में बच्चों की किलकारियां थीं, लोग टहल रहे थे और वातावरण पूरी तरह सामान्य था। किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ ही मिनटों में यह शांत मैदान इतिहास के सबसे दर्दनाक अध्यायों में शामिल हो जाएगा।
सुबह लगभग 6 बजकर 25 मिनट पर हथियारबंद आतंकवादी पार्क में घुस आए। उन्होंने स्वयंसेवकों से कहा, झंडा नीचे करो। यह केवल एक आदेश नहीं था, बल्कि राष्ट्र की एकता और विचारधारा को झुकाने की चुनौती थी। स्वयंसेवकों ने झुकने से इनकार कर दिया। इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया।
अंधाधुंध गोलियों की बौछार, भगदड़, चीख और दर्ज का मंज़र
आतंकियों ने अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। कुछ ही मिनटों में नेहरू पार्क चीखों से गूंज उठा। चारों तरफ भगदड़, खून और दर्द का मंजर था। 25 स्वयंसेवक मौके पर ही शहीद हो गए, जबकि 35 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। जिस मैदान में कुछ देर पहले प्रार्थना हो रही थी, वहां अब मौत का सन्नाटा पसरा था।
ओमप्रकाश और पत्नी छिंदर कौर ने दिया अद्भुत साहस का परिचय
इसी दौरान पार्क के छोटे गेट के पास खड़े ओमप्रकाश और उनकी पत्नी छिंदर कौर ने अद्भुत साहस का परिचय दिया। निहत्थे होने के बावजूद उन्होंने भाग रहे आतंकियों को रोकने और पकडऩे का प्रयास किया। उन्हें मालूम था कि सामने एके-47 जैसे घातक हथियार हैं, फिर भी वे पीछे नहीं हटे। अगले ही पल गोलियों की बौछार ने दोनों को हमेशा के लिए खामोश कर दिया।
आतंकियों की गोलियाों ने नहीं देखी किसी की उम्र
उस दिन आतंक की गोलियों ने उम्र भी नहीं देखी। डेढ़ साल की मासूम डिंपल भी इस हिंसा की शिकार बन गई। दस वर्षीय नितिन जैन ने अपनी आंखों के सामने पूरा घटनाक्रम देखा। उस दिन शहीद हुए लोगों के नाम आज भी मोगा की स्मृतियों में दर्ज हैं— लेखराज धवन, बाबू राम, भगवान दास, शिव दयाल, मदन गोयल, मदन मोहन, प्रभजोत सिंह, नीरज, जगदीश भगत, वेद प्रकाश पुरी, भजन सिंह, सतपाल सिंह कालड़ा, ओम प्रकाश, छिंदर कौर और अनेक अन्य। हर नाम के पीछे एक परिवार था, सपनों से भरा एक संसार था, जो एक ही सुबह में उजड़ गया।

26 जून 1989 को लिखी गई एक नई इबारत
26 जून 1989 को उसी नेहरू पार्क में, जहां खून के धब्बे अभी सूखे भी नहीं थे, फिर शाखा लगी। वहां केवल एकता का संकल्प था, और वो यह कि आतंक के सामने कभी न झुकने का। उस दिन स्वयंसेवकों ने एक गीत गाया।
‘कौन कहंदा है कि हिंदू-सिख वक्ख ने,
ये भारत मां दी सज्जी-खब्बी अख ने।
यह सिर्फ एक गीत नहीं था, बल्कि उन गोलियों का जवाब था, जो समाज को बांटना चाहती थीं। यह संदेश था कि आतंक भय पैदा कर सकता है, लेकिन एकता को पराजित नहीं कर सकता। एक वर्ष बाद, 24 जून 1990 को उसी स्थान पर शहीदी पार्क का निर्माण किया गया। शहीदों के परिवारों की सहायता और स्मारक के रखरखाव के लिए समिति बनाई गई। आज भी हर वर्ष 25 जून के बाद आने वाले पहले रविवार को वहां श्रद्धांजलि सभा आयोजित की जाती है और उन सभी वीरों को नमन किया जाता है, जिन्होंने राष्ट्र और समाज की एकता के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।
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