नई दिल्ली, भारत: वैश्विक तेल कीमतों में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी का भारत के थोक मूल्य सूचकांक (WPI) पर सीधे तौर पर लगभग 0.7 से 1 प्रतिशत तक असर पड़ने का अनुमान है। बैंक ऑफ बड़ौदा की पश्चिम एशिया संकट पर जारी रिपोर्ट के अनुसार, अप्रत्यक्ष प्रभावों को शामिल करने पर WPI महंगाई में कुल वृद्धि लगभग 1 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, इससे अर्थव्यवस्था की बाहरी स्थिति पर भी दबाव बढ़ सकता है। भारत द्वारा FY25 में लगभग 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल का आयात किए जाने के आधार पर, यदि तेल की कीमतों में स्थायी रूप से 10 प्रतिशत बढ़ोतरी होती है तो तेल आयात बिल करीब 18 अरब डॉलर (GDP का लगभग 0.5%) बढ़ सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान में कच्चे तेल और उससे जुड़े उत्पादों का WPI बास्केट में वजन 10.4 प्रतिशत है।
India in "very comfortable position" on Oil, LPG supplies despite Hormuz concerns: Govt sourcesRead @ANI Story |https://t.co/rjd5JGHE9h#India #CrudeOIl #LPG pic.twitter.com/rhL9dyNH00
— ANI Digital (@ani_digital) March 6, 2026
रुपया 91-92 प्रति डॉलर के दायरे में कारोबार कर सकता है
वहीं, नई उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) श्रृंखला में इन उत्पादों की हिस्सेदारी 6.8 प्रतिशत है, जो पहले की श्रृंखला में 2.4 प्रतिशत थी। रिपोर्ट के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा फिलहाल तेल विपणन कंपनियां (OMCs) वहन कर सकती हैं। इस स्थिति से चालू खाते के घाटे (Current Account Deficit) में भी बढ़ोतरी की आशंका है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि रुपया 91-92 प्रति डॉलर के दायरे में कारोबार कर सकता है। हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक के हस्तक्षेप से रुपये को सहारा मिल सकता है, लेकिन यदि युद्ध लंबा चलता है तो 92 प्रति डॉलर का स्तर भी पार हो सकता है। निर्यात और रेमिटेंस पर भी नजर रखी जा रही है। FY25 में भारत के कुल निर्यात का लगभग 13.7 प्रतिशत हिस्सा खाड़ी देशों को जाता है, जिसमें रिफाइनरी उत्पादों का योगदान करीब 14 प्रतिशत है। ऐसे में यदि क्षेत्रीय तनाव लंबा खिंचता है तो रिफाइनरी उत्पादों के निर्यात पर दबाव बढ़ सकता है।
हाल के वर्षों में विकसित अर्थव्यवस्थाओं की हिस्सेदारी बढ़ी है
हालांकि, खाड़ी सहयोग परिषद देशों से आने वाली रेमिटेंस पारंपरिक रूप से अधिक रही है, लेकिन हाल के वर्षों में विकसित अर्थव्यवस्थाओं की हिस्सेदारी बढ़ी है। फिर भी पश्चिम एशिया में अस्थिरता का असर इन प्रवाहों पर पड़ सकता है। वित्तीय स्थिति भी सब्सिडी में उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील बनी हुई है। यदि LNG और तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो उर्वरक (FY27BE के अनुसार GDP का 0.42%) और पेट्रोलियम (0.03%) सब्सिडी बिल में बढ़ोतरी हो सकती है, खासकर तब जब OMCs अतिरिक्त लागत को खुद वहन करें।
इससे गैर-कर राजस्व पर दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (PSUs) से मिलने वाला लाभांश घट सकता है। साथ ही, यदि खुदरा कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए सरकार एक्साइज ड्यूटी कम करती है, तो राजस्व संग्रह में भी कमी आ सकती है। इन चुनौतियों के बावजूद रिपोर्ट में कहा गया है कि FY27 के लिए भारत की GDP वृद्धि दर 7 से 7.5 प्रतिशत के अनुमान पर कायम है। रिपोर्ट के अनुसार, बाहरी क्षेत्र में कमजोरी के कारण कुछ दबाव जरूर बन सकता है, लेकिन मजबूत घरेलू मांग के कारण भारत की आर्थिक वृद्धि अपेक्षाकृत सुरक्षित रहने की संभावना है।