भारत की स्कूली शिक्षा व्यवस्था पिछले एक दशक में बड़े बदलावों से गुजरी है। एक ओर स्कूल छोड़ने वाले बच्चों यानी ड्रॉपआउट दर में गिरावट आई है, वहीं दूसरी ओर सरकारी स्कूलों से निजी स्कूलों की ओर छात्रों का तेजी से बढ़ता रुझान नई बहस खड़ी कर रहा है।

NITI Aayog की हालिया रिपोर्ट “School Education System in India: Temporal Analysis and Policy Roadmap for Quality Enhancement” के मुताबिक, 2014-15 से 2024-25 के बीच शिक्षा व्यवस्था में बुनियादी सुविधाओं, नामांकन और डिजिटल पहुंच में सुधार हुआ है, लेकिन सरकारी स्कूलों में छात्रों की हिस्सेदारी पहली बार 50% से नीचे चली गई है।

सरकारी स्कूलों में घटे छात्र, निजी स्कूलों में बढ़ी भीड़

रिपोर्ट के अनुसार, 2005 में जहां करीब 71% छात्र सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे, वहीं 2024-25 तक यह आंकड़ा घटकर 49.24% रह गया। यानी अब आधे से कम छात्र सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं।

इसके उलट निजी स्कूलों में दाखिले लगातार बढ़े हैं। माध्यमिक स्तर पर करीब 44% स्कूल निजी क्षेत्र के हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अंग्रेजी माध्यम, स्मार्ट क्लास, डिजिटल सुविधाएं और बेहतर अनुशासन की धारणा ने निजी स्कूलों को बढ़त दिलाई है।

शहरी क्षेत्रों में यह बदलाव ज्यादा स्पष्ट दिख रहा है, जहां मध्यम वर्ग और नौकरीपेशा परिवार निजी स्कूलों को भविष्य और करियर से जोड़कर देख रहे हैं।

ड्रॉपआउट दर में सुधार, लेकिन माध्यमिक स्तर अब भी चिंता

रिपोर्ट के मुताबिक, प्राथमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर में बड़ा सुधार हुआ है।

  • 2014-15 में जहां कई राज्यों में प्राथमिक स्तर पर ड्रॉपआउट बड़ी चुनौती था, वहीं 2024-25 तक यह घटकर लगभग 0.3% तक पहुंच गया।
  • हालांकि माध्यमिक स्तर पर स्थिति अब भी चिंाजनक है। 2024-25 में सेकेंडरी स्तर की ड्रॉपआउट दर करीब 11.5% दर्ज की गई।

विशेषज्ञों के अनुसार, आर्थिक दबाव, ग्रामीण इलाकों में स्कूलों की दूरी, किशोरावस्था में पढ़ाई छोड़ना और रोजगार की मजबूरी इसके प्रमुख कारण हैं।

10 साल में स्कूलों की तस्वीर कितनी बदली?

पिछले दशक में स्कूलों के बुनियादी ढांचे में सुधार जरूर हुआ है।

संकेतक2014-152024-25
सरकारी स्कूलों में नामांकन50% से ऊपर49.24%
प्राथमिक ड्रॉपआउटकई राज्यों में ऊंचाकरीब 0.3%
माध्यमिक ड्रॉपआउटगंभीर चुनौती11.5%
बिजली वाले स्कूलकरीब 55%91.9%
इंटरनेट सुविधाबेहद सीमिततेजी से विस्तार
कुल छात्र संख्या-24.69 करोड़
कुल स्कूल-

14.71 लाख

सुविधाएं बढ़ीं, लेकिन समस्याएं खत्म नहीं

रिपोर्ट में कहा गया है कि स्कूलों में बिजली, शौचालय और पानी जैसी सुविधाओं में सुधार हुआ है। फिर भी कई सरकारी स्कूल अब भी बुनियादी जरूरतों से जूझ रहे हैं।

  • 1 लाख से ज्यादा स्कूलों में बिजली की पर्याप्त व्यवस्था नहीं
  • करीब 98 हजार स्कूलों में लड़कियों के लिए कार्यरत शौचालय नहीं
  • एक लाख से अधिक स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं

ग्रामीण भारत में यह समस्या ज्यादा गंभीर मानी जा रही है।

डिजिटल इंडिया का असर, लेकिन ‘डिजिटल डिवाइड’ कायम

कोविड-19 महामारी के बाद शिक्षा में डिजिटल बदलाव तेजी से बढ़ा। कई स्कूलों में स्मार्ट क्लास, ऑनलाइन पढ़ाई और टैबलेट जैसी सुविधाएं आईं।

लेकिन रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण और गरीब परिवारों के बच्चों तक डिजिटल संसाधनों की पहुंच अब भी सीमित है। यही वजह है कि ऑनलाइन शिक्षा का फायदा सभी छात्रों तक समान रूप से नहीं पहुंच पाया।

क्या कहती है नई शिक्षा नीति?

Ministry of Education की नई शिक्षा नीति (NEP 2020) शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, ड्रॉपआउट कम करने और डिजिटल लर्निंग बढ़ाने पर जोर देती है

सरकार का लक्ष्य 2030 तक शिक्षा व्यवस्था को अधिक समावेशी और आधुनिक बनाना है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ स्कूल खोलना या नामांकन बढ़ाना काफी नहीं होगा, बल्कि सीखने की गुणवत्ता सुधारना सबसे बड़ी चुनौती है।

विशेषज्ञों की राय

शिक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, सरकारी स्कूलों में भरोसा वापस लाने के लिए सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं, बल्कि शिक्षण गुणवत्ता, शिक्षक प्रशिक्षण और तकनीकी शिक्षा पर ज्यादा निवेश करना होगा।

उनका मानना है कि अगर सरकारी स्कूल आधुनिक सुविधाओं और बेहतर शिक्षण मॉडल के साथ आगे बढ़ते हैं, तो निजी स्कूलों की ओर बढ़ते पलायन को रोका जा सकता है।

निष्कर्ष

भारत की स्कूली शिक्षा व्यवस्था बदलाव के निर्णायक दौर में है। ड्रॉपआउट दर में कमी और इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार सकारात्मक संकेत हैं, लेकिन सरकारी स्कूलों से निजी संस्थानों की ओर बढ़ता रुझान शिक्षा व्यवस्था में बढ़ती असमानता की ओर भी इशारा करता है।

आने वाले वर्षों में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ बच्चों को स्कूल तक पहुंचाना नहीं, बल्कि उन्हें गुणवत्तापूर्ण और समान शिक्षा उपलब्ध कराना होगी।